श्री राम रघुवीर आरती – सार (भावार्थ)
“श्री राम रघुवीर आरती” केवल बाह्य पूजा की आरती नहीं, बल्कि अंतरात्मा से की जाने वाली आध्यात्मिक आरती है। इस आरती में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्त को यह सिखाया है कि भगवान श्रीराम की सच्ची आराधना मन, भाव और आचरण की पवित्रता से होती है। यह आरती मनुष्य को दुखों से मुक्त कर आनंद और शांति के मार्ग पर ले जाने वाली साधना है।
आरती की शुरुआत में भक्त अपने मन को प्रेरित करता है कि वह राम रघुवीर की ऐसी आरती करे, जो सभी दुखों का नाश कर दे। भगवान राम को यहाँ गोविंद और आनंदघन कहा गया है—जो स्वयं आनंद के स्वरूप हैं और भक्त के कष्टों को हरने वाले हैं।
आगे बताया गया है कि भगवान राम अचर-चर (स्थिर-जगत और चल-जगत) दोनों में व्याप्त, सर्वत्र और सदा विद्यमान हैं। इसलिए भक्त को धूप के रूप में अपनी वासना और विषय-आसक्ति का त्याग करना चाहिए। दीपक के रूप में आत्मबोध का प्रकाश जलाना चाहिए, जिससे क्रोध, अहंकार, मोह और अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाए।
इसके बाद आरती में कहा गया है कि भगवान राम को अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य बाहरी भोजन नहीं, बल्कि अत्यंत निर्मल, शुभ और विशुद्ध भाव होना चाहिए। प्रेमरूपी ताम्बूल अर्पित करने से मन के सभी शूल, संशय और भय नष्ट हो जाते हैं तथा जन्म-जन्मांतर की वासनाओं का बीज भी समाप्त हो जाता है। यह दर्शाता है कि प्रेम और श्रद्धा ही श्रीराम को सबसे अधिक प्रिय है।
अगले चरण में कर्मों की शुद्धि का संदेश दिया गया है। अशुभ और शुभ कर्मों को घी की तरह समर्पित कर त्याग रूपी अग्नि में अर्पण करने से सतोगुण का प्रकाश उत्पन्न होता है। भक्ति, वैराग्य और विवेक को दीपावली की तरह सजाकर जगत के स्वामी श्रीराम की नीराजन आरती करने की प्रेरणा दी गई है।
आरती में आगे भगवान राम के लिए निर्मल हृदय को शयन-स्थान बताया गया है। जहाँ मन शांत है, वहीं श्रीराम विश्राम करते हैं। क्षमा और करुणा उनकी सेविका हैं, और जहाँ भगवान राम विराजमान होते हैं, वहाँ माया और भेदभाव का कोई स्थान नहीं रहता। यह सिखाता है कि राम का वास बाहरी मंदिरों से अधिक शुद्ध हृदय में होता है।
अंत में कहा गया है कि इस प्रकार की आरती में सनकादि, वेद, शेषनाग, शिव, देवर्षि और समस्त तत्त्वदर्शी मुनि भी निरत रहते हैं। जो व्यक्ति इस भाव से श्रीराम की आरती करता है, वह काम, क्रोध, लोभ आदि मल से मुक्त होकर भवसागर से पार हो जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह अनुभव उन्होंने स्वयं निर्मल बुद्धि से प्राप्त किया है।
निष्कर्ष
श्री राम रघुवीर आरती हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति बाहरी दीप-धूप से नहीं, बल्कि अहंकार त्याग, आत्मज्ञान, प्रेम, करुणा और वैराग्य से होती है। जो भक्त इस भाव से श्रीराम की आराधना करता है, उसका जीवन दुख-रहित, शांत और राममय हो जाता है।
🙏 जय श्रीराम | जय रघुवीर 🙏
श्री राम रघुवीर आरती – Shri Ram Raghuvir Ji Ki Aarti
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन।
हरण दुखदुन्द गोविन्द आनन्दघन॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
अचर चर रुप हरि, सर्वगत, सर्वदा
बसत, इति बासना धूप दीजै।
दीप निजबोधगत कोह-मद-मोह-तम
प्रौढ़ अभिमान चित्तवृत्ति छीजै॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ
श्रीरमण परम सन्तोषकारी।
प्रेम-ताम्बूल गत शूल सन्शय सकल,
विपुल भव-बासना-बीजहारी॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
अशुभ-शुभ कर्म घृतपूर्ण दशवर्तिका,
त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं।
भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली,
अर्पि नीराजनं जगनिवासं॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
बिमल हृदि-भवन कृत शान्ति-पर्यंक शुभ,
शयन विश्राम श्रीरामराया।
क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका,
यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव,
देवरिषि, अखिलमुनि तत्त्व-दरसी।
करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल,
वदति इति अमलमति दास तुलसी॥
ऐसी आरती राम रघुबीर की करहि मन॥
यदि आपको श्री राम रघुवीर आरती का यह भावार्थ और आध्यात्मिक सार प्रेरणादायक लगा हो, तो कृपया नीचे कमेंट में “जय श्रीराम” अवश्य लिखें और अपने विचार व अनुभूतियाँ हमारे साथ साझा करें।
इस पावन आरती को अपने परिवार, मित्रों और रामभक्तों के साथ शेयर करें, ताकि अधिक से अधिक लोग श्रीराम की भक्ति, वैराग्य और आत्मशुद्धि के इस दिव्य संदेश से जुड़ सकें। ऐसी ही आरती, भजन, कथा और रामभक्ति से जुड़ी आध्यात्मिक सामग्री के लिए हमारे ब्लॉग से जुड़े रहें।
🌼 जय श्रीराम | सीता राम 🌼