यमुना माता की आरती का सार (भावार्थ)
यमुना माता की आरती कालिंदी, हरिप्रिया और पावन नदी-देवी के रूप में उनकी महिमा का भावपूर्ण स्तवन है। आरती में यमुना को श्रीहरि की अत्यंत प्रिय कहा गया है—जो भक्तों के जीवन में शुद्धता, शांति और प्रेम का संचार करती हैं। “तपोमयी” कहकर यह भाव व्यक्त किया गया है कि यमुना माता तप, संयम और आध्यात्मिक साधना की प्रतीक हैं, जिनके तट पर भक्ति स्वतः जाग्रत होती है।
आरती में यमुना को श्यामा और अति अभिराम कहा गया है—अर्थात् उनका स्वरूप सौम्य, आकर्षक और मनोहारी है। वे सुखदा हैं, जो जीवन के दुखों को हरकर आनंद प्रदान करती हैं, और श्रीहरि रामा—अर्थात् भगवान विष्णु/कृष्ण से अभिन्न प्रेम-तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह बताता है कि यमुना माता केवल जलधारा नहीं, बल्कि भक्ति और करुणा का जीवंत स्रोत हैं।
“ब्रज मंडलवासिनी” के रूप में यमुना माता का स्मरण ब्रजभूमि से उनके गहरे संबंध को दर्शाता है, जहाँ श्रीकृष्ण की लीलाएँ सम्पन्न हुईं। वहीं “द्वारकानिवासिनी” कहकर यह संकेत मिलता है कि यमुना का आध्यात्मिक प्रभाव केवल ब्रज तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वैष्णव परंपरा में व्याप्त है। वे हर उस स्थान पर वास करती हैं, जहाँ हरि-भक्ति है।
आरती में यमुना माता को कलि-कलुष नाशिनी कहा गया है—अर्थात् कलियुग के दोष, पाप और मानसिक अशांति को नष्ट करने वाली। “पावनि” रूप में वे मन, वाणी और कर्म—तीनों को शुद्ध करती हैं। उनके स्पर्श और स्मरण से अंतःकरण निर्मल होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
अंत में यमुना माता को निर्वाण प्रदायिनी और हरि-प्रेमदायिनी कहा गया है। यह भाव दर्शाता है कि उनकी कृपा से भक्त को आत्मिक शांति, वैराग्य और मोक्षमार्ग की प्रेरणा मिलती है, साथ ही भगवान के प्रति निर्मल प्रेम का उदय होता है। यमुना माता की आराधना अंततः भक्त को संसार के बंधनों से मुक्त कर आनंदमय आध्यात्मिक अवस्था की ओर ले जाती है।
“यमुना माता की आरती” हमें यह सिखाती है कि यमुना माता पवित्रता, प्रेम और मुक्ति की दैवी धारा हैं। उनकी उपासना से पापों का क्षय, मन की अशांति का नाश और हरि-प्रेम की अनुभूति होती है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में शांति, भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
यमुना माता की आरती – Yamuna Mata Aarti – जय कालिंदी, हरिप्रिया जय
जय कालिंदी, हरिप्रिया जय।
जय रवि तवया, तपोमयी जय॥
जय श्यामा, अति अभिराम जय।
जय सुखदा, श्रीहरि रामा जय॥
जय ब्रज मण्डलवासिनि जय-जय।
जय द्वारकानिवासिनि जय-जय॥
जय कलि कलुष नसावनि जय-जय।
जय यमुने जय पावनि, जय-जय॥
जय निर्वाण प्रदायिनि जय-जय।
जय हरि प्रेमदायिनी जय-जय॥ जय…
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