श्री स्वामीनारायण आरती का – सार (भावार्थ)
यह आरती भगवान स्वामीनारायण के दिव्य, करुणामय और सर्वोच्च स्वरूप का भक्तिपूर्ण स्तवन है। आरती की शुरुआत में उन्हें “अक्षरपुरुषोत्तम” कहा गया है—अर्थात् वे अक्षरब्रह्म के साथ अविनाशी, सर्वोच्च परमात्मा हैं और उनका दर्शन सर्वोत्तम माना गया है। यह भाव दर्शाता है कि स्वामीनारायण केवल एक संत या अवतार नहीं, बल्कि परब्रह्म परमेश्वर के साकार रूप हैं।
आरती में प्रभु को “मुक्त अनंत सुपुजित” और “सुंदर साकार” कहा गया है—अर्थात् अनगिनत मुक्तात्माएँ जिनकी आराधना करती हैं, वही दिव्यता मानव रूप में प्रकट हुई है। उन्हें “सर्वोपरी करुणाकर” कहा गया है, जो यह बताता है कि वे सर्वोच्च होते हुए भी दया, करुणा और वात्सल्य से परिपूर्ण हैं और मानव देह में अवतरित होकर भक्तों का उद्धार करते हैं।
अगले भाव में उन्हें “पुरुषोत्तम परब्रह्म”, “श्रीहरि सहजानन्द” और “अक्षरब्रह्म अनादि, गुणातीतानंद” के रूप में नमन किया गया है। इसका अर्थ है कि स्वामीनारायण सभी गुणों से परे (गुणातीत), अनादि-अनंत और शुद्ध आनंदस्वरूप हैं। वे सृष्टि के पार, फिर भी भक्तों के निकट उपस्थित रहने वाले परम सत्य हैं।
आरती आगे बताती है कि प्रभु सदैव प्रकट रहने वाले सर्वकर्ता और परम मुक्ति के दाता हैं। उन्होंने एकान्तिक धर्म की स्थापना की—अर्थात् ऐसा धर्म जिसमें आचरण, संयम, नैतिकता और भक्ति का संतुलन हो। वे भक्ति के रक्षक हैं, जो भक्तों को संसार के बंधनों से मुक्त कर ईश्वर-प्राप्ति की राह दिखाते हैं।
“दशभाव दिव्यता सह, ब्रह्मरूपे प्रीति” के माध्यम से यह भाव उभरता है कि स्वामीनारायण ने दिव्यता के सभी भावों के साथ ब्रह्मरूप की उपासना को स्थापित किया। उनका सुहृद् (मित्रवत) भाव, करुणा और लोक-कल्याण की दृष्टि अलौकिक मर्यादाओं को जन्म देती है, जिससे समाज में शुद्ध आचरण, प्रेम और सद्भाव का विकास होता है।
अंत में भक्त भाव-विभोर होकर कहता है—“धन्य धन्य मम जीवन, तव शरणे सुफलम्”—अर्थात् प्रभु की शरण में आकर जीवन धन्य हो गया। यज्ञपुरुष द्वारा प्रवर्तित सिद्धांत—जो शांति, सेवा, संयम और भक्ति पर आधारित हैं—सुखदायी हैं और मानव जीवन को सार्थक बनाते हैं।
आरती का समापन पुनः उसी मूल सत्य पर होता है कि स्वामीनारायण ही अक्षरपुरुषोत्तम हैं और उनका दर्शन सर्वोच्च है—जो आत्मा को शांति, मुक्ति और परम आनंद की ओर ले जाता है।
“श्री स्वामीनारायण आरती” हमें सिखाती है कि स्वामीनारायण परब्रह्म, करुणामय उद्धारक और धर्म-स्थापक हैं। उनकी भक्ति से नैतिक जीवन, आध्यात्मिक शुद्धि और परम मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जो श्रद्धा, आचरण और समर्पण के साथ इस आरती का पाठ करता है, उसका जीवन शांत, सुसंस्कृत और ईश्वर-केन्द्रित बन जाता है।
श्री स्वामीनारायण आरती – Shri Swaminarayan Aarti
जय स्वामीनारायण, जय अक्षरपुरुषोत्तम,
अक्षरपुरुषोत्तम जय, दर्शन सर्वोत्तम
जय स्वामीनारायण
मुक्त अनंत सुपुजित, सुंदर साकारम्,
सर्वोपरी करुणाकर, मानव तनुधारम्
जय स्वामीनारायण
पुरूषोत्तम परब्रह्म, श्रीहरि सहजानन्द,
अक्षरब्रह्म अनादि, गुणातीतानंद
जय स्वामीनारायण
प्रकट सदा सर्वकर्ता, परम मुक्तिदाता,
धर्म एकान्तिक स्थापक, भक्ति परित्राता
जय स्वामीनारायण
दशभाव दिव्यता सह, ब्रह्मरूपे प्रीति,
सुह्राद्भाव अलौकिक, स्थापित शुभ रीति
जय स्वामीनारायण
धन्य धन्य मम जीवन, तव शरणे सुफलम्,
यज्ञपुरुष प्रवर्तित, सिद्धांतम् सुखदम्
जय स्वामीनारायण,
जय स्वामीनारायण, जय अक्षरपुरुषोत्तम,
अक्षरपुरुषोत्तम जय, दर्शन सर्वोत्तम
जय स्वामीनारायण
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