त्रयोदशी का सोमवार से संयोग सोम प्रदोष कहलाता है। इस व्रत की कथा में एक विधवा ब्राह्मणी और उसके पुत्र के दुःख, संघर्ष और कष्टों का वर्णन है, जो सोम प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा से समाप्त हो जाते हैं। यह कथा धैर्य, श्रद्धा और विश्वास का महत्व समझाती है।
सोम प्रदोष व्रत कथा (निर्धन विधवा ब्राह्मणी और उसके पुत्र की प्रेरक कथा)
रवि प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण करने के पश्चात् शौनकादि ऋषियों ने विनम्र भाव से श्री सूतजी से निवेदन किया— “हे मुनिश्रेष्ठ! अब कृपा कर हमें सोम त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पुण्यमयी कथा सुनाइए।”
तब सूतजी बोले— “हे ऋषिगणों! अब मैं आप सभी को सोम प्रदोष व्रत के महात्म्य का वर्णन करता हूँ। यह व्रत करने से भगवान शिव और माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इस व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान कर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर शिव-पार्वती का ध्यान करना चाहिए। इसके पश्चात विधिपूर्वक उनका पूजन कर अर्घ्य अर्पित करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जप करें। फिर भगवान शिव से करुण प्रार्थना करें— ‘हे प्रभु! मैं दुःखों से भरे इस संसार-सागर में डूब रहा हूँ। ऋण और ग्रहदशाओं के कष्ट से पीड़ित हूँ। हे कृपालु महादेव! मेरी रक्षा करें।’”
सूतजी का वचन सुनकर ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया— “हे महामुनि! आपने इस व्रत को सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला बताया है। कृपया यह भी बताइए कि इस व्रत को किसने किया और उसे क्या फल प्राप्त हुआ?” तब सूतजी ने कथा आरंभ की—
एक नगर में एक निर्धन विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ निवास करती थी। उसके पति का देहांत हो चुका था और संसार में उसका कोई सहारा नहीं था। वह प्रतिदिन प्रातः अपने पुत्र को साथ लेकर भिक्षाटन के लिए निकलती और जो कुछ भी प्राप्त होता, उसी से दोनों का जीवन निर्वाह करती थी।
एक दिन भिक्षा से लौटते समय मार्ग में उसे एक दयनीय अवस्था में पड़ा हुआ बालक मिला। उसकी दशा देखकर ब्राह्मणी का हृदय करुणा से भर आया। वह उस बालक को अपने साथ घर ले आई और अपने पुत्र के समान उसका पालन-पोषण करने लगी।
वह बालक वास्तव में विदर्भ देश का राजकुमार था। पड़ोसी राज्य के राजा ने उसके पिता पर आक्रमण कर राज्य छीन लिया था, इसी कारण वह दर-दर भटकने को विवश हो गया था। ब्राह्मणी उसे अपने घर रखकर अपने पुत्र के साथ समान प्रेम से बड़ा करने लगी।
कुछ समय बाद एक दिन ब्राह्मणी का पुत्र और वह राजकुमार खेल रहे थे। उसी समय वहाँ गन्धर्व कन्याएँ आईं और राजकुमार को देखकर मोहित हो गईं। ब्राह्मण कुमार तो घर लौट आया, किंतु राजकुमार वहीं रुक गया और अंशुमति नामक गन्धर्व कन्या से संवाद करने लगा। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। राजकुमार के तेज, गुण और संस्कार देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए।
कुछ समय पश्चात भगवान शिव ने अंशुमति के माता-पिता को स्वप्न में दर्शन दिए और अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार से करने की आज्ञा दी। शिव आज्ञा के अनुसार, अंशुमति का विवाह राजकुमार से संपन्न हुआ।
उधर वह विधवा ब्राह्मणी ऋषियों की आज्ञा से नियमित रूप से सोम प्रदोष व्रत का पालन करती थी। उसी व्रत के पुण्य प्रभाव से राजकुमार को गन्धर्वराज की सेना का सहयोग प्राप्त हुआ। उसने अपने शत्रुओं को परास्त कर विदर्भ का खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त किया और अपने पिता के राज्य में सुखपूर्वक शासन करने लगा। कृतज्ञता स्वरूप उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
सूतजी ने कथा का उपसंहार करते हुए कहा—
“हे मुनिगणों! जिस प्रकार उस विधवा ब्राह्मणी के सोम प्रदोष व्रत के प्रभाव से राजकुमार और उसके पुत्र का जीवन पूरी तरह बदल गया, उसी प्रकार भगवान शिव अपने सभी भक्तों को दुःख से मुक्त कर सुख, समृद्धि और सम्मान प्रदान करते हैं। इसी कारण शास्त्रों में प्रदोष व्रत की महिमा अत्यंत महान बताई गई है।”
सोम प्रदोष व्रत करने के लाभ
सोम प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत है। सोमवार का दिन स्वयं महादेव का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए जब प्रदोष व्रत सोमवार को पड़ता है, तो उसका आध्यात्मिक और फलदायी महत्व कई गुना बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने से भक्त को अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं। आइए जानें सोम प्रदोष व्रत के प्रमुख लाभ—
1. चंद्र दोष से मुक्ति
जिन जातकों की कुंडली में चंद्र दोष होता है, उनके लिए सोम प्रदोष व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव की पूजा करने के साथ-साथ दूध, दही, चावल जैसी सफेद वस्तुओं का दान करने से चंद्र दोष के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।
2. संतान सुख का वरदान
जो दंपति संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं और लंबे समय से इस सुख से वंचित हैं, उनके लिए सोम प्रदोष व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है। सच्चे मन से किया गया यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से संतान सुख प्रदान करता है।
3. सुखी और मधुर वैवाहिक जीवन
सोम प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को अत्यंत प्रिय है। इस व्रत के प्रभाव से दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और सामंजस्य बढ़ता है। पति-पत्नी के बीच चल रही गलतफहमियाँ और कड़वाहट दूर होकर घर में सुख-शांति का वातावरण बनता है।
4. पापों का नाश और मनोकामना पूर्ति
सोमवार को पड़ने वाला यह प्रदोष व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है। शिव भक्ति से व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है और अंततः उत्तम गति मिलती है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया सोम प्रदोष व्रत भगवान भोलेनाथ की कृपा से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करता है।
5. धन और समृद्धि की प्राप्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोम प्रदोष व्रत करने से जीवन में आर्थिक उन्नति होती है। शिव कृपा से धन की कमी दूर होती है और व्यक्ति के जीवन में समृद्धि और वैभव का आगमन होता है।
इस प्रकार सोम प्रदोष व्रत जीवन में शांति, प्रेम, समृद्धि और आध्यात्मिक बल प्रदान करने वाला एक अत्यंत श्रेष्ठ व्रत है। हर-हर महादेव। 🙏
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हर-हर महादेव। 🙏
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