श्री मायातीत विष्णु जी की आरती का – सार (भावार्थ)
श्री मायातीत विष्णु जी की आरती, भगवान को जगत के पालनहार, परम सत्य और माया से परे दिव्य सत्ता के रूप में नमन करती है। “जय जगदीश हरे” के भाव से आरती आरंभ होकर यह स्वीकार करती है कि प्रभु मन, वाणी और बुद्धि की सीमाओं से भी परे हैं—अर्थात् वे अनिर्वचनीय, अव्यक्त और सर्वव्यापक हैं। यही कारण है कि उन्हें मायातीत कहा गया है—जो संसार की माया से असंपृक्त होकर भी समस्त सृष्टि का संचालन करते हैं।
आरती में प्रभु को आदि-अनादि, अगोचर, अविनाशी और अविचल बताया गया है। यह दर्शाता है कि वे न तो किसी से उत्पन्न हुए हैं और न ही कभी नष्ट होंगे। वे अनन्त शक्तियों के भंडार हैं—अतुल, अनामय और अमित—जिनकी सत्ता समय, देश और परिस्थिति से परे है। उनका स्वरूप शुद्ध, अक्षय, अविकारी और सत-चित-आनंदमय है, जो आत्मा को शाश्वत शांति और ज्ञान प्रदान करता है।
आरती आगे बताती है कि विधि (ब्रह्मा), हरि (विष्णु), शंकर (शिव), गणपति, सूर्य और शक्ति—ये सभी प्रभु की ही विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। समस्त चराचर जगत उन्हीं से उत्पन्न होता है, उन्हीं में स्थित रहता है और अंततः उन्हीं में लीन हो जाता है। इस प्रकार प्रभु ही सृष्टिकर्ता, पालक और संहारक—तीनों रूपों में विद्यमान हैं।
भक्त-भाव से यह भी स्वीकार किया गया है कि प्रभु ही माता, पिता, पितामह, स्वामी, मित्र, सखा और प्रियतम हैं। वे साक्षी रूप में प्रत्येक जीव के कर्मों को देखते हैं और शरणागत के लिए करुणा-सागर बनकर उसकी रक्षा करते हैं। प्रभु काल के भी स्वामी हैं—वे समय को रचते हैं, पर स्वयं काल से परे रहते हैं।
आरती में भगवान के राम और कृष्ण रूपों का स्मरण कर उनकी करुणा, प्रेम और सौंदर्य का गुणगान किया गया है। वे प्रेमामृत के सागर हैं—मुरलीधर, मनमोहक और नित्य नवीन लीलाओं से भक्तों के हृदय को आनंदित करने वाले। यह भाव दर्शाता है कि प्रभु का सगुण रूप भक्तों के लिए सुलभ और स्नेहपूर्ण है।
अंत में भक्त अपनी अयोग्यता, पाप और कलियुग के दोषों को स्वीकार करते हुए प्रभु से शरण और दया की याचना करता है। वह प्रार्थना करता है कि प्रभु पाप-ताप हरें, आश्रय दें और सभी को अपना निज-जन बनाकर मोक्ष और शांति का मार्ग दिखाएँ। यह समर्पण भाव आरती का सार है—जहाँ अहंकार त्यागकर पूर्ण शरणागति की जाती है।
“श्री मायातीत विष्णु जी की आरती” प्रभु को परम ब्रह्म, सर्वशक्तिमान और करुणामय रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह आरती हमें सिखाती है कि संसार की माया में फँसे जीव के लिए ईश्वर-शरण ही वास्तविक मुक्ति है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास से इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में शांति, भक्ति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का संचार होता है।
श्री मायातीत विष्णु जी की आरती – Shri Mayateet Vishnu Ji Ki Aarti
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥
जय जगदीश हरे॥
आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।
अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥
जय जगदीश हरे॥
अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।
सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥
जय जगदीश हरे॥
विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।
विश्व चराचर तुम ही, तुम ही विश्वभूपा॥
जय जगदीश हरे॥
माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद्-भर्ता।
विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥
जय जगदीश हरे॥
साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।
केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥
जय जगदीश हरे॥
राम-कृष्ण करुणामय, प्रेमामृत-सागर।
मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥
जय जगदीश हरे॥
सब विधि-हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।
प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन मन॥
जय जगदीश हरे॥
आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।
पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥
जय जगदीश हरे॥
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