सूर्य देव की आरती – सार (भावार्थ)
यह सूर्य देव की आरती भगवान सूर्य की महिमा, शक्ति और जीवनदायिनी भूमिका को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है। आरती में सूर्य देव को दिनकर, जगत के नेत्र, और त्रिगुण स्वरूप के रूप में वंदित किया गया है। वे ही इस सृष्टि को प्रकाश, ऊर्जा और चेतना प्रदान करते हैं, इसलिए समस्त जगत उनका ध्यान करता है।
आरती के अनुसार सूर्य देव के सारथी अरुण हैं और वे श्वेत कमल धारण करने वाले, चार भुजाधारी हैं। उनके सात अश्व सात दिनों, सात रंगों और सात ऊर्जाओं का प्रतीक हैं, जबकि उनकी असंख्य किरणें पूरे ब्रह्मांड में जीवन का संचार करती हैं। उन्हें देवों में महान और सर्वोच्च बताया गया है।
प्रातःकाल जब सूर्य देव उदयाचल से उदित होते हैं, तब समस्त संसार जाग उठता है। उनका प्रकाश अज्ञान के अंधकार को दूर करता है और सभी प्राणी उनके दर्शन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार संध्या समय जब वे अस्ताचल की ओर जाते हैं, तब गोधूलि बेला में उनके गुणगान से वातावरण पवित्र हो जाता है।
आरती में यह भी वर्णन है कि देव, दानव, मनुष्य, ऋषि-मुनि सभी सूर्य देव की उपासना करते हैं और आदित्य हृदय स्तोत्र का जप कर शक्ति और साहस प्राप्त करते हैं। यह स्तोत्र मंगलकारी है और जीवन में नवचेतना भर देता है।
सूर्य देव को त्रिकाल के रचयिता, जगत के आधार और प्राणों के पोषक के रूप में स्वीकार किया गया है। वे भक्तों को बल, बुद्धि, आरोग्य और ज्ञान प्रदान करते हैं। स्थावर-जंगम, जलचर-खेचर—सभी जीवों के प्राण उन्हीं से संचालित हैं। वेद और पुराण भी सूर्य देव को सर्वशक्तिमान और धर्म का आधार मानते हैं।
अंत में आरती यह संदेश देती है कि दिशाएँ, ऋतुएँ और दसों दिक्पाल भी सूर्य देव की आराधना करते हैं। वे शाश्वत, अविनाशी और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता हैं। सूर्य देव की उपासना से जीवन में शुभता, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
सूर्य देव की आरती – ऊँ जय सूर्य भगवान – Om Jai Surya Bhagwan
ऊँ जय सूर्य भगवान,
जय हो दिनकर भगवान ।
जगत् के नेत्र स्वरूपा,
तुम हो त्रिगुण स्वरूपा ।
धरत सब ही तव ध्यान,
ऊँ जय सूर्य भगवान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
सारथी अरूण हैं प्रभु तुम,
श्वेत कमलधारी ।
तुम चार भुजाधारी ॥
अश्व हैं सात तुम्हारे,
कोटी किरण पसारे ।
तुम हो देव महान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
ऊषाकाल में जब तुम,
उदयाचल आते ।
सब तब दर्शन पाते ॥
फैलाते उजियारा,
जागता तब जग सारा ।
करे सब तब गुणगान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
संध्या में भुवनेश्वर,
अस्ताचल जाते ।
गोधन तब घर आते॥
गोधुली बेला में,
हर घर हर आंगन में ।
हो तव महिमा गान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
देव दनुज नर नारी,
ऋषि मुनिवर भजते ।
आदित्य हृदय जपते ॥
स्त्रोत ये मंगलकारी,
इसकी है रचना न्यारी ।
दे नव जीवनदान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
तुम हो त्रिकाल रचियता,
तुम जग के आधार ।
महिमा तब अपरम्पार ॥
प्राणों का सिंचन करके,
भक्तों को अपने देते ।
बल बृद्धि और ज्ञान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
भूचर जल चर खेचर,
सब के हो प्राण तुम्हीं ।
सब जीवों के प्राण तुम्हीं ॥
वेद पुराण बखाने,
धर्म सभी तुम्हें माने ।
तुम ही सर्व शक्तिमान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
पूजन करती दिशाएं,
पूजे दश दिक्पाल ।
तुम भुवनों के प्रतिपाल ॥
ऋतुएं तुम्हारी दासी,
तुम शाश्वत अविनाशी ।
शुभकारी अंशुमान ॥
॥ ऊँ जय सूर्य भगवान..॥
ऊँ जय सूर्य भगवान,
जय हो दिनकर भगवान ।
जगत के नेत्र रूवरूपा,
तुम हो त्रिगुण स्वरूपा ॥
धरत सब ही तव ध्यान,
ऊँ जय सूर्य भगवान ॥
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जय सूर्य देव! 🌼