भगवान परशुरामजी की आरती – Parshuram Ji Ki Aarti

श्री परशुराम आरती का – सार (भावार्थ)

भगवान परशुरामजी की आरती धर्म-रक्षा, न्याय, तप, वीरता और करुणा के अद्भुत संतुलन को व्यक्त करती है। आरती का सार यह स्पष्ट करता है कि भगवान परशुराम केवल परशु (कुल्हाड़ी) धारण करने वाले योद्धा ही नहीं, बल्कि वेद–शास्त्रों के ज्ञाता, ब्राह्मण कुल के रक्षक और अधर्म के नाशक दिव्य अवतार हैं।

आरती की शुरुआत में उन्हें परशुधारी स्वामी कहकर नमन किया गया है—ऐसे अवतारी पुरुष जिनकी सेवा देवता, मनुष्य और मुनि करते हैं। वे श्रीहरि के अवतार हैं, इसलिए उनका जीवन धर्म और न्याय की स्थापना के लिए समर्पित है।

आगे उनके वंश और जन्म का गौरवपूर्ण वर्णन आता है—वे महर्षि जमदग्नि के पुत्र और माता रेणुका के सुयोग्य संतान हैं। भृगु वंशज होने के कारण उनके तेज और तप की महिमा त्रिभुवन में व्याप्त है। उन्हें नर-सिंह तुल्य साहसी बताकर यह संकेत दिया गया है कि वे संकट के समय उग्र और धर्म के समय करुणामय हैं।

उनके तपस्वी स्वरूप का सुंदर चित्रण मिलता है—कंधे पर जनेऊ, गले में रुद्राक्ष माला, चरणों में खड़ाऊँ, मस्तक पर त्रिपुण्ड तिलक। यह बताता है कि परशुराम जी का योद्धा रूप भी तप, संयम और ब्रह्मचर्य से आलोकित है।

उनके रूप-वर्णन में घन केश, जटा-बद्ध शीश, और दोहरे स्वभाव का उल्लेख है—सुजनों के लिए मधुर व ऋतुमय, जबकि दुष्टों के लिए आंधी समान संहारक। यह न्याय का वह स्वरूप है जिसमें करुणा और कठोरता, दोनों की आवश्यकता पड़ती है।

मुख पर सूर्य-सा तेज, नेत्रों में लालिमा—ये संकेत उनके प्रचंड पराक्रम के हैं। साथ ही वे दीन-हीन, गौ और विप्रों के दिन-रात रक्षक हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उनका शौर्य शोषण के लिए नहीं, बल्कि संरक्षण के लिए है।

हाथों में वर परशु, कंधे पर धनुष-बाण, और वे निगम-आगम (वेद–शास्त्र) के ज्ञाता—यह संयोजन बताता है कि परशुराम जी में ज्ञान और कर्म दोनों की पूर्णता है। वे ब्राह्मण कुल के त्राता हैं, यानी धर्म और विद्या की परंपरा के संरक्षक।

भक्त अंत में भावुक शरणागति प्रकट करता है—“माता-पिता, स्वामी, मित्र-सखा—सब तुम ही हो।” वह अपनी व्यथा रखते हुए प्रभु से अपने बिरद (प्रतिज्ञा) की रक्षा की प्रार्थना करता है। यह पूर्ण आत्मसमर्पण का भाव है।

फलश्रुति में कहा गया है कि जो श्रद्धा से अजर-अमर श्री परशुराम जी की आरती गाता है, उसे सुख-सम्पत्ति और जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है—यह साक्ष्य स्वयं शिव की उपस्थिति में सत्य माना गया है।

समग्र सार

श्री परशुराम जी की यह आरती हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए शक्ति आवश्यक है, और शक्ति को दिशा देने के लिए ज्ञान। परशुराम जी का जीवन न्याय, तप, संयम और करुणा का आदर्श है। उनकी उपासना से साहस, विवेक और धर्मनिष्ठा का संचार होता है—यही इस आरती का गहन आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी सार है।

भगवान परशुरामजी की आरती – Parshuram Ji Ki Aarti

ॐ जय परशुधारी,स्वामी जय परशुधारी।
सुर नर मुनिजन सेवत,श्रीपति अवतारी॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

जमदग्नी सुत नर-सिंह,मां रेणुका जाया।
मार्तण्ड भृगु वंशज,त्रिभुवन यश छाया॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

कांधे सूत्र जनेऊ,गल रुद्राक्ष माला।
चरण खड़ाऊँ शोभे,तिलक त्रिपुण्ड भाला॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

ताम्र श्याम घन केशा,शीश जटा बांधी।
सुजन हेतु ऋतु मधुमय,दुष्ट दलन आंधी॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

मुख रवि तेज विराजत,रक्त वर्ण नैना।
दीन-हीन गो विप्रन,रक्षक दिन रैना॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

कर शोभित बर परशु,निगमागम ज्ञाता।
कंध चाप-शर वैष्णव,ब्राह्मण कुल त्राता॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

माता पिता तुम स्वामी,मीत सखा मेरे।
मेरी बिरद संभारो,द्वार पड़ा मैं तेरे॥

ॐ जय परशुधारी…..॥

अजर-अमर श्री परशुराम की,आरती जो गावे।
‘पूर्णेन्दु’ शिव साखि,सुख सम्पति पावे॥

ॐ जय परशुधारी…..॥


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🙏 भगवान परशुराम जी आप सभी को विवेक, साहस, धर्मनिष्ठा और उत्तम जीवन मूल्यों का आशीर्वाद प्रदान करें।

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