श्री गिरिराज चालीसा – Shri Giriraj Chalisa

श्री गिरिराज चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ

प्रारंभिक भाव और विनय- श्री गिरिराज चालीसा की शुरुआत में भक्त गणपति, वीणा-वादिनी माता सरस्वती, महाशक्ति राधा और भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करता है। गुरु, पिता और समस्त देवगणों को नमन कर, भक्त अपनी सीमित बुद्धि स्वीकारते हुए श्री गिरिराज (गोवर्धन) की महिमा का वर्णन करने की अनुमति मांगता है। यह विनय बताती है कि सच्ची भक्ति नम्रता और कृतज्ञता से आरंभ होती है।

गिरिराज का स्वरूप और दिव्यता- गिरिराज को ब्रज मंडल के महाराजा और विष्णु-स्वरूप अवतार बताया गया है। उनके स्वर्ण-शिखर, शांत कंदराएँ और स्वर्ग-समान वातावरण देव-मुनियों को आकृष्ट करता है। तपस्वी यहाँ ध्यान करते हैं और भक्तों के कार्य सिद्ध होते हैं। वे द्रोणगिरि के युवराज कहे गए हैं—अर्थात् दिव्य परंपरा के संवाहक।

ब्रजभूमि और गोलोक की महिमा- चालीसा में गोलोक, यमुना, वृंदावन और गोवर्धन को एक पवित्र दिव्य-समुच्चय के रूप में वर्णित किया गया है। देवगण ब्रज की शोभा देखकर यहाँ विविध रूपों—कभी वनरूप, कभी मृग-बानर, कभी वृक्ष-लता—में वास करने लगते हैं, ताकि नाम-रूप की उपासना का आनंद ले सकें।

कृष्णावतार और गोवर्धन पूजा- द्वापर युग में श्रीकृष्ण अवतार लेकर गिरिराज की महिमा प्रकट करते हैं। ब्रजवासियों को इन्द्र-पूजा के स्थान पर गोवर्धन-पूजा का संदेश दिया जाता है। घर-घर से व्यंजन लाकर सामूहिक पूजा होती है। कृष्ण स्वयं सहस्र भुजाओं से प्रकट होकर भोग स्वीकार करते हैं—यह दर्शाता है कि भक्ति में सामूहिकता और सरलता सर्वोपरि है।

इन्द्र-कोप और ब्रज-रक्षा- इन्द्रदेव के क्रोध से जब मूसलाधार वर्षा होती है, तब श्रीकृष्ण नख पर गोवर्धन धारण कर ब्रज की रक्षा करते हैं। सात दिनों तक एक बूँद भी नीचे नहीं गिरती। अंततः इन्द्र अभिमान त्यागकर क्षमा मांगते हैं, परिक्रमा करते हैं और सुरभि-ऐरावत सहित भेंट अर्पित कर अपने लोक लौटते हैं। यह प्रसंग सिखाता है कि अहंकार का अंत और भक्ति की विजय निश्चित है।

श्रवण-दर्शन का फल- जो भक्त कथा श्रवण और दर्शन करता है, उसके दुःख दूर होते हैं। कुण्डों में आचमन, मानसी गंगा में स्नान—इनसे जीवन पावन होता है। दूध, जल, फल, तुलसी अर्पण करने से आधि-व्याधि नहीं आती और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

भक्ति-आचरण और विशेष फल- जो भक्त दूध की धारा, जागरण, दंडवत परिक्रमा करता है—वह भवसागर से सहज पार हो जाता है। पुत्र-हीन को संतान-प्राप्ति, दरिद्र को समृद्धि और भयग्रस्त को निर्भयता मिलती है। कलियुग में गिरिराज समान कोई देव नहीं—यह उद्घोष चालीसा का सार है।

फलश्रुति- शुद्ध चित्त से चालीसा का पाठ-श्रवण करने वाला भक्त निश्चित रूप से गिरिराज की सहायता पाता है। अंत में भक्त अपराध-क्षमा मांगते हुए श्याम बिहारी की शरण ग्रहण करता है—यही पूर्ण समर्पण है।

श्री गिरिराज चालीसा हमें सिखाती है कि भक्ति, विनय और सामूहिक उपासना से हर संकट टल जाता है। गोवर्धन महाराज केवल पर्वत नहीं, बल्कि कृपा, संरक्षण और समर्पण के सजीव प्रतीक हैं। जो भक्त श्रद्धा से इस चालीसा का पाठ करता है, उसके जीवन में रक्षा, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित होती है। श्याम बिहारी की शरण में रहकर गिरिराज की उपासना—यही कलियुग का सर्वश्रेष्ठ साधन है।

श्री गिरिराज चालीसा – Shri Giriraj Chalisa

॥ दोहा ॥

बन्दहुँ वीणा वादिनी, धरि गणपति को ध्यान।
महाशक्ति राधा सहित, कृष्ण करौ कल्याण॥

सुमिरन करि सब देवगण, गुरु पितु बारम्बार।
बरनौ श्रीगिरिराज यश, निज मति के अनुसार॥

॥ चौपाई ॥

जय हो जय बंदित गिरिराजा। ब्रज मण्डल के श्री महाराजा॥१॥
विष्णु रूप तुम हो अवतारी। सुन्दरता पै जग बलिहारी॥२॥

स्वर्ण शिखर अति शोभा पामें। सुर मुनि गण दरशन कूं आमें॥३॥
शांत कन्दरा स्वर्ग समाना। जहाँ तपस्वी धरते ध्याना॥४॥

द्रोणगिरि के तुम युवराजा। भक्तन के साधौ हौ काजा॥५॥
मुनि पुलस्त्य जी के मन भाये। जोर विनय कर तुम कूँ लाये॥६॥

मुनिवर संघ जब ब्रज में आये। लखि ब्रजभूमि यहाँ ठहराये॥७॥
विष्णु धाम गौलोक सुहावन। यमुना गोवर्धन वृन्दावन॥८॥

देख देव मन में ललचाये। बास करन बहु रूप बनाये॥९॥
कोउ बानर कोउ मृग के रूपा। कोउ वृक्ष कोउ लता स्वरूपा॥१०॥

आनन्द लें गोलोक धाम के। परम उपासक रूप नाम के॥११॥
द्वापर अंत भये अवतारी। कृष्णचन्द्र आनन्द मुरारी॥१२॥

महिमा तुम्हरी कृष्ण बखानी। पूजा करिबे की मन ठानी॥१३॥
ब्रजवासी सब के लिये बुलाई। गोवर्द्धन पूजा करवाई॥१४॥

पूजन कूँ व्यञ्जन बनवाये। ब्रजवासी घर घर ते लाये॥१५॥
ग्वाल बाल मिलि पूजा कीनी। सहस भुजा तुमने कर लीनी॥१६॥

स्वयं प्रकट हो कृष्ण पूजा में। माँग माँग के भोजन पामें॥१७॥
लखि नर नारि मन हरषामें। जै जै जै गिरिवर गुण गामें॥१८॥

देवराज मन में रिसियाए। नष्ट करन ब्रज मेघ बुलाए॥१९॥
छाँया कर ब्रज लियौ बचाई। एकउ बूँद न नीचे आई॥२०॥

सात दिवस भई बरसा भारी। थके मेघ भारी जल धारी॥२१॥
कृष्णचन्द्र ने नख पै धारे। नमो नमो ब्रज के रखवारे॥२२॥

करि अभिमान थके सुरसाई। क्षमा माँग पुनि अस्तुति गाई॥२३॥
त्राहि माम् मैं शरण तिहारी। क्षमा करो प्रभु चूक हमारी॥२४॥

बार बार बिनती अति कीनी। सात कोस परिकम्मा दीनी॥२५॥
संग सुरभि ऐरावत लाये। हाथ जोड़ कर भेंट गहाये॥२६॥

अभय दान पा इन्द्र सिहाये। करि प्रणाम निज लोक सिधाये॥२७॥
जो यह कथा सुनैं चित लावें। अन्त समय सुरपति पद पावें॥२८॥

गोवर्द्धन है नाम तिहारौ। करते भक्तन कौ निस्तारौ॥२९॥
जो नर तुम्हरे दर्शन पावें। तिनके दुःख दूर ह्वै जावें॥३०॥

कुण्डन में जो करें आचमन। धन्य धन्य वह मानव जीवन॥३१॥
मानसी गंगा में जो न्हावें। सीधे स्वर्ग लोक कूँ जावें॥३२॥

दूध चढ़ा जो भोग लगावें। आधि व्याधि तेहि पास न आवें॥३३॥
जल फल तुलसी पत्र चढ़ावें। मन वांछित फल निश्चय पावें॥३४॥

जो नर देत दूध की धारा। भरौ रहे ताकौ भण्डारा॥३५॥
करें जागरण जो नर कोई। दुख दरिद्र भय ताहि न होई॥३६॥

‘श्याम’ शिलामय निज जन त्राता। भक्ति मुक्ति सरबस के दाता॥३७॥
पुत्र हीन जो तुम कूँ ध्यावें। ताकूँ पुत्र प्राप्ति ह्वै जावें॥३८॥

दंडौती परिकम्मा करहीं। ते सहजहि भवसागर तरहीं॥३९॥
कलि में तुम सम देव न दूजा। सुर नर मुनि सब करते पूजा॥४०॥

॥ दोहा ॥

जो यह चालीसा पढ़ै, सुनै शुद्ध चित्त लाय।
सत्य सत्य यह सत्य है, गिरिवर करै सहाय॥

क्षमा करहुँ अपराध मम, त्राहि माम् गिरिराज।
श्याम बिहारी शरण में, गोवर्द्धन महाराज॥


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