शिव रामाष्टकम स्तोत्र – Shiva Ramashtakam Stotram

शिव रामाष्टकम स्तोत्र का विस्तृत सार एवं भावार्थ

शिव रामाष्टकम स्तोत्र एक अत्यंत भावपूर्ण और अद्वितीय स्तुति है, जिसमें भगवान शिव और भगवान राम की एकता को गहराई से अनुभव कराया गया है। यह स्तोत्र यह स्पष्ट करता है कि शिव और राम अलग नहीं, बल्कि एक ही परम चेतना के दो स्वरूप हैं। साधक जब “शिव हरे” और “राम” का स्मरण करता है, तब उसके जीवन से त्रिविध ताप—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक कष्ट स्वतः दूर होने लगते हैं।

प्रथम श्लोक में भक्त भगवान को शिव-राम सखा, सर्वशक्तिमान प्रभु और तीनों प्रकार के दुःखों का नाश करने वाला मानकर शरणागत होता है। वह उनसे अपने जीवन में विजय, संरक्षण और आशीर्वाद की कामना करता है। यह श्लोक पूर्ण समर्पण भाव को दर्शाता है।

दूसरे श्लोक में कमलनयन राम, करुणा के सागर, गजराज (गजेन्द्र) की रक्षा करने वाले और गुरु स्वरूप हरि-शंकर का स्मरण है। यहाँ यह भाव उभरता है कि जो प्रभु संकट में पड़े भक्त की रक्षा करते हैं, वही शिव-तत्व से युक्त राम हैं, जिनकी शरण में आने से भय समाप्त हो जाता है।

तीसरे श्लोक में बताया गया है कि जो व्यक्ति परम पुरुष शिव-राम की भक्ति करता है, उसका जीवन मंगलमय और आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। ऐसा भक्त संसार में रहते हुए भी परम पद की अनुभूति करता है और उसे अद्भुत सुख की प्राप्ति होती है।

चौथे श्लोक में प्रभु को धर्मराज युधिष्ठिर के प्रिय, अर्जित पुण्य के महासागर, और करुणामय कृष्ण स्वरूप में नमन किया गया है। यह श्लोक दर्शाता है कि प्रभु हर युग में, हर रूप में धर्म की रक्षा और भक्तों की विजय के कारण हैं।

पाँचवें श्लोक में भगवान को भवबंधन से मुक्त करने वाले माधव, कवियों के हृदय में विराजमान हंस, और शिव-आराध्य बताया गया है। यहाँ भक्त जनकनंदिनी सीता के स्वामी राम से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है, जो जीवन के बंधनों से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।

छठे श्लोक में प्रभु को पृथ्वी को मंगलमय बनाने वाले, मेघ समान सुंदर, लक्ष्मीपति राम, और वेदों में प्रसिद्ध गुणों के महासागर कहा गया है। यह श्लोक ईश्वर के सर्वगुण सम्पन्न स्वरूप को उजागर करता है।

सातवें श्लोक में पतित पावन नाम की महिमा गाई गई है। भक्त विनम्र भाव से पूछता है कि जब प्रभु का नाम ही पापों का नाश करने वाला है, तो फिर वे उस पर कृपा क्यों न करें। यह श्लोक ईश्वर की असीम करुणा पर अटूट विश्वास को दर्शाता है।

आठवें श्लोक में भक्त स्वयं को अत्यंत विनीत मानते हुए प्रभु से कहता है कि आपका नाम धन से भी अधिक मूल्यवान है, फिर भी मेरे हृदय में करुणा का सागर क्यों नहीं उमड़ता। यह श्लोक आत्ममंथन और विनय का अद्भुत उदाहरण है।

नवें श्लोक में प्रभु को हनुमान के प्रिय, धनुषधारी राम, और गंगाधर शिव-गुरु स्वरूप कहा गया है। भक्त आश्चर्य व्यक्त करता है कि कहीं उससे प्रभु का स्मरण तो नहीं छूट गया, और पुनः उनकी कृपा की याचना करता है।

दसवें श्लोक में बताया गया है कि जो मनुष्य शिव-राम द्वारा रचित इस स्तोत्र का श्रद्धा से पाठ करता है, वह अंततः राम-सीता के चरणकमलों में स्थान प्राप्त करता है। यह श्लोक भक्ति के फलस्वरूप परम गति का संकेत देता है।

अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो साधक प्रातःकाल एकाग्र चित्त से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके जीवन में विजय प्राप्त होती है और उसे भगवान विष्णु (हरि) का सान्निध्य प्राप्त होता है। यह श्लोक स्तोत्र के साधना-पद्धति और फल को स्पष्ट करता है।

निष्कर्ष

शिव रामाष्टकम स्तोत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि शैव और वैष्णव परंपरा के अद्भुत एकत्व का दिव्य प्रमाण है। यह स्तोत्र सिखाता है कि राम ही शिव हैं और शिव ही राम—दोनों में कोई भेद नहीं। जो भक्त श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता से इसका पाठ करता है, उसके जीवन से दुःख, भय और असफलता दूर होकर विजय, शांति और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है। यह स्तोत्र हृदय में प्रेम, करुणा और ईश्वर-समर्पण की भावना को जाग्रत करता है।

शिव रामाष्टकम स्तोत्र – Shiva Ramashtakam Stotram

शिवहरे शिवराम सखे प्रभो, त्रिविधताप-निवारण हे विभो।
अज जनेश्वर यादव पाहि मां, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥१॥

कमल लोचन राम दयानिधे, हर गुरो गजरक्षक गोपते।
शिवतनो भव शङ्कर पाहिमां, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥२॥

स्वजनरञ्जन मङ्गलमन्दिर,भजति तं पुरुषं परं पदम्।
भवति तस्य सुखं परमाद्भुतं, शिवहरे विजयं कुरू मे वरम्॥३॥

जय युधिष्ठिर-वल्लभ भूपते, जय जयार्जित-पुण्यपयोनिधे।
जय कृपामय कृष्ण नमोऽस्तुते, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥४॥

भवविमोचन माधव मापते, सुकवि-मानस हंस शिवारते।
जनक जारत माधव रक्षमां, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥५॥

अवनि-मण्डल-मङ्गल मापते, जलद सुन्दर राम रमापते।
निगम-कीर्ति-गुणार्णव गोपते, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥६॥

पतित-पावन-नाममयी लता, तव यशो विमलं परिगीयते।
तदपि माधव मां किमुपेक्षसे, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥७॥

अमर तापर देव रमापते, विनयतस्तव नाम धनोपमम्।
मयि कथं करुणार्णव जायते, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥८॥

हनुमतः प्रिय चाप कर प्रभो, सुरसरिद्-धृतशेखर हे गुरो।
मम विभो किमु विस्मरणं कृतं, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥९॥

नर हरेति परम् जन सुन्दरं, पठति यः शिवरामकृतस्तवम्।
विशति राम-रमा चरणाम्बुजे, शिव हरे विजयं कुरू मे वरम्॥१०॥

प्रातरूथाय यो भक्त्या पठदेकाग्रमानसः।
विजयो जायते तस्य विष्णु सान्निध्यमाप्नुयात्॥११॥


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शिव हरे… श्रीराम जय राम… हर हर महादेव! 🔱🙏

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