वराह देव की आरती का – सार (भावार्थ)
वराह देव की यह आरती भगवान विष्णु के तृतीय अवतार – श्री वराह भगवान की महिमा और करुणा का गुणगान करती है। जब दैत्य हिरण्याक्ष पृथ्वी को उठाकर पाताल लोक में ले गया और समस्त सृष्टि संकट में डूब गई, तब प्रभु ने वराह रूप धारण कर धरती का उद्धार किया। इस आरती में वराह भगवान को धरणी उद्धारक, धर्म संरक्षक और भक्तों के रक्षक रूप में नमन किया गया है।
आरती में बताया गया है कि प्रभु ने विकराल और भयावह शूकर रूप धारण किया, किंतु उनका स्वरूप भीतर से अत्यंत करुणामय और सौम्य था। उन्होंने अपनी शक्तिशाली पुच्छ और दाँतों से पृथ्वी को जल से बाहर निकालकर पुनः उसके स्थान पर स्थापित किया। इस लीला द्वारा प्रभु ने केवल धरती को ही नहीं बचाया, बल्कि वेदों की रक्षा, धर्म की स्थापना और भू देवी के कष्टों का नाश भी किया।
आरती यह स्पष्ट करती है कि जब त्रैलोक्य संकट में डोलने लगता है, तब प्रभु वराह अवतार लेकर सृष्टि की रक्षा करते हैं। चाहे उनका रूप शूकर जैसा क्यों न हो, देवता भी उस लीला को समझ नहीं पाते, परंतु वही रूप संसार के लिए उद्धार का माध्यम बन जाता है। यहाँ यह भाव प्रकट होता है कि ईश्वर किसी भी रूप में प्रकट होकर अधर्म का नाश और धर्म की रक्षा करते हैं।
भक्त भाव से प्रभु से प्रार्थना की गई है कि हे नर रूपी वराह स्वामी, आप अपने भक्तों की रक्षा करें और उन्हें अपने नाम की शरण में रखें। जो भक्त श्रद्धा और प्रेम से आपके गुणों का गान करता है, उसे आपकी कृपा से सुख, शांति और मनवांछित फल प्राप्त होते हैं। आरती का अंतिम संदेश यह है कि जो भक्त प्रेमपूर्वक इस आरती का पाठ करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और जीवन संकटों से मुक्त हो जाता है।
वराह देव की आरती हमें यह सिखाती है कि जब संसार अधर्म और संकट में डूब जाता है, तब भगवान किसी भी रूप में प्रकट होकर धर्म, वेद और भक्तों की रक्षा करते हैं। यह आरती हमें विश्वास, साहस और शरणागति का मार्ग दिखाती है, जिससे जीवन में स्थिरता, सुरक्षा और आध्यात्मिक बल प्राप्त होता है।
वराह देव की आरती – Varaha Dev Ki Aarti
आरती वराह अवतारा, धरणी उद्धरे लियो अवतारा॥
भू को लेकर दैत्य पाताला, हिरण्याक्ष को मार्यो आला॥
धरयो रूप विकराल भयावन, पुच्छ उठायो, रूप सुहावन॥
वेद बचायो, धर्म बचाया, भू देवी को कष्ट मिटाया॥
जल में घुसि जो भू हर लाया, तब प्रभु वराह रूप दिखाया॥
शूकर रूप पर देव लजाए, पर प्रभु की लीला ना समझ पाए॥
त्रैलोक्य जब संकट डोले, तब वराह प्रभु रक्षा तोले॥
हे नर रूपी वराह स्वामी, रक्षा करो, रखो निज नामी॥
जो नर श्रद्धा से गुण गावे, वराह कृपा से सुख पावे॥
आरती जो प्रेम से गावे, सकल मनोरथ फल वह पावे॥
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