प्रदोष व्रत कथा संग्रह: सातों वार के प्रदोष व्रत की पावन कथाएँ और फल
हिंदू पंचांग की मान्यताओं के अनुसार, प्रत्येक मास में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष—दोनों की त्रयोदशी तिथि को श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत का पालन किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत पुण्यदायी व्रत है, जो हर मास की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। जब त्रयोदशी किसी विशेष वार के साथ आती है, तो उसी वार के नाम से प्रदोष व्रत जाना जाता है। प्रत्येक प्रदोष व्रत की अपनी अलग महिमा, फल और प्रेरक कथा है। आइए, सभी वारों के प्रदोष व्रत की कथाओं का संक्षिप्त और सारगर्भित परिचय जानते हैं—
- प्रदोष व्रत की पूजा अपने नगर में सूर्यास्त के समय के अनुसार प्रदोष काल में ही करना श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान शिव की विधिपूर्वक आराधना किए बिना भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यह समय शिव कृपा प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी होता है।
- व्रत के दौरान अन्न, नमक, मिर्च तथा तामसिक पदार्थों का सेवन वर्जित रहता है। भक्तों को सात्त्विक आचरण रखते हुए संयम और श्रद्धा के साथ व्रत का पालन करना चाहिए।
- पूजा के लिए एक थाली में अबीर, गुलाल, चंदन, काले तिल, पुष्प, धतूरा, बिल्वपत्र, शमी पत्र, जनेऊ, कलावा, दीपक, कपूर, अगरबत्ती तथा फल आदि पूजन सामग्री रखें और भगवान शिव को समर्पित करें। श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई यह पूजा जीवन में सुख, शांति और कल्याण प्रदान करती है।
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रवि प्रदोष व्रत कथा
जब त्रयोदशी तिथि रविवार के दिन पड़ती है, तो उसे रवि प्रदोष कहा जाता है। इस व्रत की कथा एक निर्धन ब्राह्मण से जुड़ी है, जिसकी सच्ची भक्ति और शिव आराधना के प्रभाव से उसका जीवन धन, सुख और समृद्धि से भर जाता है। यह कथा बताती है कि रवि प्रदोष व्रत दरिद्रता को दूर कर वैभव प्रदान करता है।
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सोम प्रदोष व्रत कथा
त्रयोदशी का सोमवार से संयोग सोम प्रदोष कहलाता है। इस व्रत की कथा में एक विधवा ब्राह्मणी और उसके पुत्र के दुःख, संघर्ष और कष्टों का वर्णन है, जो सोम प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा से समाप्त हो जाते हैं। यह कथा धैर्य, श्रद्धा और विश्वास का महत्व समझाती है।
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भौम (मंगल) प्रदोष व्रत कथा
जब त्रयोदशी मंगलवार को आती है, तो उसे भौम या मंगल प्रदोष कहा जाता है। प्रचलित कथा के अनुसार, हनुमान जी एक वृद्धा भक्त की आस्था की परीक्षा लेने आते हैं। यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति और सेवा-भाव से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
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बुध प्रदोष व्रत कथा
बुधवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर बुध प्रदोष मनाया जाता है। इस कथा में पत्नी को अनुचित समय पर विदा करने से उत्पन्न संकटों का वर्णन है और यह भी बताया गया है कि भगवान शिव की आराधना से कैसे उन संकटों से मुक्ति मिलती है। यह कथा विवेक, मर्यादा और शिव कृपा का संदेश देती है।
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बृहस्पति (गुरु) प्रदोष व्रत कथा
त्रयोदशी यदि बृहस्पतिवार को हो, तो उसे बृहस्पति या गुरु प्रदोष कहते हैं। देवगुरु बृहस्पति के मार्गदर्शन में देवताओं ने वृत्रासुर नामक दैत्य के अंत हेतु इस व्रत का पालन किया था। इस कथा में गुरु की महत्ता, नीति और धर्म की विजय का विस्तार से वर्णन मिलता है।
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शुक्र प्रदोष व्रत कथा
शुक्रवार के दिन पड़ने वाली त्रयोदशी शुक्र प्रदोष कहलाती है। कथा के अनुसार, एक धनिक पुत्र ने शुक्रास्त के समय पत्नी को विदा किया, जिसके कारण उसे सर्पदंश का भयावह परिणाम भुगतना पड़ा। किंतु शुक्र प्रदोष व्रत के पुण्य से उसके प्राणों की रक्षा होती है। यह कथा शुभ समय और नियम पालन का महत्व बताती है।
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शनि प्रदोष व्रत कथा
शनिवार को त्रयोदशी आने पर शनि प्रदोष व्रत किया जाता है। इसकी कथा में राजकुमार धर्मगुप्त को खोया हुआ राज्य, पद और प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त होने तथा गंधर्व कन्या अंशुमति से विवाह का वर्णन है। यह कथा बताती है कि शनि प्रदोष व्रत से जीवन की अटकी हुई बाधाएँ दूर होती हैं और भाग्य का उदय होता है।
इस प्रकार प्रदोष व्रत की प्रत्येक कथा भक्तों को आस्था, संयम और शिव भक्ति की प्रेरणा देती है तथा जीवन में सुख, शांति और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक और दूध से अभिषेक करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस पावन कर्म से जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति का वास होता है तथा भक्त पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी रहती है। यदि किसी कारणवश आप घर पर विधिवत पूजा करने में असमर्थ हों, तो निकट स्थित शिव मंदिर अवश्य जाएँ। वहाँ श्रद्धापूर्वक भगवान भोलेनाथ के समक्ष हाथ जोड़कर प्रार्थना करें और जल अर्पित करें। अपनी क्षमता के अनुसार भोग और दक्षिणा अर्पित करना भी पुण्यकारी माना गया है।
सच्चे मन और पूर्ण विश्वास के साथ की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। भगवान शिव अपने भक्तों पर सदैव कृपादृष्टि बनाए रखते हैं और उनके कष्टों का निवारण करते हैं। इसके साथ ही, वैवाहिक जीवन में आ रही परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए प्रदोष व्रत के दिन मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती पर एक साथ मौली या कलावा सात बार लपेटने का विशेष विधान है। ऐसा करने से दांपत्य जीवन में प्रेम, सामंजस्य और मधुरता बढ़ती है तथा पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है।
प्रदोष व्रत की तैयारी
प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का एक अत्यंत पावन और फलदायी व्रत है। इसे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत की संपूर्ण पूजा विधि इस प्रकार है—
- त्रयोदशी के दिन भक्त को प्रातःकाल सूर्य उदय से पूर्व जागकर स्नान आदि नित्यकर्म पूर्ण करने चाहिए। इसके पश्चात मन, वचन और कर्म से शुद्ध होकर भगवान भोलेनाथ का ध्यान और स्मरण करें तथा व्रत का संकल्प लें।
- प्रदोष व्रत में दिनभर उपवास रखा जाता है और आहार ग्रहण नहीं किया जाता। उपवास के दौरान सात्त्विक भाव बनाए रखना और शिव नाम का जप करना विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
- सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पूर्व पुनः स्नान कर स्वच्छ और श्वेत वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करें। परंपरा अनुसार, स्थान को गाय के गोबर से लीपकर एक पवित्र मंडप तैयार किया जाता है।
- अब इस मंडप में पाँच रंगों से सुंदर रंगोली बनाएं, जो सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। प्रदोष व्रत की पूजा के लिए कुशा के आसन पर बैठना श्रेष्ठ माना गया है।
- सभी पूजन तैयारियाँ पूर्ण होने के बाद उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें और श्रद्धापूर्वक भगवान शिव का पूजन आरंभ करें। पूजन के समय शिवलिंग पर जल अर्पित करते हुए “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
इस विधि से किया गया प्रदोष व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होता है और भक्त के जीवन में शांति, स्वास्थ्य और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
विस्तारपूर्वक प्रदोष काल में पूजा विधि
प्रदोष व्रत की पूजा सदैव प्रदोष काल में ही प्रारंभ करनी चाहिए, क्योंकि यह समय भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।
- सबसे पहले पूजन स्थल पर विराजमान सभी प्रतिमाओं पर गंगाजल का छिड़काव कर वातावरण को शुद्ध करें। इसके बाद श्रद्धापूर्वक घी का दीपक प्रज्वलित करें, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
- अब क्रमशः सभी प्रतिमाओं पर तिलक करें। भगवान शिव को चंदन का तिलक, भगवान गणेश को हल्दी-कुमकुम का तिलक और माता पार्वती को कुमकुम का तिलक अर्पित करें। इसके पश्चात सभी देव प्रतिमाओं को अक्षत (चावल) समर्पित करें।
- पूजा का आरंभ भगवान गणेश से करें, क्योंकि उन्हें प्रथम पूज्य माना गया है। उन्हें जनेऊ, दूर्वा, पान-सुपारी, लौंग, इलायची, लाल पुष्प, पुष्प माला, धूप, दीप, भोग और दक्षिणा अर्पित करें।
- इसके बाद शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करें और पुनः गंगाजल से अभिषेक करें। अभिषेक के पश्चात शिवलिंग पर भांग, धतूरा, आक का फूल और बिल्वपत्र चढ़ाएं, जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं। यदि घर में शिवलिंग उपलब्ध न हो, तो निकटवर्ती शिव मंदिर में जाकर अभिषेक किया जा सकता है।
- भगवान शिव की प्रतिमा पर पुष्प माला, सफेद फूल, बिल्वपत्र, आक का फूल, भांग और धतूरा अर्पित करें। इसके साथ ही माता पार्वती को श्रृंगार सामग्री, मौली, पुष्प और पुष्प माला समर्पित करें।
- पूजा के दौरान आप शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं या महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
- अंत में धूप-दीप से भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत आरती करें। इस प्रकार श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा से प्रदोष व्रत संपन्न होता है। भगवान शिव से हमारी यही प्रार्थना है कि आपकी पूजा स्वीकार हो और जीवन में सुख, शांति व कल्याण का संचार हो।
प्रदोष व्रत का उद्यापन विधि
प्रदोष व्रत को विधिपूर्वक पूर्ण करने के लिए उसका उद्यापन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जब भक्त 11 अथवा 26 त्रयोदशी तक नियमित रूप से प्रदोष व्रत का पालन कर ले, तब व्रत के समापन हेतु उद्यापन किया जाता है।
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- उद्यापन सदैव त्रयोदशी तिथि को ही करना चाहिए, ताकि व्रत का संपूर्ण फल प्राप्त हो सके। उद्यापन से एक दिन पूर्व भगवान श्री गणेश का पूजन किया जाता है, जिससे समस्त कार्य निर्विघ्न संपन्न हों। उसी रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण करने की परंपरा भी है, जो वातावरण को भक्तिमय बना देती है।
- उद्यापन के दिन प्रातःकाल शीघ्र उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर एक पवित्र मंडप का निर्माण किया जाता है। मंडप को स्वच्छ वस्त्रों और सुंदर रंगोली से सजाकर तैयार किया जाता है, जिससे पूजा स्थल की पवित्रता और शोभा बढ़े।
- इसके पश्चात हवन किया जाता है। हवन के समय “ॐ उमा सहित शिवाय नमः” मंत्र का एक माला अर्थात 108 बार जाप करते हुए आहुतियाँ दी जाती हैं। हवन में खीर की आहुति विशेष रूप से शुभ और फलदायी मानी गई है।
- हवन पूर्ण होने के बाद भगवान भोलेनाथ की विधिवत आरती की जाती है तथा शांति पाठ कर वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया जाता है।
- अंत में दो ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है और अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इस प्रकार किया गया प्रदोष व्रत का उद्यापन भक्त को पुण्य, सुख, शांति और शिव कृपा प्रदान करता है।
प्रदोष व्रत कब है – Pradosh Vrat Kab Hai in 2026 – 📅 2026 प्रदोष व्रत सूची (तालिका)
| माह | तिथि व दिन | प्रदोष प्रकार | प्रदोष समय | अवधि | त्रयोदशी तिथि प्रारम्भ | त्रयोदशी तिथि समाप्त | मास / पक्ष |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जनवरी | 1 जनवरी, गुरुवार | गुरु प्रदोष | 05:58 PM – 08:28 PM | 02 घं 31 मि | 01:47 PM, 01 जनवरी | 10:22 PM, 01 जनवरी | पौष, शुक्ल |
| जनवरी | 16 जनवरी, शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | 06:06 PM – 08:36 PM | 02 घं 30 मि | 08:16 PM, 15 जनवरी | 10:21 PM, 16 जनवरी | माघ, कृष्ण |
| जनवरी | 30 जनवरी, शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | 06:12 PM – 08:41 PM | 02 घं 29 मि | 11:09 PM, 30 जनवरी | 08:25 PM, 31 जनवरी | माघ, शुक्ल |
| फरवरी | 14 फरवरी, शनिवार | शनि प्रदोष | 06:17 PM – 08:44 PM | 02 घं 27 मि | 04:01 PM, 14 फरवरी | 05:04 PM, 15 फरवरी | फाल्गुन, कृष्ण |
| मार्च | 1 मार्च, रविवार | रवि प्रदोष | 06:20 PM – 07:09 PM | 00 घं 49 मि | 08:43 PM, 28 फरवरी | 07:09 PM, 01 मार्च | फाल्गुन, शुक्ल |
| मार्च | 16 मार्च, सोमवार | सोम प्रदोष | 06:21 PM – 08:44 PM | 02 घं 23 मि | 09:40 PM, 16 मार्च | 09:23 PM, 17 मार्च | चैत्र, कृष्ण |
| मार्च | 30 मार्च, सोमवार | सोम प्रदोष | 06:22 PM – 08:43 PM | 02 घं 21 मि | 07:09 PM, 30 मार्च | 06:55 PM, 31 मार्च | चैत्र, शुक्ल |
| अप्रैल | 15 अप्रैल, बुधवार | बुध प्रदोष | 06:23 PM – 08:42 PM | 02 घं 19 मि | 12:12 PM, 15 अप्रैल | 10:31 PM, 15 अप्रैल | वैशाख, कृष्ण |
| अप्रैल | 28 अप्रैल, मंगलवार | भौम प्रदोष | 06:51 PM – 08:42 PM | 01 घं 50 मि | 06:51 PM, 28 अप्रैल | 07:51 PM, 29 अप्रैल | वैशाख, शुक्ल |
| मई | 14 मई, गुरुवार | गुरु प्रदोष | 06:27 PM – 08:43 PM | 02 घं 16 मि | 11:20 PM, 14 मई | 08:31 PM, 15 मई | ज्येष्ठ, कृष्ण |
| मई | 28 मई, गुरुवार | गुरु प्रदोष | 06:31 PM – 08:46 PM | 02 घं 15 मि | 07:56 PM, 28 मई | 09:50 PM, 29 मई | ज्येष्ठ, शुक्ल |
| जून | 12 जून, शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | 07:36 PM – 08:49 PM | 01 घं 13 मि | 07:36 PM, 12 जून | 04:07 PM, 13 जून | ज्येष्ठ, कृष्ण |
| जून | 27 जून, शनिवार | शनि प्रदोष | 06:38 PM – 08:53 PM | 02 घं 14 मि | 10:22 PM, 26 जून | 12:43 PM, 28 जून | ज्येष्ठ, शुक्ल |
| जुलाई | 12 जुलाई, रविवार | रवि प्रदोष | 06:40 PM – 08:54 PM | 02 घं 15 मि | 02:04 PM, 12 जुलाई | 10:29 PM, 12 जुलाई | आषाढ़, कृष्ण |
| जुलाई | 26 जुलाई, रविवार | रवि प्रदोष | 06:38 PM – 08:54 PM | 02 घं 16 मि | 01:57 PM, 26 जुलाई | 04:14 PM, 27 जुलाई | श्रावण, शुक्ल |
| अगस्त | 10 अगस्त, सोमवार | सोम प्रदोष | 06:33 PM – 08:50 PM | 02 घं 17 मि | 08:00 PM, 10 अगस्त | 04:54 PM, 11 अगस्त | श्रावण, कृष्ण |
| अगस्त | 25 अगस्त, मंगलवार | भौम प्रदोष | 06:25 PM – 08:44 PM | 02 घं 19 मि | 06:20 PM, 25 अगस्त | 07:59 PM, 26 अगस्त | श्रावण, शुक्ल |
| सितंबर | 8 सितंबर, मंगलवार | भौम प्रदोष | 06:16 PM – 08:37 PM | 02 घं 21 मि | 02:42 PM, 08 सितंबर | 12:30 PM, 09 सितंबर | भाद्रपद, कृष्ण |
| सितंबर | 24 सितंबर, गुरुवार | गुरु प्रदोष | 06:06 PM – 08:28 PM | 02 घं 23 मि | 10:50 PM, 23 सितंबर | 11:18 PM, 24 सितंबर | भाद्रपद, शुक्ल |
| अक्टूबर | 8 अक्टूबर, गुरुवार | गुरु प्रदोष | 05:56 PM – 08:21 PM | 02 घं 25 मि | 11:16 PM, 07 अक्टूबर | 10:15 PM, 08 अक्टूबर | आश्विन, कृष्ण |
| अक्टूबर | 23 अक्टूबर, शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | 05:49 PM – 08:15 PM | 02 घं 27 मि | 02:35 PM, 23 अक्टूबर | 01:36 PM, 24 अक्टूबर | आश्विन, शुक्ल |
| नवंबर | 6 नवंबर, शुक्रवार | शुक्र प्रदोष | 05:44 PM – 08:12 PM | 02 घं 28 मि | 10:30 PM, 06 नवंबर | 10:47 PM, 07 नवंबर | कार्तिक, कृष्ण |
| नवंबर | 22 नवंबर, रविवार | रवि प्रदोष | 05:43 PM – 08:12 PM | 02 घं 30 मि | 04:56 PM, 22 नवंबर | 02:36 PM, 23 नवंबर | कार्तिक, शुक्ल |
| दिसंबर | 6 दिसंबर, रविवार | रवि प्रदोष | 05:45 PM – 08:16 PM | 02 घं 31 मि | 12:51 PM, 06 दिसंबर | 02:22 PM, 07 दिसंबर | मार्गशीर्ष, कृष्ण |
| दिसंबर | 21 दिसंबर, सोमवार | सोम प्रदोष | 05:52 PM – 08:23 PM | 02 घं 31 मि | 05:36 PM, 21 दिसंबर | 02:23 PM, 22 दिसंबर | मार्गशीर्ष, शुक्ल |
प्रदोष व्रत के लाभ
प्रदोष व्रत भगवान शिव की उपासना का एक अत्यंत प्रभावशाली और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। जो भक्त पूर्ण श्रद्धा, संयम और सच्ची निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में आने वाले कष्ट धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं। यह व्रत महादेव की कृपा प्राप्त करने का सरल और श्रेष्ठ माध्यम है।
भगवान शिव की विशेष कृपा
जिस भक्त पर भगवान शिव की कृपादृष्टि पड़ जाए, उसके जीवन में किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता। प्रदोष व्रत भक्ति का वह पावन मार्ग है, जो भक्त को अपने आराध्य भोलेनाथ के और अधिक समीप ले जाता है। महादेव को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए भक्त इस व्रत को पूर्ण आस्था और नियमपूर्वक करते हैं। यदि आप भी चाहते हैं कि शिव कृपा सदैव आप पर बनी रहे, तो प्रदोष व्रत अवश्य करें।
भाग्य का उदय
प्रदोष व्रत के प्रभाव से व्यक्ति का भाग्य जागृत होने लगता है। लंबे समय से अटके हुए कार्य बनने लगते हैं और हर महत्वपूर्ण प्रयास में सफलता मिलने लगती है। कई बार कठिन परिश्रम के बावजूद सफलता इसलिए नहीं मिलती, क्योंकि भाग्य साथ नहीं देता। प्रदोष व्रत इस बाधा को दूर कर जीवन में सौभाग्य का संचार करता है।
मोक्ष की प्राप्ति
मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति माना गया है। प्रदोष व्रत से अर्जित पुण्य व्यक्ति को पापों से मुक्ति दिलाकर जन्म-मृत्यु के चक्र से उद्धार की ओर ले जाता है। जो भक्त परलोक में मोक्ष की कामना रखते हैं, उन्हें यह व्रत विधि-विधान और श्रद्धा के साथ अवश्य करना चाहिए।
उत्तम स्वास्थ्य का वरदान
प्रदोष व्रत न केवल आध्यात्मिक, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना गया है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति निरोगी रहता है और परिवार के सदस्यों को भी अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद मिलता है। रोग, मानसिक तनाव और शारीरिक कष्ट दूर होकर जीवन सुखमय बनता है।
संतान सुख की प्राप्ति
संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले दंपति यदि भगवान शिव और माता पार्वती की सच्चे मन से आराधना करें, तो उन्हें शीघ्र फल प्राप्त होता है। शिव-पार्वती की कृपा से न केवल संतान का सुख मिलता है, बल्कि संतान के दीर्घायु और स्वस्थ जीवन का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।
इस प्रकार प्रदोष व्रत जीवन के हर क्षेत्र में कल्याण, शांति और सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली व्रत है।
प्रदोष व्रत भगवान शिव की भक्ति, श्रद्धा और संयम का एक दिव्य मार्ग है। सच्चे मन और विधि-विधान से किया गया यह व्रत जीवन के कष्टों को दूर कर सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। महादेव अपने भक्तों की भावना को देखते हैं और उन पर सदैव अपनी कृपादृष्टि बनाए रखते हैं। यदि आप भी शिव कृपा, पारिवारिक सुख और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखते हैं, तो प्रदोष व्रत अवश्य करें।
हर-हर महादेव। 🙏
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