शिव मृत्युंजय स्तोत्रम् -Shiva Mrityunjaya Stotram

शिव मृत्युंजय स्तोत्रम् का विस्तृत सार एवं भावार्थ

शिव मृत्युंजय स्तोत्रम् भगवान चन्द्रशेखर महादेव की वह दिव्य स्तुति है, जो मनुष्य को मृत्यु के भय, रोग, कष्ट, पाप और सांसारिक बंधनों से मुक्त करने का गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है। इस स्तोत्र का मूल भाव यह है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान शिव की शरण में चला जाता है, उसके लिए यमराज भी निष्प्रभावी हो जाते हैं। हर श्लोक में दोहराया गया भाव “मम किं करिष्यति वै यमः” इसी अडिग विश्वास को दर्शाता है कि शिव-भक्त को मृत्यु का भय नहीं रहता।

प्रथम श्लोक में भगवान शिव को रजत पर्वतों पर निवास करने वाले, नागों से सुशोभित, त्रिपुरासुर का दहन करने वाले और देवताओं द्वारा वंदित रूप में स्मरण किया गया है। यहाँ शिव की संहारक शक्ति और रक्षक स्वरूप दोनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। भक्त यह दृढ़ घोषणा करता है कि जिसने चन्द्रशेखर महादेव का आश्रय ले लिया, उसके जीवन में यम का कोई अधिकार नहीं रह जाता

दूसरे श्लोक में शिव के कमल समान चरण, पवित्र सुगंध, त्रिनेत्र की अग्नि और कामदेव के दहन का वर्णन है। यह श्लोक सिखाता है कि शिव वासना, अहंकार और मोह को नष्ट करने वाले हैं। उनका भस्म-विलिप्त शरीर संसार की नश्वरता और वैराग्य का प्रतीक है, जो साधक को भवसागर से पार ले जाता है।

तीसरे श्लोक में भगवान शिव का गजचर्म धारण किया हुआ रूप, ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित चरण, तथा गंगा से पवित्र जटाएँ दर्शाई गई हैं। यह रूप बताता है कि शिव अत्यंत सरल होते हुए भी सर्वोच्च हैं। उनकी जटाओं से बहती गंगा यह संकेत देती है कि वे भक्तों के जीवन को शीतल, पवित्र और शांत बना देते हैं।

चौथे श्लोक में शिव को वृषवाहन, नारद आदि मुनियों द्वारा स्तुत, भुवनेश्वर और अंधकासुर का संहार करने वाले कहा गया है। यहाँ शिव का स्वरूप अधर्म के नाशक और धर्म के संरक्षक के रूप में सामने आता है। वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं।

पाँचवें श्लोक में शिव के नीलकण्ठ, भुजंग भूषण, पार्वती के साथ अर्धनारीश्वर भाव, और हलाहल विष धारण करने की महिमा बताई गई है। यह श्लोक सिखाता है कि शिव त्याग, प्रेम और करुणा की मूर्ति हैं। वे स्वयं कष्ट सहकर भी संसार को बचाने वाले देव हैं।

छठे श्लोक में भगवान शिव को समस्त रोगों की औषधि, दक्ष यज्ञ के विनाशक, त्रिगुणातीत, और भुक्ति व मुक्ति दोनों देने वाले बताया गया है। इस श्लोक का भाव यह है कि शिव न केवल सांसारिक सुख देते हैं, बल्कि अंततः मोक्ष का द्वार भी खोलते हैं और पापों के समूह को नष्ट करते हैं।

सातवें श्लोक में शिव का भक्तवत्सल स्वभाव, अक्षय कृपा, और सर्वभूतपति स्वरूप प्रकट होता है। वे पंचतत्वों—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—में व्याप्त हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, उसके जीवन में कभी आध्यात्मिक दरिद्रता नहीं आती।

आठवें श्लोक में शिव को सृष्टि के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता—तीनों रूपों में स्मरण किया गया है। वे गणों के साथ नित्य क्रीड़ा करते हुए भी पूरे ब्रह्मांड का संचालन करते हैं। यह श्लोक दर्शाता है कि शिव लीला में मग्न रहते हुए भी जगत के प्रत्येक कण पर नियंत्रण रखते हैं।

नवम से सोलहवें श्लोकों तक भगवान शिव के अनेक नामों और दिव्य स्वरूपों—जैसे रुद्र, पशुपति, नीलकण्ठ, महादेव, जगद्गुरु, देवदेव, अनन्त, शान्त और आनन्दस्वरूप—का श्रद्धापूर्वक नमन किया गया है। इन श्लोकों का एक ही सार है कि जो शिव को शिरसा नमन करता है, उसके लिए मृत्यु भय का कारण नहीं रह जाती। शिव स्वयं काल के भी काल हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शिव मृत्युंजय स्तोत्रम् केवल दीर्घायु की कामना का स्तोत्र नहीं, बल्कि अज्ञान, भय, रोग और कर्मबंधन से मुक्ति का दिव्य मार्ग है। जो साधक श्रद्धा, विश्वास और नियम से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में आत्मिक बल, मानसिक शांति और आध्यात्मिक जागरण स्वतः प्रकट होने लगता है। चन्द्रशेखर महादेव की शरण में जाकर भक्त निश्चिंत हो जाता है, क्योंकि वहाँ मृत्यु भी परास्त हो जाती है।

शिव मृत्युंजय स्तोत्रम् -Shiva Mrityunjaya Stotram

रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश‍ृङ्गनिकेतनं
शिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।
क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥१॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥२॥

मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपूजिताङ्घ्रिसरोरुहम्।
देवसिद्धतरङ्गिणी करसिक्तशीतजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥३॥

कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।
अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥४॥

यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥५॥

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसङ्घनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥६॥

भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम्।
भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥७॥

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमथ प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम्।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥८॥

रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥९॥

कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१०॥

नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥११॥

वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१२॥

देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१३॥

अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१४॥

आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१५॥

स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम्।
नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति॥१६॥


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महादेव की कृपा आप सभी पर बनी रहे। हर हर महादेव!🙏

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