श्री बद्रीनाथजी की आरती – सार (भावार्थ)
श्री बद्रीनाथजी की यह पावन आरती भगवान विष्णु के बद्री नारायण स्वरूप की दिव्यता, महिमा और सर्वव्यापकता का सुंदर वर्णन करती है। आरती की शुरुआत बद्रीनाथ धाम के अलौकिक वातावरण से होती है, जहाँ मंद-मंद शीतल और सुगंधित पवन बहती है, स्वर्णिम (हेम) मंदिर अपनी दिव्य आभा से सुशोभित होता है और समीप पवित्र गंगा निर्मल धारा में प्रवाहित होती हैं। यह दृश्य स्वयं में वैकुण्ठ समान प्रतीत होता है, जहाँ भगवान बद्रीनाथ विश्व का पालन करने वाले विश्वम्भर रूप में विराजमान हैं।
आरती में बताया गया है कि शेषनाग निरंतर भगवान बद्रीनाथ का स्मरण करते हुए ध्यानमग्न रहते हैं, स्वयं महेश्वर (भगवान शिव) भी ध्यान धारण कर उनके चरणों में लीन हैं। वेदों के रचयिता ब्रह्मा तक उनकी स्तुति करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि बद्रीनाथजी त्रिदेवों द्वारा भी वंदनीय हैं। यह भगवान की सर्वोच्च सत्ता और सनातन स्वरूप को दर्शाता है।
आगे आरती में शक्ति, माता गौरी, गणेश, शारदा और नारद मुनि जैसे दिव्य शक्तियों व ऋषियों का उल्लेख है, जो भगवान बद्रीनाथ की महिमा का उच्चारण करते हैं। उनके योग, ध्यान और लीलाएँ अपार हैं, जिन्हें समझ पाना सामान्य जीव के लिए कठिन है। यह भाग भगवान के योगेश्वर और लीलाधारी स्वरूप को प्रकट करता है।
इंद्र, चंद्र और कुबेर जैसे देवता धूप-दीप अर्पित कर उनकी आराधना करते हैं, जबकि सिद्ध और मुनिजन “जय-जय” का घोष करते हैं। इससे यह भाव प्रकट होता है कि बद्रीनाथजी केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि समस्त देवताओं और सिद्ध पुरुषों के भी आराध्य हैं।
आरती में यक्ष, किन्नर और गंधर्वों द्वारा भगवान की स्तुति और आनंदोत्सव का भी वर्णन है। माता लक्ष्मी स्वयं कमला रूप में भगवान बद्रीनाथ की सेवा करती हुई चंवर डुलाती हैं, जो उनके लक्ष्मी-नारायण स्वरूप और ऐश्वर्य का प्रतीक है।
एक पद में कैलाश का उल्लेख कर यह संकेत दिया गया है कि बद्रीनाथजी निरंजन, शुद्ध और अविनाशी हैं, और राज युधिष्ठिर जैसे धर्मराज भी उनकी स्तुति करते रहे हैं। यह भगवान के धर्म, सत्य और न्याय के प्रतीक स्वरूप को दर्शाता है।
अंत में कहा गया है कि श्री बद्रीनाथजी के “पंचरत्न” (आरती/स्तोत्र) का पाठ करने से पापों का नाश होता है और कोटि-कोटि तीर्थों के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इस प्रकार यह आरती भक्त को भक्ति, शांति, पुण्य और मोक्ष के मार्ग की ओर प्रेरित करती है।
सार रूप में, श्री बद्रीनाथजी की यह आरती भगवान बद्री नारायण को विश्व के पालनकर्ता, योगेश्वर, देवताओं के देव और करुणामय रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है। इसे श्रद्धा और भक्ति से गाने-सुनने मात्र से मन शुद्ध होता है, पापों का क्षय होता है और जीवन में आध्यात्मिक शांति व पुण्य की प्राप्ति होती है।
श्री बद्रीनाथजी की आरती – Shri Badrinath Aarti
पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
शेष सुमिरन करत निशदिन,
धरत ध्यान महेश्वरम् ।
वेद ब्रह्मा करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
शक्ति गौरी गणेश शारद,
नारद मुनि उच्चारणम् ।
जोग ध्यान अपार लीला,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर,
धूप दीप प्रकाशितम् ।
सिद्ध मुनिजन करत जय जय,
बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
यक्ष किन्नर करत कौतुक,
ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम् ।
श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
कैलाश में एक देव निरंजन,
शैल शिखर महेश्वरम् ।
राजयुधिष्ठिर करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
श्री बद्रजी के पंच रत्न,
पढ्त पाप विनाशनम् ।
कोटि तीर्थ भवेत पुण्य,
प्राप्यते फलदायकम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥
पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
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✨ जय बद्रीनाथजी! हरि ओम्! ✨