निर्वाण षट्कम्: शिवोऽहम् का अर्थ, 6 श्लोक, लाभ और पाठ विधि

1. प्रस्तावना – निर्वाण षट्कम् क्या है? “शिवोऽहम्” का वह मंत्र जो बदल दे आपकी पहचान

‘निर्वाण षट्कम्’ नाम सुनते ही अक्सर मन में रहस्यमयी और गूढ़ स्तोत्र की छवि बनती है, पर सच तो यह है कि यह आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और सीधा गणित है। ‘निर्वाण’ का शाब्दिक अर्थ है ‘बुझ जाना’ – ठीक वैसे जैसे दीपक की लौ हवा में विलीन हो जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका अर्थ है जन्म-मरण के बंधन से पूर्ण मुक्ति और समस्त भ्रमों के जल जाने की अवस्था। जब ‘अहं’ (मैंपन) पूरी तरह समाप्त हो जाता है और शेष केवल वह शुद्ध सत्ता रह जाती है, उसे ही निर्वाण कहते हैं। ‘षट्कम्’ का अर्थ है छः श्लोकों का समूह। यही कारण है कि आदि शंकराचार्य के इस अद्वैत रत्न को ‘निर्वाण षट्कम्’ कहा जाता है। इन छः श्लोकों में वह सम्पूर्ण वेदांत का सार समा गया है, जिसे उपनिषदों की गूढ़ बातों को समझने के लिए शायद जन्मों की साधना करनी पड़ती है। इस स्तोत्र का प्रारंभ ही एक धमाकेदार ‘न’ (नहीं) से होता है – “न मनो बुद्धि रहंकारश्चित्तं नैव” (मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार, न चित्त)।

‘शिवोऽहम्’ का असली मतलब – क्या हम भगवान शिव बन जाते हैं?

इस स्तोत्र का मूल मंत्र है – ‘शिवोऽहम्, शिवोऽहम्’ (मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ)। क्या इसका मतलब यह है कि हम नीलकंठ, चंद्रशेखर शिव बन जाते हैं? नहीं। यहाँ ‘शिव’ शब्द न तो किसी देवता विशेष का वाचक है, न किसी रूप-आभूषण का। ‘शिव’ का अर्थ है – ‘शुभ’, ‘कल्याण’, ‘मंगलमय’, ‘शुद्ध चैतन्य’। कठोपनिषद में कहा गया है कि आत्मा न जन्मती है, न मरती है। आत्मा अविनाशी, नित्य, शुद्ध और बुद्ध है। यह स्तोत्र उसी परम सत्य को प्रतिपादित करता है। यह सीधे ‘तत्त्वमसि’ (तू वह है) और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) जैसे महावाक्यों तक पहुँचने का सरलतम पुल है।

आदि शंकराचार्य का “प्रत्यक्ष ज्ञान” रत्न

इस स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य ने अद्वैत (द्वैत रहित) के उस अनुभव को शब्द देने के लिए की थी, जो उन्हें अत्यंत प्रत्यक्ष था। इसकी पृष्ठभूमि के बारे में एक प्रसिद्ध कथा है: जब शंकराचार्य एक बालक तोत्तकाचार्य को शिष्य बनाकर हिमालय ले गए, तो बालक ठीक से मंत्र भी नहीं बोल पाता था। लेकिन वह सिर्फ अपने गुरु की ‘शिवोऽहम्’ की सीख को ध्यान में रखता था। एक दिन संकट में उसी बालक ने दिव्य ज्ञान प्राप्त कर गुरु का कार्य पूरा किया। शंकराचार्य ने इसी मौके पर यह स्तोत्र सुनाकर बताया कि रटने-लिखने से नहीं, बल्कि ‘स्वयं को पहचानने’ से ज्ञान होता है। यही कारण है कि निर्वाण षट्कम् को पढ़कर अचंभा नहीं होता, बल्कि ‘गहरी नींद से जागने जैसा प्रत्यक्ष अनुभव’ होता है। यह पूजा-पाठ का स्तोत्र नहीं है, यह गहन चिंतन और आत्म-निरीक्षण का स्तोत्र है। इसके छः श्लोक मानो आपको अपने “असली स्वरूप” की तरफ एक-एक कदम बढ़ाने का आदेश देते हैं।

“न मनो बुद्धि” – क्यों खारिज कर रहे हैं हम अपने ही अंगों को?

स्तोत्र की सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है – “न मनो बुद्धि रहंकारश्चित्तं नैव, न च श्रोत्र जिह्वा न च घ्राण नेत्रम्” (मैं मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार, न चित्त, न कान, न जीभ, न नाक और न आँख हूँ)।
यह एक चौंकाने वाला बयान है। हमें सिखाया गया है कि हमारा शरीर, हमारा मन ही हमारी पहचान है। लेकिन यहाँ शंकराचार्य कहते हैं – **बंद आँखों में जो ‘अंधेरा’ दिखता है, वह भी तुम नहीं हो। खुले आसमान का नीला रंग भी तुम नहीं हो। चल रहे विचार – ‘मैं दुखी हूँ, मैं अमीर हूँ’ – उस सबसे परे जो ‘जानने वाला’ स्थिर पड़ा है, वही तुम हो।
यही निर्वाण षट्कम् की खूबी है – यह हमारे अंदर के उस मूक, आनंदस्वरूप चैतन्य को हमारे सामने एक दर्पण की तरह रख देता है। एक बार यह पक्का भाव जम जाए कि “मैं यह शरीर नहीं, मैं तो वह साक्षी हूँ”, तो फिर लोभ, क्रोध, चिंता आपको छू ही नहीं पाती। यही इस स्तोत्र का रहस्य है और यही इसकी शक्ति है।

2. निर्वाण षट्कम् – मूल श्लोक, विस्तृत हिंदी अर्थ एवं गहन भावार्थ

निर्वाण षट्कम् केवल पढ़ने का स्तोत्र नहीं – यह अहंकार को पिघलाने का सबसे प्रभावी आध्यात्मिक उपकरण है। आदि शंकराचार्य हमें सिखाते हैं – जो दिख रहा है, वह तुम नहीं हो। जो बदल रहा है, वह तुम नहीं हो। जो पैदा होता और मरता है, वह तुम नहीं हो। तुम तो वह हो, जो इस सबका साक्षी है – शुद्ध, शांत, प्रकाशमय और आनंदघन।

इस स्तोत्र का प्रतिदिन अर्थ समझकर पाठ करें। धीरे-धीरे ‘शिवोऽहम्’ का भाव नींद, जागने और सपने में भी स्थिर हो जाता है। यही निर्वाण (मोक्ष) का प्रत्यक्ष अनुभव है।

 

निर्वाण षट्कम् लिरिक्स

मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ १॥

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ २॥

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ३॥

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ४॥

न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ५॥

अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥ ६॥

मूल श्लोक, विस्तृत हिंदी अर्थ एवं गहन भावार्थ

निर्वाण षट्कम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अद्वैत वेदांत का सबसे प्रभावशाली स्तोत्र है। यह ‘शिवोऽहम्’ (मैं शिव हूँ) की घोषणा का अमृत है। नीचे सभी 6 श्लोकों को सारणीबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है:

निर्वाण षट्कम् – मूल श्लोक, विस्तृत हिंदी अर्थ एवं गहन भावार्थ

श्लोक क्रम मूल संस्कृत पाठ विस्तृत हिंदी अर्थ गहन भावार्थ
१. मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् । न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे ।।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त नहीं हूँ। मैं कान, जीभ, नाक और आँखें (ज्ञानेंद्रियाँ) भी नहीं हूँ। मैं आकाश, पृथ्वी, तेज और वायु (पंचमहाभूत) भी नहीं हूँ। मैं तो चित् (चेतना) और आनंद का स्वरूप हूँ – मैं शिव (कल्याणमय, शुद्ध चैतन्य) हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह श्लोक स्थूल शरीर और स्थूल जगत के तत्वों से अपनी अस्मिता को अलग करता है। ‘मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त’ – ये सब अंत:करण के चार भाग हैं, जो प्रतिक्षण बदलते हैं। ‘ज्ञानेंद्रियाँ’ सीमित हैं। ‘पंचमहाभूत’ नाशवान हैं। जो स्थिर, शाश्वत, नित्य परिवर्तनशील इन सबका ‘साक्षी’ है – वही वास्तविक ‘मैं’ है। ‘शिवोऽहम्’ का यहाँ अर्थ – ‘दिव्य, शुभ और एकरस चैतन्य’।
२. न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः । न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः ।।
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं प्राण (जीवनी शक्ति) नामक तत्व नहीं हूँ, न ही पाँचों वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) हूँ। मैं सात धातु (रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र) नहीं हूँ, न ही पाँचों कोश (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) हूँ। मैं वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा (पाँच कर्मेंद्रियाँ) भी नहीं हूँ। मैं तो चिदानंद स्वरूप हूँ – मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह श्लोक सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से परे जाता है। प्राण और पाँच वायु शरीर को चलाते हैं, लेकिन सांस थमने पर भी ‘जागरूकता’ बनी रहती है। पाँच कोश (आवरण) – खाना, साँस, मन-बुद्धि, आनंद के तमाम अनुभव – सब उधार के हैं। जब ये सब समाप्त हों, तब भी जो शेष रहे – वह ‘शुद्ध चैतन्य’। कर्मेंद्रियाँ (हाथ-पैर-वाणी) केवल क्रिया के उपकरण हैं, ‘मैं’ नहीं।
३. न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ । मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः ।।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
न मुझमें द्वेष है, न राग (आसक्ति)। न मुझमें लोभ है, न मोह (भ्रम)। न मुझमें मद (घमंड/नशा) है, न मात्सर्य (ईर्ष्या/जलन) का भाव है। न मैं धर्म हूँ, न अर्थ, न काम, न मोक्ष। मैं तो चिदानंद स्वरूप हूँ – मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह मनोविकारों और चारों पुरुषार्थों से ‘मैं’ की अलगता स्थापित करता है। राग-द्वेष, लोभ-मोह, मद-मात्सर्य ये मन के विकार हैं – आत्मा में इनका लेशमात्र नहीं। सबसे बड़ा चौंकाने वाला वक्तव्य – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष भी ‘मैं’ नहीं हैं। अर्थात ‘मैं वह पुण्यात्मा’ या ‘मुक्ति पाने वाला’ – यह भी एक भ्रम है। ‘मैं’ तो उस परम सत्ता का अंश है, जिसे पाना, छोड़ना, या भोगना संभव नहीं।
४. न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम् । न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं पुण्य नहीं हूँ, पाप नहीं हूँ। मैं सुख नहीं हूँ, दुःख नहीं हूँ। मैं मंत्र नहीं हूँ, तीर्थ नहीं हूँ। मैं वेद नहीं हूँ, यज्ञ नहीं हूँ। मैं भोजन, भोज्य पदार्थ, और खाने वाला भी नहीं हूँ। मैं तो चिदानंद स्वरूप हूँ – मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह श्लोक समस्त द्वंद्वों और साधनों से परे होने का सूत्र देता है। पुण्य या पाप – आत्मा पर कुछ भी लिपटता नहीं। सुख-दुःख मन के भाव हैं। मंत्र-तीर्थ-वेद-यज्ञ ब्रह्म को जानने के सहायक मात्र, स्वयं लक्ष्य नहीं। सबसे गूढ़ पंक्ति – ‘अहं न भोजनम्, न भोज्यम्, न भोक्ता’। अर्थात भोजन, खाया गया पदार्थ और खाने वाले का त्रिपुटी (भेद) भी मैं नहीं हूँ। त्रिपुटी के समाप्त होने पर ही शुद्ध चैतन्य का अनुभव होता है।
५. न मे मृत्युशङ्का न मे जातिभेदः । पिता नैव मे नैव माता न जन्म ।।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मुझे मृत्यु का भय नहीं है, मेरी कोई जाति का भेद नहीं है। मेरा पिता नहीं है, माता नहीं है, जन्म नहीं है। मेरा कोई बन्धु नहीं है, कोई मित्र नहीं है। मैं न गुरु हूँ, न शिष्य। मैं तो चिदानंद स्वरूप हूँ – मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह श्लोक शरीर से जुड़े सारे सामाजिक, जैविक और मानसिक लेबलों को नकारता है। अगर आप ‘मैं आत्मा हूँ’, तो आप जन्म-मृत्यु से रहित हैं। जाति, गोत्र, माता, पिता देह के संबंध हैं – आत्मा के नहीं। बंधु-मित्र-गुरु-शिष्य सब परिस्थितिजन्य, सीमित – आत्मा का कोई रक्त संबंध, कोई सामाजिक पहचान नहीं। यह नातों और लेबलों के जाल से निकलने का आह्वान है।
६. अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो । विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् ।।
न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः । चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥
मैं निर्विकल्प (विकल्पों से परे, भेद-रहित) हूँ, निराकार (आकार-रहित) हूँ। समस्त इंद्रियों से सर्वत्र व्याप्त (विभु) होने के कारण (या मैं उस परमव्यापी का अंश हूँ)। मुझमें आसक्ति नहीं, न ही मैं मुक्ति हूँ, न मैं प्रमेय (मापा/अनुमानित किया जाने वाला) हूँ। मैं तो चिदानंद स्वरूप हूँ – मैं शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। यह निगमन (समापन) श्लोक सभी निषेधों के बाद सकारात्मक पहचान देता है। ‘निर्विकल्प’ – ‘यह अच्छा, यह बुरा’ ऐसा कोई भेद नहीं। ‘निराकार’ – न रूप, न सीमा। ‘विभुत्वाच्च सर्वत्र’ – वह सत्ता सब जगह समान रूप से व्याप्त है (न कहीं अधिक, न कहीं कम)। ‘न च आसङ्गतम्’ – उसका किसी से कोई लगाव/रिश्ता नहीं। ‘नैव मुक्तिः’ – ‘मुक्ति’ भी कोई उपलब्धि नहीं – वह तो स्वरूप ही है। ‘न मेयः’ – इसको तराजू से नहीं तोला जा सकता, घड़ी से नहीं मापा जा सकता। वह अपरिमेय, असीम, शुद्ध चैतन्य है। ‘शिवोऽहम्’ की दोहराई यहाँ सर्वोच्च स्थिति की घोषणा है।

त्वरित सारांश (श्लोक-वार मुख्य निषेध)

श्लोक निषेध (जो ‘मैं’ नहीं हूँ) मुख्य सकारात्मक पहचान
मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, ज्ञानेंद्रियाँ, पंचमहाभूत चिदानंद, शिव
प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश, कर्मेंद्रियाँ चिदानंद, शिव
राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चिदानंद, शिव
पुण्य, पाप, सुख, दुःख, मंत्र, तीर्थ, वेद, यज्ञ, भोजन-भोक्ता-भोज्य चिदानंद, शिव
मृत्यु-भय, जाति-भेद, पिता-माता, जन्म, बंधु-मित्र, गुरु-शिष्य चिदानंद, शिव
विकल्प, आकार, आसक्ति, मुक्ति (एक उपलब्धि के रूप में), प्रमेयता निर्विकल्प, निराकार, विभु, असंग, अमेय, चिदानंद शिव

3. निर्वाण षट्कम् – पाठ का सही समय और विधि (विस्तार से)

निर्वाण षट्कम् कोई साधारण स्तोत्र नहीं है – यह आत्म-साक्षात्कार का वैज्ञानिक उपकरण है। इसलिए इसके पाठ का समय और विधि भी उतनी ही सारगर्भित है, जितना इसका अर्थ। आदि शंकराचार्य ने इस स्तोत्र की रचना ज्ञान मार्ग के साधकों के लिए की थी । आइए, जानते हैं इसके सही समय और विस्तृत विधि को।

निर्वाण षट्कम् – पाठ का सही समय और विधि

सर्वोत्तम समय – प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त

ब्रह्ममुहूर्त वह समय है जब सारी सृष्टि शांत होती है, मन तरोताजा होता है, और प्रकृति आपको ध्यान के लिए आमंत्रित करती है। यह सूर्योदय से लगभग 1 घंटा 36 मिनट पहले शुरू होता है। इस समय रजोगुण और तमोगुण न्यूनतम होते हैं और सत्वगुण अपने चरम पर होता है । यही कारण है कि उपनिषदों में ब्रह्ममुहूर्त में जागने और आत्म-चिंतन का विशेष आग्रह किया गया है।

स्वामी शिवानंद सरस्वती के अनुसार – ब्रह्ममुहूर्त में किया गया जप, ध्यान और अध्ययन हज़ारों गुना अधिक प्रभावशाली होता है, क्योंकि उस समय विश्व की ऊर्जा सात्विक होती है।

प्रतिदिन – प्रातः और शाम की संध्या

यदि ब्रह्ममुहूर्त में न उठ सकें, तो प्रातःकाल (सूर्योदय के बाद तक) पाठ कर सकते हैं। इसके अलावा संध्या काल (सूर्यास्त के आसपास) भी उत्तम माना गया है। प्रातःकाल का पाठ मन को दिन भर स्थिर और शांत रखता है। शाम का पाठ दिनभर की थकान और तनाव को निकालकर गहरी नींद में सहायक होता है।

नियमितता: निर्वाण षट्कम् का प्रतिदिन पाठ इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि ‘मैं शरीर हूँ’ की जड़ बड़ी पुरानी है। इसके अभ्यास से ही ‘मैं चैतन्य हूँ’ की पहचान धीरे-धीरे गहरी होती है।

विशेष अवसर: शिवरात्रि, प्रदोष, अमावस्या और सावन मास में तो इसका पाठ विशेष लाभ देता है।

पाठ की विस्तृत विधि – चरणबद्ध

चरण 1: स्नान एवं स्वच्छता

  • प्रातःकाल स्नान के बाद ही पाठ करें। यदि संध्या में पाठ करें, तो हाथ-पैर धोकर शुद्ध हो जाएँ

  • श्वेत या पीले वस्त्र पहनें – ये रंग सत्वगुण के प्रतीक हैं

चरण 2: दिशा और आसन

  • पूर्व दिशा (सूर्य की दिशा) या उत्तर दिशा (हिमालय/कैलाश की दिशा) की ओर मुख करें

  • श्वेत, पीले या कुश का आसन बिछाकर बैठें

चरण 3: ध्यान और चित्र

  • अपने सामने शिवलिंग या आदि शंकराचार्य का चित्र रखें

  • आदि शंकराचार्य को इस स्तोत्र का प्रवर्तक और अद्वैत परंपरा के सर्वोच्च आचार्य माना गया है, उनका ध्यान करें

चरण 4: दीपक और सुगंध

  • घी या कपूर का दीपक जलाएँ – यह अज्ञान के अंधकार को मिटाने का प्रतीक है

  • चंदन या अगरबत्ती जलाने से वातावरण शुद्ध होता है और मन एकाग्र होता है

चरण 5: पाठ का क्रम

  1. पहले प्राणायाम (5-10 गहरे श्वास) से मन को स्थिर करें

  2. ’ का 3 बार उच्चारण करें

  3. अब निर्वाण षट्कम् के छह श्लोकों को एक-एक करके, साफ उच्चारण में पढ़ें

  4. हर श्लोक के पश्चात् एक सांस रोककर अर्थ पर मनन करें

चरण 6: पाठ के बाद – जप और समापन

  • श्लोक पूरे होने पर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र की कम से कम 1 माला (108 बार) जप करें

  • यदि माला न हो, तो ‘शिवोऽहम्, शिवोऽहम्’ का मन ही मन कम से कम 11 बार दोहराएँ

  • अंत में क्षमा प्रार्थना करें – “हे शिव/शंकराचार्य, मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करें।”

पाठ विधि – एक नज़र में

चरण कृत्य महत्व
स्नान, श्वेत या पीले वस्त्र सत्वगुण की स्थापना
पूर्व या उत्तर दिशा सूर्य/हिमालय की आभा से जुड़ना
शिवलिंग या शंकराचार्य का चित्र अद्वैत परंपरा का स्मरण
घी/कपूर का दीपक अज्ञान के अंधकार का नाश
साफ उच्चारण के साथ 6 श्लोकों का पाठ प्रत्येक ‘न’ का हृदय पर प्रहार
‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘शिवोऽहम्’ का जप श्रवण से अर्थ धारण तक की यात्रा

जप मंत्र – जब पूरा स्तोत्र याद न हो

यदि पूरा स्तोत्र याद करना कठिन लगे, या समय न हो, तो निर्वाण षट्कम् के एक श्लोक को भी बार-बार पढ़ सकते हैं। या फिर इन दो मंत्रों का जप करें:

  1. ॐ नमः शिवाय – यह मंत्र शुद्ध चैतन्य (शिव) को नमन करता है। इसके साथ यह भाव रखें कि तुम भी उसी चैतन्य का अंश हो।

  2. शिवोऽहम्, शिवोऽहम् – बस ये दो शब्द – ‘मैं शिव हूँ’। इसे मन ही मन साँसों के साथ जोड़ सकते हैं: ‘शि’ – ‘वो’ – ‘अ’ – ‘हम्’। यह तुरंत मन को स्थिर कर देता है।

जैसा कि स्वामी विवेकानंद कहते थे – “प्रत्येक मनुष्य के भीतर अनंत शक्ति विद्यमान है। उस अनंत शक्ति का नाम ‘शिव’ है। ‘शिवोऽहम्’ का जप करते हुए उस शक्ति को जगाओ।”

4. निर्वाण षट्कम् पढ़ने के लाभ – आध्यात्मिक एवं भौतिक (जीवन बदलने वाला अनुभव)

निर्वाण षट्कम् केवल एक स्तोत्र नहीं है – यह स्वयं को पुनः खोजने का एक वैज्ञानिक उपकरण है। जब आप इसके छह श्लोकों को अर्थ सहित नियमित रूप से पढ़ते या सुनते हैं, तो यह आपके भीतर गहरा परिवर्तन लाने लगता है ।

ध्यान रखें: ये सभी लाभ तब ही पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं, जब स्तोत्र को श्रद्धा, भाव और अर्थ समझकर नियमित रूप से पढ़ा जाए। यह कोई जादुई मंत्र नहीं है, यह ‘स्वयं को जानने’ की एक प्रक्रिया है। जैसे साध्गुरु कहते हैं – इसके ध्वनि कंपन धीरे-धीरे आपके और आपके शरीर-मन के बीच थोड़ा-सा स्थान बना देते हैं । और उस छोटे से स्थान में ही मुक्ति का पूरा आकाश समा जाता है। यही इस स्तोत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

निर्वाण षट्कम् पढ़ने के लाभ – आध्यात्मिक एवं भौतिक (जीवन बदलने वाला अनुभव)

आइए, जानते हैं इसके आध्यात्मिक और भौतिक लाभ – जो आपके जीवन के हर पहलू को छू जाते हैं।

आध्यात्मिक लाभ – जो आत्मा को ऊपर उठाएँ

1. अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह का स्वतः ही ह्रास

यह स्तोत्र आपको बार-बार याद दिलाता है – ‘नाहम्, नाहम्’ (मैं यह नहीं हूँ, मैं वह नहीं हूँ)। जब आप यह स्वीकार करते हैं कि क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आप नहीं हैं , तो धीरे-धीरे इन भावों का आप पर असर घटने लगता है। यह आत्म-निरीक्षण का एक प्राकृतिक मार्ग है।

विज्ञान भी मानता है: जब हम ‘मैं’ को किसी भावना से अलग देखना सीख जाते हैं, तो उस भावना का नियंत्रण कमजोर हो जाता है ।

2. मन शांत और स्थिर – चिंता, भय, अवसाद से मुक्ति

शोध और अनुभव बताते हैं कि निर्वाण षट्कम् का नियमित श्रवण मन को गहरी शांति प्रदान करता है । इसके श्लोक मन की बेचैनी को स्थिरता में बदल देते हैं। कई लोगों ने पाया है कि इसके पाठ से अवसाद और चिंता के लक्षण कम होते हैं । जब आप जान जाते हैं कि ‘मैं यह परेशान मन नहीं हूँ’, तो परेशानियाँ आपको छू नहीं पातीं।

3. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त

यह स्तोत्र ‘श्रवण, मनन, निदिध्यासन’ (सुनना, सोचना, गहन ध्यान) की त्रिवेणी है । इसके प्रत्येक श्लोक में ‘नेति-नेति’ (इतना नहीं, यह भी नहीं) की प्राचीन पद्धति से आपको आपके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाता है । यह आपको आपसे मिलाने का सबसे सीधा रास्ता है।

4. ‘मैं कौन हूँ’ का गहन बोध – सबसे बड़ा लाभ

आदि शंकराचार्य ने इस स्तोत्र की रचना इसी एक प्रश्न के उत्तर के रूप में की थी – “तुम कौन हो?” । जब आप यह स्तोत्र पढ़ते हैं, तो आप नकारात्मक रास्ते से सकारात्मक पहचान तक पहुँचते हैं: पहले ‘मैं यह नहीं हूँ’, फिर ‘मैं चिदानंदरूपः शिवोऽहम् हूँ’ । यह बोध जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

भौतिक एवं मानसिक लाभ – जो दुनिया में रहते हुए रखे शांत

5. आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि – क्योंकि तू अविनाशी है

जब आप गहराई से जान लेते हैं कि ‘मैं अविनाशी, शाश्वत चैतन्य हूँ’, तो आपको जीवन की असफलताओं, बुढ़ापे या बीमारी का भय नहीं सताता । यह ज्ञान आपको अदम्य आत्मविश्वास प्रदान करता है। जैसा स्वामी तेजोमयानंद कहते हैं – यह स्तोत्र हमें अभय (निडर) और अचल (स्थिर) बना देता है ।

6. आलस्य, अनिद्रा, उदासी – तीनों दूर

जब मन ‘शिवोऽहम्’ (मैं शिव – शुद्ध चैतन्य हूँ) की पुनरावृत्ति में लीन हो जाता है, तो आलस्य जड़ता और उदासी जैसे तामसिक भाव स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इस स्तोत्र को रात में सोने से पहले सुनने से गहरी और शांत नींद आती है ।

7. भय, शंका, अशांति – सब खत्म

निर्वाण षट्कम् का पाँचवाँ श्लोक सीधा घोषणा करता है – “न मे मृत्युशङ्का” (मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है) । यह एक ऐसा भय है, जो हर दूसरे भय की जड़ में बैठा होता है। जब वह समाप्त हो जाता है, तो जीवन के छोटे-मोटे भय और शंकाएँ अपने आप ढह जाती हैं। अभ्यासकर्ता बताते हैं कि इस स्तोत्र ने उनकी बेचैन मानसिकता को आश्वस्त स्थिरता में बदल दिया है ।

8. सांसारिक झंझटों में भी स्थिरता की शक्ति

यह स्तोत्र आपको ‘असंग’ (बिना लगाव) रहना सिखाता है। इसका अर्थ संसार छोड़ना नहीं है, बल्कि झंझटों से अछूता रहना है। आप पति, पिता, बॉस – सब कुछ बनकर रहते हैं, लेकिन अब इन भूमिकाओं में फँसते नहीं हैं । यही वह स्थिरता है, जो सच्चे ‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (समबुद्धि से कर्म करने) की अवस्था है।

9. वाणी, कर्म और विचार – तीनों की शुद्धि

जब अंदर अहंकार, छल, कपट नहीं रहता, तो बाहर वाणी, कर्म और विचार अपने आप शुद्ध और सात्विक हो जाते हैं । यह स्तोत्र अंतर्मुखी होने का अभ्यास कराता है। नियमित अभ्यासकर्ताओं के अनुसार, इसके पाठ से वाणी में स्पष्टता, सौम्यता और विचारों में शांति उत्पन्न होती है ।

5. निष्कर्ष

निर्वाण षट्कम् आदि शंकराचार्य का वह अद्वैत रत्न है, जो मात्र छः श्लोकों में संपूर्ण वेदांत का सार समेट देता है। यह स्तोत्र हमें बार-बार याद दिलाता है कि हम वह शरीर नहीं हैं, जो बूढ़ा होता है और मर जाता है। हम वह मन नहीं हैं, जो चिंता, क्रोध और लोभ से ग्रस्त रहता है।

हम वह नाम, रूप, जाति, गोत्र या पद नहीं हैं, जो समाज ने हमें दे दिए हैं। हम तो उस शुद्ध, शाश्वत, साक्षी चैतन्य का अंश हैं – जिसे ‘शिव’ (कल्याणमय) कहा गया है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नकारात्मक रास्ते (नेति-नेति) से सकारात्मक पहचान (शिवोऽहम्) तक ले जाता है। यह स्तोत्र अहंकार, लोभ, क्रोध, मोह, भय, चिंता और अशांति – सबको ‘मैं नहीं’ कहना सिखाता है। जब ये सब झूठी पहचानें ढह जाती हैं, तो शेष रहता है केवल ‘चिदानंद’ – चेतना और आनंद का घन

प्रिय पाठक, आपसे कोई कठिन साधना नहीं माँगी जा रही। बस प्रतिदिन प्रातःकाल इस स्तोत्र को अर्थ समझकर पढ़ने का अभ्यास करें। यदि श्लोक याद न भी हों, तो ‘शिवोऽहम्, शिवोऽहम्’ का मन ही मन जप करते रहें। धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि आपका संपूर्ण दृष्टिकोण बदल रहा है। वही दुःख, वही समस्या – लेकिन अब वह आपको बाँध नहीं पाती। यही निर्वाण षट्कम् का चमत्कार है – यह मोक्ष बाद में नहीं, अभी इसी जीवन में – आपके भीतर शांति, स्थिरता और आत्मविश्वास का अनुभव करा देता है। आज ही इसकी शुरुआत करें और अपने भीतर शिवत्व को जगाएँ

6. निर्वाण षट्कम् – सामान्य प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: निर्वाण षट्कम् के रचयिता कौन हैं?
उत्तर: इस स्तोत्र के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं। उन्होंने अद्वैत वेदांत के प्रचार के लिए इसकी रचना की थी।

प्रश्न 2: निर्वाण षट्कम् में कितने श्लोक हैं?
उत्तर: इसमें कुल 6 श्लोक हैं – इसलिए इसे ‘षट्कम्’ कहा जाता है। प्रत्येक श्लोक ‘चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्’ पर समाप्त होता है।

प्रश्न 3: ‘निर्वाण’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘निर्वाण’ का अर्थ है – वायु की तरह पूर्ण रूप से बुझ जाना। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका अर्थ है – त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) से हमेशा के लिए मुक्ति।

प्रश्न 4: ‘शिवोऽहम्’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘शिवोऽहम्’ का अर्थ है – ‘मैं शिव हूँ’। यहाँ ‘शिव’ का अर्थ देवता विशेष नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य, कल्याणमय, मंगल स्वरूप है।

प्रश्न 5: क्या इस स्तोत्र को पढ़ने से मैं भगवान शिव बन जाऊँगा?
उत्तर: नहीं – इसका भाव यह है कि आपकी आत्मा शिवतुल्य (परम चैतन्य) है। शरीर नहीं बदलता, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है।

प्रश्न 6: क्या केवल संन्यासी ही यह स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
उत्तर: नहीं – यह ज्ञान का स्तोत्र है। गृहस्थ, महिला, बच्चे, सभी इसे पढ़ सकते हैं। यह किसी भी आश्रम या वर्ण के लिए बंधा नहीं है।

प्रश्न 7: इस स्तोत्र को पढ़ने का सबसे अच्छा समय क्या है?
उत्तर: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) सर्वोत्तम है। प्रातः और शाम की संध्या में भी पाठ कर सकते हैं।

प्रश्न 8: क्या बिना स्नान किए यह स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
उत्तर: प्रातःकाल स्नान करके पढ़ना श्रेष्ठ है। यदि असंभव हो तो हाथ-मुँह धोकर और स्वच्छ स्थान पर बैठकर पढ़ सकते हैं।

प्रश्न 9: इस स्तोत्र को पढ़ते समय किस रंग के वस्त्र पहनने चाहिए?
उत्तर: श्वेत या पीले वस्त्र पहनना सर्वोत्तम माना गया है। ये रंग सत्वगुण के प्रतीक हैं।

प्रश्न 10: क्या महिलाएं निर्वाण षट्कम् पढ़ सकती हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल – यह स्तोत्र सभी के लिए है। स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है। माता सावित्री, मीरा, आनंदमयी मा जैसी महान स्त्रियाँ भी इस मार्ग पर चलीं।

प्रश्न 11: क्या इस स्तोत्र को सिर्फ सुनने से भी लाभ होता है?
उत्तर: हाँ – श्रद्धापूर्वक सुनने से भी मन शांत होता है और आत्म-बोध का मार्ग प्रशस्त होता है। यूट्यूब या किसी भक्त से सुन सकते हैं।

प्रश्न 12: इस स्तोत्र को पढ़ने से क्या मोक्ष मिलता है?
उत्तर: यह स्तोत्र स्वयं को जानने का उपकरण है। जब ‘मैं शरीर-मन नहीं, बल्कि चैतन्य हूँ’ का बोध हो जाता है, तो वही मोक्ष है – यहाँ और अभी।

प्रश्न 13: क्या यह स्तोत्र शिव पूजा में पढ़ा जाता है?
उत्तर: हाँ – शिवरात्रि, प्रदोष, सावन मास और प्रतिदिन की शिव पूजा में इसका पाठ किया जाता है। यह शिव को प्रसन्न करने का स्तोत्र नहीं, बल्कि ‘शिव’ स्वरूप को पहचानने का स्तोत्र है।

प्रश्न 14: पाठ के बाद क्या करना चाहिए?
उत्तर: पाठ के बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ का 1 माला (108 बार) जप करें। फिर क्षमा प्रार्थना करें और दीपक को प्रणाम करें। ‘शिवोऽहम्’ का मन ही मन जप करते रहें।

प्रश्न 15: क्या बिना दीपक जलाए यह स्तोत्र पढ़ा जा सकता है?
उत्तर: हाँ – दीपक जलाना वैकल्पिक है। मुख्य चीज़ भाव और अर्थ की समझ है। बिना दीपक के भी पूरा लाभ मिलता है।

प्रश्न 16: इस स्तोत्र का पाठ करने से आत्मविश्वास कैसे बढ़ता है?
उत्तर: जब आप यह जान लेते हैं कि आप अविनाशी, शाश्वत चैतन्य हैं, तो असफलता, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। यही सच्चा आत्मविश्वास है।

प्रश्न 17: क्या यह स्तोत्र अवसाद और चिंता में सहायक है?
उत्तर: हाँ – नियमित पाठ से मन शांत और स्थिर होता है। ‘मैं यह दुखी मन नहीं हूँ’ का भाव अवसाद और चिंता से निकलने में सहायक है।

प्रश्न 18: क्या बच्चे इस स्तोत्र को पढ़ सकते हैं?
उत्तर: हाँ – यदि बच्चे श्लोक समझ सकें, तो पढ़ सकते हैं। छोटे बच्चों को ‘शिवोऽहम्’ मंत्र का जप सिखा सकते हैं। इससे उनक� आत्मविश्वास और एकाग्रता बढ़ती है।

प्रश्न 19: क्या निर्वाण षट्कम् और शिवरात्रि का कोई संबंध है?
उत्तर: हाँ – शिवरात्रि के दिन विशेष रूप से इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस दिन ‘शिवोऽहम्’ के भाव से रात्रि जागरण करना अत्यंत फलदायी है।

प्रश्न 20: क्या यह स्तोत्र पढ़ने से लोभ-मोह कम होते हैं?
उत्तर: हाँ – तीसरे श्लोक में स्पष्ट कहा गया है – “न मे द्वेष रागौ, न मे लोभ मोहौ”। इस भाव से पाठ करने पर लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या स्वतः ही कम होने लगते हैं।

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शिवोऽहम्, शिवोऽहम् 🙏

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