बृहस्पति देव की आरती – Brihaspati Dev Ji Ki Aarti

बृहस्पति देव की आरती का – सार (भावार्थ)

बृहस्पति देव की आरती देवगुरु बृहस्पति देव की महिमा, करुणा और ज्ञान-स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन करती है। बृहस्पति देव को यहाँ केवल ग्रह-देवता नहीं, बल्कि पूर्ण परमात्मा, अन्तर्यामी और जगत के स्वामी के रूप में स्मरण किया गया है—जो प्रत्येक जीव के हृदय की भावना को जानते हैं और संसार के संचालन में दिव्य मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

आरती की शुरुआत भक्त की समर्पण भावना से होती है, जहाँ वह कदली फल, मेवा और भोग अर्पित करता है। यह संकेत करता है कि भक्त अपनी श्रद्धा के साथ-साथ अपने कर्म और साधनों को भी प्रभु चरणों में अर्पण करता है। भोग केवल सामग्री नहीं, बल्कि कृतज्ञता और भक्ति का प्रतीक है।

अगली पंक्तियों में बृहस्पति देव को जगतपिता, जगदीश्वर और सबके स्वामी कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि वे समस्त सृष्टि के पोषक, नियंता और धर्म-मार्ग के प्रदाता हैं। उनके चरणामृत को अत्यंत पवित्र बताया गया है, जो भक्त के सभी पापों का नाश करता है और जीवन को निर्मल बनाता है।

आरती में यह भी कहा गया है कि बृहस्पति देव सकल मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। जो भक्त तन, मन और धन से उनकी शरण में आता है, उसके लिए प्रभु स्वयं द्वार पर प्रकट होकर कृपा करते हैं। यह भाव बताता है कि सच्चा समर्पण मिलने पर ईश्वर दूर नहीं रहते, बल्कि भक्त के जीवन में प्रत्यक्ष सहायता बनकर आते हैं।

बृहस्पति देव को दीनदयाल, दयानिधि और भक्तों के हितैषी कहा गया है। वे न केवल पाप और दोषों का नाश करते हैं, बल्कि भव-बन्धन यानी जन्म-मृत्यु के चक्र से भी मुक्त करने वाले हैं। यह आरती उनके करुणामय स्वरूप को रेखांकित करती है—जहाँ वे केवल दंडदाता नहीं, बल्कि उद्धारकर्ता हैं।

आगे यह बताया गया है कि वे सभी संशयों को दूर करने वाले और विषय-विकारों को मिटाने वाले हैं। अर्थात्, बृहस्पति देव की कृपा से मन की अस्थिरता, भ्रम, लालसा और आसक्ति शांत होती है, और साधक को विवेक, शुद्धता और संतुलन की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि उन्हें संतों के सुखकारी और ज्ञान का अधिपति माना गया है।

आरती के अंत में भक्ति का फल बताया गया है—जो कोई प्रेम सहित बृहस्पति देव की आरती का गान करता है, उसे निश्चय ही मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। यह केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति, शांति और सद्बुद्धि का भी संकेत है। लेखक (जेष्टानन्द) स्वयं इस सत्य का साक्षी बनकर इसे प्रमाणित करता है।

बृहस्पति देव की यह आरती ज्ञान, करुणा, पवित्रता और समर्पण का अनुपम संगम है। यह सिखाती है कि देवगुरु की शरण में आने से पापों का नाश, संशयों की समाप्ति, विषय-विकारों से मुक्ति और जीवन के सभी शुभ मनोरथों की पूर्ति संभव है। जो भक्त नियमित, प्रेम और पूर्ण समर्पण के साथ इस आरती का पाठ करता है, उसके जीवन में विवेक, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति सुनिश्चित होती है।

बृहस्पति देव की आरती – Brihaspati Dev Ji Ki Aarti

ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।
छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप दोष सब हर्ता,भव बन्धन हारी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो।
विषय विकार मिटाओ, सन्तन सुखकारी॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे।
जेष्टानन्द बन्दसो , सो निश्चय पावे॥

ॐ जय बृहस्पति देवा॥


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