तेरी मुरली की धुन सुनने – भजन का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह भजन श्रीकृष्ण भक्ति, राधा भाव, और ब्रज की माधुर्य परंपरा को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रकट करता है। इसमें एक सखी के माध्यम से बरसाने की राधा का कोमल, प्रेममय और समर्पित हृदय बोलता हुआ प्रतीत होता है। भजन की शुरुआत श्रीकृष्ण की मुरली से होती है, जिसकी मधुर धुन भक्त के हृदय को इतना आकर्षित करती है कि वह दूरी, कष्ट और संसारिक बंधनों को त्यागकर प्रभु के पास खिंचा चला आता है। “तेरी मुरली की धुन सुनने” केवल संगीत सुनने की बात नहीं, बल्कि यह ईश्वर की दिव्य पुकार है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ देती है।
भजन में “मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ” पंक्ति राधा जी की पहचान, मर्यादा और प्रेम अधिकार को दर्शाती है। यहाँ राधा स्वयं को केवल एक भक्त नहीं, बल्कि अनन्य प्रेम स्वरूप के रूप में प्रस्तुत करती हैं। “अरे रसिया, ओ मन बसिया” जैसे शब्द श्रीकृष्ण के रसमय, चित्तचोर और हृदय में वास करने वाले स्वरूप को उजागर करते हैं, जो हर भक्त के मन में बस जाते हैं।
अगले चरणों में श्रीकृष्ण के बाल लीलाओं का मधुर वर्णन आता है। माखन चोरी की कथा में बालकृष्ण की चंचलता और प्रेमिल शरारत झलकती है। राधा का मटकी साथ लाना यह दर्शाता है कि भक्त प्रभु की लीलाओं में सहभागी बनना चाहता है, न कि केवल दर्शक। यहाँ माखन प्रेम, भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक बन जाता है, जिसे भक्त स्वयं प्रभु को अर्पित करना चाहता है।
गौ-लीला का उल्लेख श्रीकृष्ण के पालक, रक्षक और करुणामय स्वरूप को सामने लाता है। “तेरी गौएँ चराने को, मैं ग्वाले साथ लायी हूँ” पंक्ति यह भाव व्यक्त करती है कि भक्त प्रभु की सेवा में साधन, सहयोग और संपूर्ण भाव से उपस्थित होना चाहता है। यह सेवा केवल बाहरी कर्म नहीं, बल्कि अंतःकरण की शुद्ध भावना है।
भजन का अंतिम और सबसे गहन भाव कृपा प्राप्ति से जुड़ा है। “तेरी कृपा मैं पाने को, तेरे दरबार आई हूँ” में भक्त की पूर्ण शरणागति दिखाई देती है। यहाँ कोई मांग, अहंकार या शर्त नहीं है—केवल विश्वास, आशा और प्रेम है। श्रीकृष्ण की कृपा को जीवन का परम लक्ष्य मानकर भक्त उनके दरबार में नतमस्तक होता है।
पूरा भजन माधुर्य भक्ति रस में डूबा हुआ है, जहाँ प्रेम ही साधना है और प्रेम ही साध्य। इसकी सरल भाषा, दोहराव वाली पंक्तियाँ और भावपूर्ण संबोधन मन को सहज ही भक्ति में स्थिर कर देते हैं। यह भजन सुनने या गाने वाला व्यक्ति स्वयं को बरसाने से वृंदावन तक की प्रेम यात्रा में अनुभव करने लगता है।
निष्कर्ष
यह भजन श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम, मुरली की दिव्य शक्ति, और भक्त की निष्काम शरणागति को अत्यंत मधुरता से प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि जब हृदय में सच्ची भक्ति और प्रेम हो, तब दूरी, समय और संसार के बंधन स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह रचना भक्त को यह सिखाती है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग प्रेम, सेवा और कृपा पर पूर्ण विश्वास है।
तेरी मुरली की धुन सुनने मैं बरसाने से आयी हूँ – Teri Murli Ki Dhun Sunne
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ ।
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ ।
मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ ॥
अरे रसिया, ओ मन बसिया, मैं इतनी दूर से आयी हूँ ॥
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ ।
सुना है श्याम मनमोहन, के माखन खूब चुराते हो ।
सुना है श्याम मनमोहन, के माखन खूब चुराते हो ।
के माखन खूब चुराते हो ।
तुम्हे माखन खिलाने को, मैं मटकी साथ लायी हूँ ॥
मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ ॥
अरे रसिया, ओ मन बसिया, मैं इतनी दूर से आयी हूँ ॥
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ….
सुना है श्याम मनमोहन, के गौएँ खूब चराते हो ।
सुना है श्याम मनमोहन, के गौएँ खूब चराते हो ।
के गौएँ खूब चराते हो ।
तेरी गौएँ चराने को, मैं ग्वाले साथ लायी हूँ ॥
मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ ॥
अरे रसिया, ओ मन बसिया, मैं इतनी दूर से आयी हूँ ॥
तेरी मुरली की धुन सुनने मैं बरसाने से आयी हूँ….
सुना है श्याम मनमोहन, के कृपा खूब करते हो ।
सुना है श्याम मनमोहन, के कृपा खूब करते हो ।
के कृपा खूब करते हो ।
तेरी कृपा मैं पाने को, तेरे दरबार आई हूँ॥
मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ ॥
अरे रसिया, ओ मन बसिया, मैं इतनी दूर से आयी हूँ ॥
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ….
मैं बरसाने से आयी हूँ, मैं वृषभानु की जाई हूँ ॥
अरे रसिया, ओ मन बसिया, मैं इतनी दूर से आयी हूँ ॥
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ….
तेरी मुरली की धुन सुनने, मैं बरसाने से आयी हूँ….
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