श्री बटुक भैरव चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह पावन श्री बटुक भैरव चालीसा भगवान बटुक भैरव की उग्र शक्ति, रक्षक स्वरूप, भक्तवत्सल करुणा, तथा काशी के कोतवाल रूप में उनकी महिमा का अत्यंत सुंदर और विस्तारपूर्वक वर्णन करती है। प्रारंभिक दोहे में भक्त सबसे पहले भगवान विश्वनाथ और गणेश जी का स्मरण कर, फिर भैरव बाबा की कृपा की याचना करता है। उन्हें श्री काली के पुत्र, काशी के रक्षक, और दीन-दुखियों के सहायक के रूप में प्रणाम किया गया है।
चौपाइयों के आरंभ में भगवान को “श्री काली के लाला”, अर्थात् माँ काली के प्रिय पुत्र, तथा भक्तों पर सदा दयालु रहने वाले कहा गया है। उनका स्वरूप अत्यंत भीषण और तेजस्वी बताया गया है — त्रिशूल धारण किए, मुण्डमाला से सुशोभित, लाल नेत्रों वाले, और मदिरा पान में मग्न मतवाले रूप में वे अधर्म का नाश करने वाले महाकाल स्वरूप हैं।
उन्हें रुद्र बटुक, प्रेतनाथ, भूतेश, भुजंग, और त्रैलोक्य के अधिपति के रूप में स्मरण किया गया है। उनके मस्तक पर चंद्रमा, हाथों में कपाल, और वाहन रूप में कुत्ते (श्वान) की सवारी उनकी विशिष्ट पहचान है। वे काल भैरव, चक्रनाथ, क्षेत्रपाल, और दशपाणि कहलाते हैं — जो यह दर्शाता है कि वे सभी दिशाओं के रक्षक और संकट नाशक देवता हैं।
चालीसा में बताया गया है कि बटुक भैरव भगवान शिव के अवतार हैं, जो महाकाल के भी काल माने जाते हैं। वे त्रिलोचन, भयभंजन, अरिदलनाशक, तथा ताप-रोग और पापों को नष्ट करने वाले हैं। उनका शरीर कभी श्वेत, कभी लाल, और कभी श्याम वर्ण का बताया गया है — जो उनके तीन स्वरूपों की शक्ति को दर्शाता है।
भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसके सभी संकट, बाधाएँ, भय, प्रेत-बाधा, टोना-टोटका और शत्रु दोष को नष्ट करें। बटुक भैरव को पिशाचों और भूतों के स्वामी कहा गया है, जो नकारात्मक शक्तियों से भक्तों की रक्षा करते हैं। वे बंधन काटने वाले, भय हरने वाले, और मन को आनंद देने वाले देवता हैं।
चालीसा में उनके उपासना-विधि का भी सुंदर वर्णन है। बताया गया है कि भक्त रविवार के दिन, धूप-दीप, नैवेद्य और मदिरा अर्पित कर, श्रद्धा से उनकी पूजा करता है। उनके दर्शन से भक्तों के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं, और घर में सुख, शांति व समृद्धि आती है।
एक विशेष कथा में ऐलादी बहन और बटुक भैरव का अत्यंत करुणामयी प्रसंग बताया गया है। जब ऐलादी का विवाह तय हुआ और उसके भाई ने भात पहनाने में विलंब किया, तब स्वयं भगवान बटुक भैरव विष्णु जी की आज्ञा से दूत बनकर आए, सेना के साथ पहुँचे, बहन की सारी इच्छा पूरी की, और उसे सुर्ख चुंदड़ी पहनाकर सम्मान दिया। इससे सिद्ध होता है कि बटुक भैरव अपने भक्तों और उनके परिवार की लाज रखने वाले तथा हर परिस्थिति में सहायक देवता हैं।
अंतिम दोहे में कहा गया है कि जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से श्री बटुक भैरव चालीसा का पाठ करता है, उसके घर में सर्वानंद, वैभव, धन-संपत्ति, और सुख-शांति की वृद्धि होती है। भगवान भैरव उसके सभी संकटों को दूर कर, उसे जीवन में सफलता और निर्भयता प्रदान करते हैं।
इस प्रकार यह चालीसा सिखाती है कि भगवान बटुक भैरव केवल उग्र देवता ही नहीं, बल्कि वे करुणामय रक्षक, भक्तों के सच्चे सहायक, और अधर्म के संहारक परम देव हैं। उनका स्मरण करने से जीवन में भय नष्ट होता है, बाधाएँ दूर होती हैं, और भक्त को अटूट सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।
श्री बटुक भैरव चालीसा – Shri Batuk Bhairav Chalisa
॥ दोहा ॥
विश्वनाथ को सुमिर मन, धर गणेश का ध्यान।
भैरव चालीसा रचूं, कृपा करहु भगवान॥
बटुकनाथ भैरव भजू, श्री काली के लाल।
छीतरमल पर कर कृपा, काशी के कुतवाल॥
॥ चौपाई ॥
जय जय श्रीकाली के लाला। रहो दास पर सदा दयाला॥१॥
भैरव भीषण भीम कपाली। क्रोधवन्त लोचन में लाली॥२॥
कर त्रिशूल है कठिन कराला। गल में प्रभु मुण्डन की माला॥३॥
कृष्ण रूप तन वर्ण विशाला। पीकर मद रहता मतवाला॥४॥
रुद्र बटुक भक्तन के संगी। प्रेत नाथ भूतेश भुजंगी॥५॥
त्रैलतेश है नाम तुम्हारा। चक्र तुण्ड अमरेश पियारा॥६॥
शेखरचंद्र कपाल बिराजे। स्वान सवारी पै प्रभु गाजे॥७॥
शिव नकुलेश चण्ड हो स्वामी। बैजनाथ प्रभु नमो नमामी॥८॥
अश्वनाथ क्रोधेश बखाने। भैरों काल जगत ने जाने॥९॥
गायत्री कहैं निमिष दिगम्बर। जगन्नाथ उन्नत आडम्बर॥१०॥
क्षेत्रपाल दसपाण कहाये। मंजुल उमानन्द कहलाये॥११॥
चक्रनाथ भक्तन हितकारी। कहैं त्र्यम्बक सब नर नारी॥१२॥
संहारक सुनन्द तव नामा। करहु भक्त के पूरण कामा॥१३॥
नाथ पिशाचन के हो प्यारे। संकट मेटहु सकल हमारे॥१४॥
कृत्यायु सुन्दर आनन्दा। भक्त जनन के काटहु फन्दा॥१५॥
कारण लम्ब आप भय भंजन। नमोनाथ जय जनमन रंजन॥१६॥
हो तुम देव त्रिलोचन नाथा। भक्त चरण में नावत माथा॥१७॥
त्वं अशतांग रुद्र के लाला। महाकाल कालों के काला॥१८॥
ताप विमोचन अरि दल नासा। भाल चन्द्रमा करहि प्रकाशा॥१९॥
श्वेत काल अरु लाल शरीरा। मस्तक मुकुट शीश पर चीरा॥२०॥
काली के लाला बलधारी। कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी॥२१॥
शंकर के अवतार कृपाला। रहो चकाचक पी मद प्याला॥२२॥
शंकर के अवतार कृपाला। बटुक नाथ चेटक दिखलाओ॥२३॥
रवि के दिन जन भोग लगावें। धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें॥२४॥
दरशन करके भक्त सिहावें। दारुड़ा की धार पिलावें॥२५॥
मठ में सुन्दर लटकत झावा। सिद्ध कार्य कर भैरों बाबा॥२६॥
नाथ आपका यश नहीं थोड़ा। करमें सुभग सुशोभित कोड़ा॥२७॥
कटि घूँघरा सुरीले बाजत। कंचनमय सिंहासन राजत॥२८॥
नर नारी सब तुमको ध्यावहिं। मनवांछित इच्छाफल पावहिं॥२९॥
भोपा हैं आपके पुजारी। करें आरती सेवा भारी॥३०॥
भैरव भात आपका गाऊँ। बार बार पद शीश नवाऊँ॥३१॥
आपहि वारे छीजन धाये। ऐलादी ने रूदन मचाये॥३२॥
बहन त्यागि भाई कहाँ जावे। तो बिन को मोहि भात पिन्हावे॥३३॥
रोये बटुक नाथ करुणा कर। गये हिवारे मैं तुम जाकर॥३४॥
दुखित भई ऐलादी बाला। तब हर का सिंहासन हाला॥३५॥
समय व्याह का जिस दिन आया। प्रभु ने तुमको तुरत पठाया॥३६॥
विष्णु कही मत विलम्ब लगाओ। तीन दिवस को भैरव जाओ॥३७॥
दल पठान संग लेकर धाया। ऐलादी को भात पिन्हाया॥३८॥
पूरन आस बहन की कीनी। सुर्ख चुन्दरी सिर धर दीनी॥३९॥
भात भेरा लौटे गुण ग्रामी। नमो नमामी अन्तर्यामी॥४०॥
॥ दोहा ॥
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार।
कृपा दास पर कीजिए, शंकर के अवतार॥
जो यह चालीसा पढे, प्रेम सहित सत बार।
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बढ़ें अपार॥
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