मंगलवार आरती – मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता – Mangal Murti Jai Jai Hanumanta

मंगलवार आरती – मंगल मूरति हनुमान जी का – सार (भावार्थ)

यह आरती श्री हनुमान जी के मंगलमय, पराक्रमी और भक्तवत्सल स्वरूप का भावपूर्ण गुणगान है। इसमें उन्हें “मंगल मूरति” कहा गया है—अर्थात् वे स्वयं मंगल के साक्षात् स्वरूप हैं, जो अपने भक्तों के जीवन में शुभता, सुरक्षा और साहस का संचार करते हैं। आरती का भाव यह स्पष्ट करता है कि हनुमान जी केवल शक्ति के देवता नहीं, बल्कि करुणा, भक्ति और धर्म की रक्षा करने वाले दिव्य संरक्षक हैं।

आरती में उनके दिव्य अस्त्र-शस्त्र और वेश का उल्लेख है—हाथ में वज्र और ध्वजा, कंधे पर जनेऊ, और संयमी योद्धा का तेजस्वी रूप। उन्हें शंकर सुवन, केसरी नंदन कहा गया है, जिससे यह भाव प्रकट होता है कि वे शिव-तत्व से उत्पन्न होकर असाधारण तेज, प्रताप और लोककल्याण के लिए अवतरित हुए हैं। उनकी महिमा ऐसी है कि संपूर्ण जगत उन्हें वंदन करता है।

अगली पंक्तियों में हनुमान जी की युद्ध-वीरता और अजेय पराक्रम का चित्रण है—लाल लंगोट, लाल नेत्र, पर्वत समान दृढ़ सेना और रणभूमि में गूंजती किलकारियाँ। वे काल-अकाल में भी धर्म-युद्ध के लिए तत्पर रहते हैं और अधर्म के विनाश में अपार क्रोध और सामर्थ्य दिखाते हैं। यह बताता है कि वे संकट की घड़ी में भक्तों के लिए ढाल बनकर खड़े होते हैं।

आरती हनुमान जी की पहचान को और गहराई देती है—वे रामदूत, अतुलित बलधाम, अंजनि पुत्र, पवनसुत, महावीर, बजरंगी हैं। वे कुमति का निवारण कर भक्तों को सुमति प्रदान करते हैं, अर्थात् अज्ञान, भय और भ्रम को दूर करके विवेक, धैर्य और सही दिशा का मार्ग दिखाते हैं। यह उन्हें शक्ति के साथ-साथ बुद्धि और भक्ति का संरक्षक सिद्ध करता है।

आगे बताया गया है कि हनुमान जी अपने भक्तों पर समृद्धि और विजय की वर्षा करते हैं—भूमि, राज्य, प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं और शत्रुओं का विनाश कर बंधन, रोग और विपत्तियों से मुक्ति दिलाते हैं। वे केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि भीतर के भय, आलस्य और दुर्बलता से भी रक्षा करते हैं।

आरती में यह भी कहा गया है कि हनुमान जी अपने तेज को स्वयं संयमित रखते हैं, परंतु जब आवश्यक हो, तो तीनों लोक उनके सामर्थ्य से कांप उठते हैं। जो उनकी शरण में आता है, उसे निर्भयता और सुख की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे हर परिस्थिति में अपने भक्तों के रक्षक हैं।

उनके भजन-कीर्तन को संसार के कल्याण का साधन बताया गया है। वे करुणा से भक्तों पर अपनी सुखदृष्टि डालते हैं और अधर्म को दंडित करते हैं। उनके स्पर्श मात्र से ही नकारात्मक शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। यह भाव हनुमान जी को धर्म के दंडाधिकारी और भक्तों के हितैषी के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

आरती में पवनपुत्र और धरती के पूत—दोनों तत्वों के संगम का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि वे आकाशीय शक्ति और धरातलीय करुणा, दोनों का संतुलन हैं। जो भी प्राणी शरणागत होकर उनके चरणों में शीश नवाता है, उसे संरक्षण, मार्गदर्शन और शक्ति प्राप्त होती है।

भक्त अपने जीवन की पीड़ाओं का निवेदन करते हैं—रोग, शोक, दरिद्रता, दुःख, बंधन, ऋण और शत्रुता। आरती स्पष्ट करती है कि इन सभी संकटों को दूर करने वाले केवल महावीर हनुमान ही हैं। वे दरिद्रता का दहन करते हैं, ऋण-त्रास और रोग-दुःख का नाश करते हैं, शत्रुओं को चरणों का सेवक बनाते हैं और अपने सेवकों को निर्भयता प्रदान करते हैं।

अंत में भक्त हनुमान जी से विनती करता है कि वे इस सेवा को स्वीकार करें और मंगल, ऐश्वर्य तथा महाधन प्रदान करें—यहाँ महाधन का अर्थ केवल भौतिक संपदा नहीं, बल्कि साहस, सद्बुद्धि, भक्ति और आध्यात्मिक समृद्धि भी है। समापन में यह फल बताया गया है कि जो व्यक्ति श्री मंगल जी की यह आरती हनुमान जी सहित श्रद्धा से गाता है, उसके मनोरथ सिद्ध होते हैं और अंततः उसे विष्णु-लोक (मोक्ष मार्ग) की प्राप्ति होती है।

मंगलवार की यह आरती हनुमान जी की वीरता, करुणा, भक्ति और रक्षक-स्वरूप का पूर्ण दर्शन कराती है। यह सिखाती है कि सच्ची शरणागति से रोग-शोक, दरिद्रता, ऋण, भय और शत्रुता का अंत होता है, और जीवन में मंगल, साहस, विवेक तथा आध्यात्मिक उन्नति का उदय होता है। जो भक्त नियमित श्रद्धा और समर्पण से इस आरती का पाठ करता है, वह संकटों से मुक्त होकर सुख, सुरक्षा और प्रभु-कृपा का अनुभव करता है।

मंगलवार आरती – मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता – Mangal Murti Jai Jai Hanumanta

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता। मंगल-मंगल देव अनन्ता॥

हाथ वज्र और ध्वजा विराजे, कांधे मूंज जनेऊ साजे।
शंकर सुवन केसरी नन्दन, तेज प्रताप महा जग वन्दन॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

लाल लंगोट लाल दोऊ नयना, पर्वत सम फारत है सेना।
काल अकाल जुद्ध किलकारी, देश उजारत क्रुद्ध अपारी॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

रामदूत अतुलित बलधामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

भूमि पुत्र कंचन बरसावे, राजपाट पुर देश दिवावे।
शत्रुन काट-काट महिं डारे, बन्धन व्याधि विपत्ति निवारें॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक तें कांपै।
सब सुख लहैं तुम्हारी शरणा, तुम रक्षक काहू को डरना॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

तुम्हरे भजन सकल संसारा, दया करो सुख दृष्टि अपारा।
रामदण्ड कालहु को दण्डा, तुम्हरे परस होत जब खण्डा॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

पवन पुत्र धरती के पूता, दोऊ मिल काज करो अवधूता।
हर प्राणी शरणागत आये, चरण कमल में शीश नवाये॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

रोग शोक बहुत विपत्ति घिराने, दरिद्र दुःख बन्धन प्रकटाने।
तुम तज और न मेटनहारा, दोऊ तुम हो महावीर अपारा॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

दारिद्र दहन ऋण त्रासा, करो रोग दुःख स्वप्न विनाशा।
शत्रुन करो चरन के चेरे, तुम स्वामी हम सेवक तेरे॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

विपत्ति हरण मंगल देवा, अङ्गीकार करो यह सेवा।
मुदित भक्त विनती यह मोरी, देऊ महाधन लाख करोरी॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥

श्री मंगल जी की आरती, हनुमत सहितासु गाई।
होई मनोरथ सिद्ध जब, अन्त विष्णुपुर जाई॥

मंगल मूरति जय जय हनुमन्ता॥


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