श्री कृष्ण चालीसा का भावार्थ एवं सार
यह पावन श्री कृष्ण चालीसा भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप, उनकी बाल लीलाओं, वीरता, करुणा, भक्ति-वत्सलता और लोककल्याणकारी कर्मों का अत्यंत सुंदर वर्णन करती है। प्रारंभिक दोहे में प्रभु के श्यामल शरीर, मधुर अधरों, पिताम्बर धारण किए हुए रूप और बंशी की मधुर ध्वनि का स्मरण कर भक्त उनसे कृपा और लज्जा-रक्षा की प्रार्थना करता है।
चौपाइयों में सबसे पहले श्रीकृष्ण को यदुवंश के आनंददाता, वसुदेव-देवकी के पुत्र, यशोदा मैया के लाडले और भक्तों के नेत्रों के तारे के रूप में नमन किया गया है। उनका नट-नागर रूप, नागनाथैया, धेनु चराने वाले ग्वाले और गोवर्धन पर्वत को उँगली पर उठाने वाले गिरिधर का अद्भुत स्वरूप भक्त के हृदय में भक्ति जाग्रत करता है।
इसके बाद प्रभु के सौंदर्य का अनुपम चित्रण मिलता है – गोल कपोल, अरुण चिबुक, मृदुल मुस्कान, कमल समान नेत्र, मोर मुकुट, वैजयंती माला, कुंडल, पीताम्बर और घुँघराले अलक – जिनकी छवि को देखकर देवता, ऋषि और मनुष्य सभी मोहित हो जाते हैं।
चालीसा में भगवान की अनेक महान लीलाओं का स्मरण किया गया है – पूतना, बकासुर, अघासुर, कालिया नाग जैसे दुष्टों का संहार, गोवर्धन धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा, यशोदा को मुख में चौदह भुवन दिखाना, कंस वध कर माता-पिता को कारागार से मुक्त कराना, उग्रसेन को राजसिंहासन दिलाना, भौमासुर वध और षोडश सहस्र राजकुमारियों का उद्धार।
भक्तों के प्रति श्रीकृष्ण की असीम करुणा विशेष रूप से उभरकर आती है। सुदामा के दरिद्र दुःख दूर करना, विदुर के साग को प्रेम से स्वीकार करना, मीरा की विष-लीला को अमृत में बदल देना, शिशुपाल को मोक्ष देना – ये सब प्रभु की भक्ति-वत्सलता का प्रमाण हैं।
महाभारत प्रसंग में श्रीकृष्ण को पार्थ सारथी, गीता उपदेशक, और धर्म के रक्षक के रूप में स्मरण किया गया है। द्रौपदी की लाज बचाने के लिए उनके अक्षय चीर का चमत्कार यह सिखाता है कि जो सच्चे मन से प्रभु को पुकारता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
अंत में भक्त प्रभु से अपनी कुमति नाश, अपराध क्षमा, और दर्शन दान की विनती करता है। समापन दोहे में कहा गया है कि जो श्रद्धा से इस कृष्ण चालीसा का पाठ करता है, उसे अष्ट सिद्धि, नव निधि और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष – चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
श्री कृष्ण चालीसा – Shri Krishna Chalisa
॥ दोहा ॥
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बा फल, पिताम्बर शुभ साज॥
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥
॥ चौपाई ॥
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥१॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥२॥
जय नट-नागर नाग नथैया। कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥३॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥४॥
वंशी मधुर अधर धरी तेरी। होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥५॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥६॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥७॥
रंजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजयंती माला॥८॥
कुण्डल श्रवण पीतपट आछे। कटि किंकणी काछन काछे॥९॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥१०॥
मस्तक तिलक, अलक घुंघराले। आओ कृष्ण बाँसुरी वाले॥११॥
करि पय पान, पुतनहि तारयो। अका बका कागासुर मारयो॥१२॥
मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला। भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥१३॥
सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई। मसूर धार वारि वर्षाई॥१४॥
लगत-लगत ब्रज चहन बहायो। गोवर्धन नखधारि बचायो॥१५॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥१६॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो। कोटि कमल जब फूल मंगायो॥१७॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥१८॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥१९॥
केतिक महा असुर संहारयो। कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥२०॥
मात-पिता की बन्दि छुड़ाई। उग्रसेन कहं राज दिलाई॥२१॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥२२॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥२३॥
दै भिन्हीं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥२४॥
असुर बकासुर आदिक मारयो। भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥२५॥
दीन सुदामा के दुःख टारयो। तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥२६॥
प्रेम के साग विदुर घर मांगे। दुर्योधन के मेवा त्यागे॥२७॥
लखि प्रेम की महिमा भारी। ऐसे श्याम दीन हितकारी॥२८॥
भारत के पारथ रथ हांके। लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥२९॥
निज गीता के ज्ञान सुनाये। भक्तन हृदय सुधा वर्षाये॥३०॥
मीरा थी ऐसी मतवाली। विष पी गई बजाकर ताली॥३१॥
राना भेजा सांप पिटारी। शालिग्राम बने बनवारी॥३२॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो। उर ते संशय सकल मिटायो॥३३॥
तब शत निन्दा करी तत्काला। जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥३४॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई। दीनानाथ लाज अब जाई॥३५॥
तुरतहिं वसन बने नन्दलाला। बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥३६॥
अस नाथ के नाथ कन्हैया। डूबत भंवर बचावत नैया॥३७॥
सुन्दरदास आस उर धारी। दयादृष्टि कीजै बनवारी॥३८॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो। क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥३९॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै। बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥४०॥
॥ दोहा ॥
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥