शिवाष्टकम का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह शिवाष्टकम भगवान शिव के परमेश्वर, जगत्नाथ, विश्वनाथ और सदानन्द स्वरूप का अत्यंत गूढ़, भक्तिपूर्ण और तात्त्विक स्तवन है। इसमें महादेव को प्राणनाथ अर्थात जीवन के अधिपति, विभु यानी सर्वव्यापक और भूत-भविष्य-वर्तमान के स्वामी के रूप में नमन किया गया है। वे भूतनाथ, भूतेश्वर, शंकर और शम्भु हैं—जो कल्याण करने वाले, दुःख हरने वाले और आनंद प्रदान करने वाले हैं। यह स्तुति शिव के लौकिक और अलौकिक, दोनों स्वरूपों का संतुलित वर्णन करती है।
दूसरे श्लोक में भगवान शिव के उग्र और वैराग्यपूर्ण स्वरूप का चित्रण है। उनके गले में मुण्डमाला, शरीर पर सर्पों का जाल, और वे स्वयं महाकाल के भी काल हैं। वे गणेश आदि देवताओं के पालक हैं। उनकी जटाओं में प्रवाहित गंगा जीवनदायिनी करुणा का प्रतीक है। यह रूप दर्शाता है कि शिव संहार के देव होते हुए भी करुणा और संरक्षण के मूल स्रोत हैं।
तीसरे श्लोक में महादेव को आनंद देने वाला, संसार का श्रृंगार करने वाला, और भस्म विभूषित बताया गया है। वे अनादि, अनंत और असीम हैं। शिव का यह स्वरूप यह सिखाता है कि जो संसार को बंधन मानता है, वही मोह का नाशक बन सकता है। भस्म धारण कर वे जीवन की नश्वरता और वैराग्य का संदेश देते हैं।
चौथे श्लोक में शिव को वटवृक्ष के नीचे वास करने वाला, अट्टहास (प्रलयकारी हास) करने वाला, और महापापों का नाशक कहा गया है। वे गिरीश, गणेश, सुरेश और महेश हैं—अर्थात पर्वतों, गणों, देवताओं और समस्त सृष्टि के अधिपति। उनका तेज सदा प्रकाशमान रहता है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
पाँचवें श्लोक में शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप का भाव आता है। पार्वती (गिरिराज की पुत्री) के साथ उनका आधा शरीर यह दर्शाता है कि शक्ति और शिव अलग नहीं हैं। वे पर्वतों पर स्थित, शरणागतों के सदा रक्षक हैं और परब्रह्म स्वरूप होकर भी ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा वंदनीय हैं।
छठे श्लोक में भगवान शिव को कपाल, त्रिशूल धारण किए हुए बताया गया है। वे अपने कमल चरणों में नमन करने वालों की सभी कामनाएँ पूर्ण करते हैं। वे देवताओं के प्रधान, बल और सामर्थ्य को बढ़ाने वाले हैं। यह श्लोक बताता है कि शिव भक्तों के लिए दाता और संरक्षक दोनों हैं।
सातवें श्लोक में महादेव का शरद पूर्णिमा के चंद्र समान शीतल स्वरूप, त्रिनेत्र, पवित्रता, और कुबेर के मित्र होने का वर्णन है। उनकी पत्नी अपर्णा (पार्वती) हैं और उनका चरित्र सदा सत्य और आदर्श है। यह शिव के सौम्य, संतुलित और गृहस्थ स्वरूप को दर्शाता है।
आठवें श्लोक में शिव के वैराग्य और तांत्रिक स्वरूप का वर्णन है। वे सर्पहार धारण करने वाले, श्मशान में विचरण करने वाले, वेदों के सार और निर्विकार हैं। वे कामदेव का दहन कर यह सिखाते हैं कि इंद्रियों पर विजय ही मोक्ष का मार्ग है।
अंतिम फलश्रुति में बताया गया है कि जो व्यक्ति प्रातःकाल श्रद्धा से इस शिवाष्टकम का पाठ करता है, उसे इस लोक में सुपुत्र, समृद्धि, सुखी दाम्पत्य, मित्रता और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
निष्कर्ष:
यह शिवाष्टकम भगवान शिव के निर्गुण और सगुण, उग्र और सौम्य, संहारक और करुणामय स्वरूपों का अद्भुत समन्वय है। इसका नियमित पाठ जीवन से अज्ञान, मोह, भय और दुःख को दूर करता है तथा भक्त को शांति, भक्ति, ज्ञान और अंततः मोक्ष की ओर ले जाता है। सच्चे मन से किया गया शिव स्मरण जीवन को सार्थक और शिवमय बना देता है।
शिव अष्टकम (शिवाष्टकम) – Shiva Ashtakam
प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं, जगन्नाथ नाथं सदानन्द भाजाम्।
भवद्भव्य भूतेश्वरं भूतनाथं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥१॥
गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालंमहाकाल, कालं गणेशादि पालम्।
जटाजूट गङ्गोत्तरङ्गै र्विशालं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥२॥
मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तंमहा मण्डलं भस्म भूषाधरं तम्।
अनादिं ह्यपारं महा मोहमारं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥३॥
वटाधो निवासं महाट्टाट्टहासंमहापाप नाशं सदा सुप्रकाशम्।
गिरीशं गणेशं सुरेशं महेशं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥४॥
गिरीन्द्रात्मजा सङ्गृहीतार्धदेहंगिरौ संस्थितं सर्वदापन्न गेहम्।
परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्-वन्द्यमानं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥५॥
कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानंपदाम्भोज नम्राय कामं ददानम्।
बलीवर्धमानं सुराणां प्रधानं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥६॥
शरच्चन्द्र गात्रं गणानन्दपात्रंत्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम्।
अपर्णा कलत्रं सदा सच्चरित्रं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥७॥
हरं सर्पहारं चिता भूविहारंभवं वेदसारं सदा निर्विकारं।
श्मशाने वसन्तं मनोजं दहन्तं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडे॥८॥
स्वयं यः प्रभाते नरश्शूल पाणेपठेत् स्तोत्ररत्नं त्विहप्राप्यरत्नम्।
सुपुत्रं सुधान्यं सुमित्रं कलत्रंविचित्रैस्समाराध्य मोक्षं प्रयाति॥
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हर हर महादेव! 🔱🙏