आरती श्री धन्वन्तरि जी का – सार (भावार्थ)
श्री भगवान धन्वंतरि जी की आरती स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोगमुक्त जीवन के गहरे आध्यात्मिक संदेश को सरल और भक्तिपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है। इस आरती का मूल भाव यह है कि भगवान धन्वन्तरि जी मानव जीवन को रोगों से मुक्त कर स्वस्थ, संतुलित और सुखमय बनाने वाले दिव्य वैद्य हैं।
आरती के प्रारंभ में धन्वन्तरि जी को ऐसे देवता के रूप में नमन किया गया है, जो जरा (बुढ़ापा) और रोगों से पीड़ित जन-जन को सुख प्रदान करते हैं। वे केवल शारीरिक रोगों के नाशक नहीं, बल्कि जीवन में आशा, शक्ति और ऊर्जा का संचार करने वाले देव हैं।
आगे आरती में समुद्र मंथन की पावन कथा का संकेत मिलता है, जहाँ भगवान धन्वन्तरि जी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। उनके प्रकट होते ही देवताओं और असुरों के बीच उत्पन्न संकट दूर हुए। यह दर्शाता है कि वे संकट काल में जीवन-रक्षा और पुनर्जीवन के प्रतीक हैं।
आरती में यह भी बताया गया है कि भगवान धन्वन्तरि जी ने आयुर्वेद का निर्माण कर उसे संसार में फैलाया। उन्होंने मानव को सदा स्वस्थ रहने के उपाय बताए—जिनमें प्रकृति, आहार, औषधि और संयम का संतुलन निहित है। इसी कारण उन्हें आयुर्वेद का जनक माना जाता है।
उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उनकी चार सुंदर भुजाएँ हैं, जिनमें शंख, अमृत (सुधा) और आयुर्वेदिक औषधियों का भाव निहित है। वनस्पतियों से युक्त उनका स्वरूप यह संदेश देता है कि प्रकृति स्वयं उपचार का सबसे बड़ा स्रोत है।
आरती का एक महत्वपूर्ण भाव यह है कि जो भक्त नित्य मन से धन्वन्तरि जी का ध्यान करता है, उसके जीवन में रोग नहीं आते और यदि कोई असाध्य रोग भी हो, तो वह भी निश्चय ही शांत हो जाता है। यह पंक्ति भक्तों के मन में विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
भक्त हाथ जोड़कर स्वयं को प्रभु का दास मानता है और यह स्वीकार करता है कि सम्पूर्ण वैद्य समाज धन्वन्तरि जी के चरणों में नतमस्तक है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि चिकित्सा और ज्ञान भी ईश्वरीय कृपा से ही फलित होते हैं।
आरती के फलश्रुति भाग में स्पष्ट कहा गया है कि जो कोई श्रद्धा और भक्ति से श्री धन्वन्तरि जी की आरती गाता है, उसके जीवन में रोग और शोक का प्रवेश नहीं होता तथा उसे स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
समग्र सार
श्री धन्वन्तरि जी की यह आरती हमें यह सिखाती है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। सच्ची भक्ति, संयमित जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य से जीवन को निरोग और आनंदमय बनाया जा सकता है। यही इस आरती का आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी सार है।
श्री भगवान धन्वंतरि जी की आरती – Shri Dhanvantari Ji Ki Aarti
जय धन्वन्तरि देवा,जय धन्वन्तरि जी देवा।
जरा-रोग से पीड़ितजन-जन सुख देवा॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
तुम समुद्र से निकले,अमृत कलश लिए।
देवासुर के संकटआकर दूर किए॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
आयुर्वेद बनाया,जग में फैलाया।
सदा स्वस्थ रहने का,साधन बतलाया॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
भुजा चार अति सुन्दर,शंख सुधा धारी।
आयुर्वेद वनस्पति सेशोभा भारी॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
तुम को जो नित ध्यावे,रोग नहीं आवे।
असाध्य रोग भी उसका,निश्चय मिट जावे॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
हाथ जोड़कर प्रभुजी,दास खड़ा तेरा
वैद्य-समाज तुम्हारेचरणों का घेरा॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
धन्वन्तरिजी की आरतीजो कोई नर गावे।
रोग-शोक न आए,सुख-समृद्धि पावे॥
जय धन्वन्तरि देवा…..॥
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🙏 श्री भगवान धन्वंतरि जी आप सभी को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें।