श्री शीतलनाथ भगवान की आरती – Shri Sheetalnath Ji Ki Aarti

श्री शीतलनाथ भगवान की आरती का – सार (भावार्थ)

यह आरती जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर श्री शीतलनाथ भगवान के करुणामय, वैराग्यपूर्ण और आत्मशुद्धि देने वाले स्वरूप का भक्तिपूर्ण गुणगान है। आरती की शुरुआत में भक्त घृत दीपक से प्रभु की आराधना करते हुए उन्हें “अंतर्यामी” कहता है—अर्थात् वे प्रत्येक जीव के हृदय की भावनाओं को जानने वाले, भीतर तक देखने वाले परमात्मा हैं। यह भाव बताता है कि उनकी पूजा केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्धता का साधन है।

आरती में प्रभु के जन्म का दिव्य वर्णन है। कहा गया है कि उनका अवतार भदिदलपुर में हुआ, जहाँ उनके पिता राजा दृढ़रथ और माता सुनन्दा थीं। इस जन्म को साधारण नहीं, बल्कि शिवपथ (मोक्षमार्ग) के स्वामी के रूप में जगत-कल्याण के लिए हुआ अवतार बताया गया है। जन्म के समय इंद्र द्वारा भव्य उत्सव और मेरु पर्वत पर दिव्य अभिषेक का उल्लेख प्रभु की महानता और सार्वभौमिक सम्मान को दर्शाता है।

आगे आरती में कहा गया है कि प्रभु पंच-कल्याणक के अधिपति होकर तीर्थंकर पद को प्राप्त हुए और वे दसवें तीर्थंकर के रूप में प्रतिष्ठित हैं—जिन्हें “क्षेमंकर” भी कहा गया है, अर्थात् जो कल्याण, शांति और आत्मिक सुरक्षा प्रदान करने वाले हैं। यह भाव जैन परंपरा के मूल उद्देश्य—अहिंसा, संयम और आत्मोद्धार—को रेखांकित करता है।

आरती का एक महत्वपूर्ण भाव प्रभु की वैराग्यता और समता है। कहा गया है कि वे अपने पूजक और निंदक—दोनों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनका लक्ष्य प्रशंसा या विरोध से परे रहकर केवल चित्त की पवित्रता और आत्मा की उन्नति है। यह हमें सिखाता है कि सच्चा आध्यात्मिक जीवन राग-द्वेष से मुक्त होकर समभाव में जीने से फलित होता है।

प्रभु के वचनों को “पाप-प्रणाशक और सुखकारक” बताया गया है—जो आत्मा को शाश्वत शीतलता प्रदान करते हैं। यहाँ “शीतलता” केवल मानसिक शांति नहीं, बल्कि कर्मबंधन से मुक्ति, अहंकार का क्षय और अंतःकरण की निर्मलता का प्रतीक है। अर्थात् शीतलनाथ भगवान की शिक्षा आत्मा को स्थायी शांति और मोक्ष-पथ पर अग्रसर करती है।

अंत में आरती यह भाव व्यक्त करती है कि जिनवर की प्रतिमा स्वयं जिनवर के समान पूज्य है—क्योंकि वह श्रद्धा, स्मरण और साधना का माध्यम बनती है। भक्त प्रार्थना करता है कि प्रभु की आरती और भक्ति से भाव-दुःख का नाश हो और जीवन में शांति, सदाचार और आत्मकल्याण का उदय हो।

“श्री शीतलनाथ भगवान की आरती” हमें सिखाती है कि प्रभु शीतलनाथ समता, वैराग्य और करुणा के आदर्श हैं। उनकी उपासना से पापों का क्षय, आत्मा की शुद्धि और चिरस्थायी शांति प्राप्त होती है। जो श्रद्धा, संयम और अहिंसा के भाव से इस आरती का पाठ करता है, वह अपने जीवन को धर्ममय, शांत और मोक्षोन्मुख बना लेता है।

श्री शीतलनाथ भगवान की आरती – Shri Sheetalnath Ji Ki Aarti

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी,
स्वामी जय शीतलनाथ स्वामी।
घृत दीपक से करू आरती,
घृत दीपक से करू आरती।
तुम अंतरयामी,

ॐ जयशीतलनाथ स्वामी॥
ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

भदिदलपुर में जनम लिया प्रभु,
दृढरथ पितु नामी,
दृढरथ पितु नामी।
मात सुनन्दा के नन्दा तुम,
शिवपथ के स्वामी॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

जन्म समय इन्द्रो ने,
उत्सव खूब किया,
स्वामी उत्सव खूबकिया ।
मेरु सुदर्शन ऊपर,
अभिषेक खूब किया॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

पंच कल्याणक अधिपति,
होते तीर्थंकर,
स्वामी होते तीर्थंकर ।
तुम दसवे तीर्थंकर स्वामी,
हो प्रभु क्षेमंकर॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

अपने पूजक निन्दक केप्रति,
तुम हो वैरागी,
स्वामी तुम हो वैरागी ।
केवल चित्त पवित्र करन नित,
तुमपूजे रागी॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

पाप प्रणाशक सुखकारक,
तेरे वचन प्रभो,
स्वामी तेरे वचन प्रभो।
आत्मा को शीतलता शाश्वत,
दे तब कथन विभो॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

जिनवर प्रतिमा जिनवर जैसी,
हम यह मान रहे,
स्वामी हम यह मान रहे।
प्रभो चंदानामती तब आरती,
भाव दुःख हान करें॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥

ॐ जय शीतलनाथ स्वामी,
स्वामी जय शीतलनाथ स्वामी।
घृत दीपक से करू आरती,
घृत दीपक से करू आरती।
तुम अंतरयामी,

ॐ जयशीतलनाथ स्वामी॥
॥ ॐ जय शीतलनाथ स्वामी…॥


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