श्री लक्ष्मीनारायण आरती का सार (भावार्थ)
श्री लक्ष्मी नारायण की आरती में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त महिमा का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। यह आरती सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु और समस्त ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि तथा सौभाग्य की अधिष्ठात्री माता लक्ष्मी के दिव्य स्वरूप को नमन करती है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि लक्ष्मी और नारायण एक-दूसरे से अभिन्न हैं—जहाँ नारायण हैं, वहीं लक्ष्मी का वास स्वाभाविक रूप से होता है।
आरती में भगवान विष्णु के शांत, करुणामय और अद्भुत सौंदर्य से युक्त स्वरूप का वर्णन मिलता है। उनका नीलाभ, चम्पा के समान कोमल वर्ण, मंद मुस्कान और शांति से परिपूर्ण मुख भक्तों के हृदय को शीतलता प्रदान करता है। वे शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर धर्म की रक्षा करते हैं और गरुड़ पर विराजमान होकर संसार का पालन करते हैं। वहीं माता लक्ष्मी कमल में निवास करने वाली, वर और अभय देने वाली करुणामयी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
इस आरती में लक्ष्मी-नारायण को सच्चिदानंद स्वरूप कहा गया है—अर्थात जो सत्य, चैतन्य और आनंद के साकार रूप हैं। वे न केवल भौतिक धन-संपत्ति प्रदान करते हैं, बल्कि जीवन में सुख, शांति, संतोष और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। माता लक्ष्मी को त्रिभुवन की जननी और सभी प्राणियों की पालनहार बताया गया है, जबकि भगवान विष्णु को समस्त लोकों का स्वामी और अंतर्यामी माना गया है, जो चेतन और अचेतन दोनों में समान रूप से व्याप्त हैं।
आरती का भाव यह सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल धन तक सीमित नहीं होती, बल्कि सद्बुद्धि, अच्छे संस्कार, परिवार में सुख-शांति और मन की निर्मलता भी उसी का हिस्सा हैं। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ लक्ष्मीनारायण की शरण में जाता है, उसके जीवन से दरिद्रता, अशांति और भय दूर हो जाते हैं। माता लक्ष्मी की कृपा से उसके घर में ऐश्वर्य और मंगल का वास होता है तथा भगवान नारायण की अनुकंपा से जीवन धर्म और संतुलन की राह पर आगे बढ़ता है।
अंततः यह आरती भक्त को पूर्ण समर्पण की भावना सिखाती है—जहाँ वह माता लक्ष्मी से करुणा की याचना करता है और श्री नारायण से जीवन में मंगल, सुख और स्थिरता का आशीर्वाद मांगता है। लक्ष्मीनारायण की आराधना मन, कर्म और जीवन—तीनों को पवित्र कर देने वाली दिव्य साधना मानी गई है।
श्री लक्ष्मी नारायण की आरती – Shri Lakshmi Narayan Aarti
जय लक्ष्मी-विष्णो। जय लक्ष्मीनारायण,
जय लक्ष्मी-विष्णो। जय माधव, जय श्रीपति,
जय, जय, जय विष्णो॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
जय चम्पा सम-वर्णेजय नीरदकान्ते।
जय मन्द स्मित-शोभेजय अदभुत शान्ते॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
कमल वराभय-हस्तेशङ्खादिकधारिन्।
जय कमलालयवासिनिगरुडासनचारिन्॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
सच्चिन्मयकरचरणेसच्चिन्मयमूर्ते।
दिव्यानन्द-विलासिनिजय सुखमयमूर्ते॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
तुम त्रिभुवन की माता,तुम सबके त्राता।
तुम लोक-त्रय-जननी,तुम सबके धाता॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
तुम धन जन सुखसन्तित जय देनेवाली।
परमानन्द बिधातातुम हो वनमाली॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
तुम हो सुमति घरों में,तुम सबके स्वामी।
चेतन और अचेतनके अन्तर्यामी॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
शरणागत हूँ मुझ परकृपा करो माता।
जय लक्ष्मी-नारायणनव-मन्गल दाता॥
जय लक्ष्मी-विष्णो।
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