परिचय
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में आरती का विशेष महत्व है। जब भी किसी मंदिर में घंटियाँ बजती हैं, शंखनाद होता है और दीपक की लौ लयबद्ध तरीके से घूमती है, तो वह दृश्य मन को अद्भुत शांति और भक्ति भाव से भर देता है। आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे सुंदर माध्यम है।
इस विस्तृत लेख में हम आरती के हर पहलू को समझेंगे – इसका अर्थ, उत्पत्ति, वैज्ञानिक महत्व, करने की विधि, नियम और विभिन्न देवताओं की प्रमुख आरतियाँ। यह लेख आपके लिए आरती से जुड़ी हर जानकारी का संपूर्ण स्रोत होगा।
1. आरती क्या होती है? (What is Aarti)
आरती की परिभाषा
आरती संस्कृत भाषा के ‘आरात्रिक’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है ‘रात्रि का अंधकार दूर करने वाला’। जब आरती की लौ से अंधकार हटता है, तो भगवान के दर्शन होते हैं। यही लौ व्यक्ति के मन के अंधकार को भी मिटाती है। सरल शब्दों में, आरती एक हिंदू धार्मिक अनुष्ठान है जिसमें दीपक या कपूर की लौ को किसी देवता के समक्ष घुमाया जाता है। यह क्रिया भक्ति, श्रद्धा और प्रेम के साथ की जाती है।
आरती को ‘नीराजन’ भी कहा जाता है। नीराजन का अर्थ है – विशेष रूप से प्रकाशित करना। अर्थात, देव पूजन से प्राप्त होने वाली सकारात्मक शक्ति हमारे मन को प्रकाशित कर दे और हमारे व्यक्तित्व को उज्जवल बना दे ।
एक सरल शब्दों में, आरती का अर्थ है भगवान को याद करना, उनके प्रति आदर का भाव दिखाना, ईश्वर का स्मरण करना और उनका गुणगान करना। आरती के दौरान विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, घंटी बजाई जाती है और कभी-कभी शंखनाद भी किया जाता है। आरती की थाली में आमतौर पर दीपक, कपूर, रोली, अक्षत (चावल), फूल और धूप शामिल होते हैं।
आरती का आध्यात्मिक अर्थ
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आरती का बहुत गहरा अर्थ है:
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अंधकार से प्रकाश की ओर: आरती में दीपक की लौ अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाने का प्रतीक है। जैसे दीपक अंधेरे को दूर करता है, वैसे ही ईश्वर की कृपा हमारे जीवन के अंधकार को दूर करती है।
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पंच महाभूतों का समर्पण: आरती की थाली में पांच तत्वों का प्रतीकात्मक समर्पण होता है:
- दीपक की लौ – अग्नि तत्व
- थाली – पृथ्वी तत्व
- जल (छिड़काव) – जल तत्व
- धूप – वायु तत्व
- आकाश – घंटी की ध्वनि का स्थान

3. ईश्वर के प्रति समर्पण: आरती करते समय हम अपने अहंकार को दीपक की लौ की तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित करते हैं।
सनातन धर्म में आरती का स्थान
सनातन धर्म में आरती का अत्यधिक महत्व है। यह कोई साधारण अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति का चरमोत्कर्ष है। मंदिरों में दिन में कई बार आरती होती है और भक्तगण इस दिव्य दर्शन के लिए उत्सुक रहते हैं। घरों में भी नियमित रूप से आरती करने की परंपरा है।
आरती को देवताओं को प्रसन्न करने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम माना गया है। यही कारण है कि चाहे कोई छोटा सा पूजा घर हो या विशाल मंदिर, आरती अवश्य होती है।
आरती और पूजा में अंतर
बहुत से लोग आरती और पूजा को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इनमें अंतर है:

| पूजा | आरती |
|---|---|
| यह एक विस्तृत प्रक्रिया है जिसमीन स्नान, वस्त्र अर्पण, चढ़ावा आदि शामिल होते हैं | यह पूजा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण भाग है |
| इसमें अधिक समय लगता है | इसमें कम समय लगता है |
| व्यक्तिगत रूप से की जाती है | सामूहिक रूप से की जा सकती है |
| मंत्रों के साथ विधिवत की जाती है | भजन-कीर्तन के साथ भावप्रवण होकर की जाती है |
| यह दैनिक क्रिया है | यह पूजा की पराकाष्ठा है |
2. आरती की उत्पत्ति (Origin of Aarti)
वैदिक परंपरा में आरती का उल्लेख
आरती की परंपरा का उल्लेख वैदिक काल में मिलता है। वैदिक यज्ञों में अग्नि को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। अग्नि को देवताओं तक हमारी श्रद्धा पहुंचाने वाला माध्यम माना जाता था। धीरे-धीरे यज्ञ की अग्नि से दीपक की लौ तक यह परंपरा विकसित हुई।
ऋग्वेद में दीपक को ‘प्रकाश का प्रतीक’ बताया गया है। यजुर्वेद में कहा गया है कि “तमसो मा ज्योतिर्गमय” अर्थात हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। यही आरती का मूल भाव है।

स्कंद पुराण में आरती के महत्व को अत्यंत सरल और करुणामय भाव से समझाया गया है। उसमें उल्लेख मिलता है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्रों का ज्ञान न रखता हो या विधि-विधान के अनुसार पूजा करना न जानता हो, तब भी वह ईश्वर की कृपा से वंचित नहीं रहता। यदि वह सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ आरती में सहभागी बनता है, तो भगवान उसकी भावनाओं को स्वीकार करते हैं।
आरती की परंपरा का संबंध प्राचीन वैदिक यज्ञों, विशेष रूप से ‘होम’ से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि मंदिरों के गर्भगृह में स्थापित देवमूर्ति प्रायः अंधकारमय वातावरण में रहती थी। ऐसे में भक्तों को भगवान के दर्शन कराने के लिए पुजारी दीपक जलाकर उसे सिर से चरणों तक घुमाता था और साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण या स्तुति गान करता था। समय के साथ यही विधि विकसित होकर आज की आरती परंपरा का रूप बन गई।
पौराणिक कथाओं में आरती
पौराणिक कथाओं में आरती के प्रारंभ की कई रोचक कथाएँ हैं:
समुद्र मंथन की कथा: एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया तो उससे निकले अमृत को लेकर विवाद हुआ। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पान कराया। इस अवसर पर देवताओं ने सबसे पहले दीपक जलाकर भगवान की आरती उतारी।

गणेश जी की कथा: एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती अपने पुत्र गणेश को सुलाकर बाहर गए। द्वारपाल ने भगवान ब्रह्मा को भी अंदर जाने से रोक दिया। इस पर ब्रह्मा जी क्रोधित हुए और उन्होंने गणेश जी को जगाने का प्रयास किया। जब गणेश जी नहीं उठे तो उन्होंने उनके मस्तक पर प्रकाश डाला। इस घटना को भी आरती की उत्पत्ति से जोड़ा जाता है।
मंदिर परंपरा में आरती का विकास
प्राचीन काल में मंदिरों में दीपदान की परंपरा थी। धीरे-धीरे यह दीपदान आरती के रूप में विकसित हुआ। आदि शंकराचार्य ने मंदिरों में नियमित पूजा और आरती की व्यवस्था की। उन्होंने कई प्रसिद्ध मंदिरों में आरती की परंपरा स्थापित की।
मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने आरती को और अधिक लोकप्रिय बनाया। संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, मीराबाई, सूरदास आदि ने अपने भजनों और आरतियों से इस परंपरा को समृद्ध किया।
3. आरती का धार्मिक महत्व: शास्त्रों में वर्णित रहस्य और आस्था
सनातन धर्म में आरती का विशेष स्थान है। मंदिरों में सुबह की मंगला आरती से लेकर रात की शयन आरती तक, और घरों में नियमित पूजा के बाद होने वाली आरती – यह क्रिया हर हिंदू के जीवन का अभिन्न अंग है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आरती का धार्मिक महत्व क्या है? शास्त्रों और पुराणों में इसके बारे में क्या कहा गया है? आइए, विस्तार से समझते हैं। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि आरती करने से ही नहीं, आरती देखने भर से बहुत पुण्य मिलता है। आरती को जो देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह करोड़ों पीढ़ियों का उद्धार करता है।
आरती के पश्चात भगवान का चरणामृत अमृत से कम नहीं होता। हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस में लिखा है कि भगवान श्रीराम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भवबाधा से पार हो गया, बल्कि अपने पूर्वजों को भी उसने तार दिया। आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए कि मानो वह पंच-प्राणों (पूरे मन के साथ) की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति को आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानना चाहिए। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है । आरती को एक हिंदू अनुष्ठान माना जाता है जो भगवान के प्रति प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे अच्छा तरीका है । यह व्यक्ति के आत्मबल को बढ़ाने में मदद करती है, मानसिक तनाव को दूर करती है, और मन को पवित्र तथा तन को स्वस्थ रखती है।
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि उसमें पंच महाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—की सजीव उपस्थिति भी समाहित होती है। भारतीय दर्शन के अनुसार समस्त सृष्टि इन पाँच तत्वों से बनी है, और आरती के माध्यम से इन्हीं तत्वों द्वारा ईश्वर की उपासना की जाती है। कपूर की सुगंध पृथ्वी तत्व का प्रतीक है, जो वातावरण को पवित्र और सुगंधित बनाती है। घी की मधुर धारा जल तत्व का प्रतिनिधित्व करती है, जो जीवन और शुद्धता का संकेत है। दीपक की लौ अग्नि तत्व का स्वरूप है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। लौ का हिलना वायु तत्व को दर्शाता है, जो जीवन की गतिशीलता और ऊर्जा का प्रतीक है। वहीं घंटा, घंटी, शंख और मृदंग आदि की ध्वनि आकाश तत्व को प्रकट करती है, जो पूरे वातावरण में दिव्यता का कंपन उत्पन्न करती है। इस प्रकार आरती के माध्यम से ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण प्रकृति और सारा संसार मिलकर भगवान की स्तुति कर रहा हो।
📜 पुराणों और शास्त्रों में आरती का महत्व
हमारे धार्मिक ग्रंथों में आरती के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रसम्मत विधान है।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति धूप-आरती को देखता भी है, वह अपनी कई पीढ़ियों का उद्धार कर देता है । इसका तात्पर्य यह है कि आरती के दर्शन मात्र से ही अगाध पुण्य की प्राप्ति होती है।
स्कंद पुराण के अनुसार
स्कंद पुराण में भगवान विष्णु ने कहा है कि जो व्यक्ति घी के दीपक से आरती करता है, वह कोटि कल्पों तक स्वर्गलोक में निवास करता है। जो व्यक्ति मेरे समक्ष हो रही आरती के दर्शन करता है, उसे परमपद की प्राप्ति होती है। और यदि कोई व्यक्ति कपूर से आरती करता है, तो उसे अनंत में प्रवेश मिलता है ।
इसी पुराण में यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि भी नहीं जानता, लेकिन भगवान की हो रही आरती में श्रद्धा के साथ शामिल होकर आरती कर लेता है, तो भगवान उसकी पूजा को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं । यह आरती की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह ज्ञान और अज्ञान के भेद को मिटाकर सभी भक्तों को समान रूप से ईश्वर की कृपा का पात्र बना देती है।
उत्तर स्कंद पुराण के अनुसार
उत्तर स्कंद पुराण में भी आरती के महत्व को रेखांकित किया गया है। इसके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को कोई मंत्र या पूजा की विधि नहीं आती हो और वह सिर्फ आरती कर ले, तो भगवान उसकी पूजा को पूरी तरह से स्वीकार कर लेते हैं ।
अन्य पुराणों में वर्णन
स्कंद पुराण, पद्म पुराण और भागवत पुराण जैसे शास्त्रों में आरती को ईश्वर की सेवा का एक उत्कृष्ट रूप बताया गया है। माना जाता है कि पूजा के अंत में की गई आरती भगवान की उपस्थिति को स्थिर करती है और भक्तों के मन को शुद्ध करती है ।
🪔 आरती का धार्मिक महत्व
1. पूजा की पूर्णता
बिना आरती के किसी भी पूजा को अपूर्ण माना जाता है । आरती के द्वारा ही पूजा का समापन होता है और उसे पूर्णता प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार, पूजा में कोई कमी रह जाए तो आरती से वह कमी पूरी हो जाती है ।
2. भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक
आरती का प्रमुख उद्देश्य भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को व्यक्त करना है। यह पूजा का एक हिस्सा होती है, जो व्यक्ति के दिल में परमात्मा के प्रति प्रेम और श्रद्धा को प्रकट करता है । आरती को भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है ।
3. आध्यात्मिक शुद्धि
आरती में जलते हुए दीपक के प्रकाश को भगवान के साथ जोड़कर आत्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। दीपक का प्रकाश अंधकार को दूर करता है और ज्ञान की प्राप्ति का प्रतीक है । यह लौ व्यक्ति के अंदर सकारात्मक विचारों को लाती है ।
4. नकारात्मक शक्तियों का नाश
आरती के दौरान दीपक का प्रकाश और मंत्रों के उच्चारण से नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसे हिन्दू धर्म में बुराई से अच्छाई की विजय के रूप में देखा जाता है ।
5. सामूहिक धार्मिक अनुभव
जब लोग सामूहिक रूप से आरती गाते हैं या करते हैं, तो यह एक सामूहिक धार्मिक अनुभव बन जाता है। इससे समाज में एकता और भाईचारे की भावना उत्पन्न होती है । परिवार के साथ मिलकर की गई आरती लोगों के बीच सामंजस्य को बढ़ाती है ।
6. सुख-समृद्धि और आशीर्वाद की प्राप्ति
धार्मिक मान्यता के अनुसार, आरती करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति को जीवन में सुख, समृद्धि और शांति मिलती है। आरती में भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने की भावना रहती है ।
4. आरती करने की सही विधि (Step-by-Step)
आरती की तैयारी कैसे करें
आरती शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक तैयारियाँ करनी चाहिए:
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स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें – आरती करने से पहले स्नान करना शुभ माना जाता है।
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पूजा स्थल को साफ करें – जहाँ आरती करनी है, वह स्थान स्वच्छ होना चाहिए।
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देवता की मूर्ति या चित्र को साफ करें – देवता के चित्र या मूर्ति को गीले कपड़े से साफ करें।
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सामग्री एकत्र करें – सभी आवश्यक सामग्री पहले से एकत्र कर लें।
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मन को शांत करें – कुछ देर ध्यान करके मन को शांत और एकाग्र करें।
आवश्यक सामग्री
आरती के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- आरती की थाली – पीतल, चांदी या तांबे की थाली शुभ मानी जाती है।
- दीपक – मिट्टी, पीतल या चांदी का दीपक।
- घी या तेल – दीपक के लिए।
- कपूर – आरती के अंत में जलाने के लिए।
- रुई की बत्तियाँ – दीपक के लिए।
- धूप या अगरबत्ती
- फूल – देवता को अर्पित करने के लिए।
- रोली और अक्षत (चावल)
- जल से भरा शंख या कलश
- घंटी

आरती करने का सही क्रम
आरती करते समय निम्नलिखित क्रम का पालन करना चाहिए:
चरण 1: दीपक जलाना
सबसे पहले दीपक में घी या तेल डालकर दो या पांच बत्तियाँ जलाएं। बत्तियाँ पूर्व दिशा की ओर रखें।
चरण 2: संकल्प करना
दीपक जलाने के बाद ईश्वर से प्रार्थना करें और आरती करने का संकल्प लें।
चरण 3: घंटी बजाना
आरती शुरू करने से पहले तीन बार घंटी बजाएं।
चरण 4: धूप दिखाना
सबसे पहले देवता को धूप दिखाएं। धूप को दक्षिणावर्त घुमाते हुए दिखाएं।
चरण 5: दीपक दिखाना
अब दीपक को लेकर आरती करें। दीपक को चारों दिशाओं में घुमाएं:
- सबसे पहले देवता के चरणों के पास
- फिर नाभि के पास
- फिर मुख के पास
- अंत में पूरी मूर्ति के सामने गोलाकार घुमाएं
चरण 6: कपूर जलाना
दीपक के बाद कपूर जलाकर आरती करें। कपूर को दोनों हाथों में लेकर घुमाएं।
चरण 7: मंत्र या भजन का उच्चारण
आरती के समय संबंधित देवता का आरती भजन या मंत्र बोलें।
चरण 8: पुष्प अर्पण
आरती के अंत में देवता को फूल अर्पित करें।
चरण 9: प्रदक्षिणा
आरती के बाद अपने स्थान पर ही तीन बार घूमें (प्रदक्षिणा)।
आरती के बाद क्या करना चाहिए
- हाथ फेरना – आरती की लौ पर हाथ फेरकर आँखों में लगाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इससे दिव्य ऊर्जा प्राप्त होती है।
- प्रसाद ग्रहण करना – आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करें और दूसरों को वितरित करें।
- क्षमा प्रार्थना – आरती में हुई किसी भी गलती के लिए ईश्वर से क्षमा माँगें।
- जल का छिड़काव – कुछ लोग आरती के बाद चारों ओर जल छिड़कते हैं।
5. आरती करने के नियम
आरती कब करनी चाहिए (सुबह/शाम)
आरती के लिए सबसे उपयुक्त समय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय माने गए हैं:
- सुबह की आरती:
सूर्योदय से पूर्व या तुरंत बाद करनी चाहिए। इसे मंगला आरती कहते हैं। यह दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा के साथ करती है। - शाम की आरती:
सूर्यास्त के समय संध्या आरती करनी चाहिए। यह दिनभर की थकान दूर कर मन को शांति प्रदान करती है। - विशेष अवसर:
त्योहारों, व्रतों और विशेष अवसरों पर भी आरती की जाती है। मंगलवार, शुक्रवार जैसे विशेष दिनों में भी आरती का महत्व बढ़ जाता है।
आरती करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
- दिशा का ध्यान – आरती करते समय मुख पूर्व या उत्तर की ओर होना चाहिए।
- वस्त्र – स्वच्छ और पारंपरिक वस्त्र पहनें।
- मन की स्थिति – आरती के समय मन शांत और एकाग्र होना चाहिए।
- दीपक की दिशा – दीपक को दक्षिणावर्त घुमाएं।
- घंटी की गति – घंटी को तेज न बजाएं, लयबद्ध और मधुर ध्वनि होनी चाहिए।
- बच्चों का साथ – बच्चों को भी आरती में शामिल करें, इससे उनमें संस्कार विकसित होंगे।
- आदर-सम्मान – आरती की थाली का आदर करें, उसे जमीन पर न रखें।
सामान्य गलतियाँ जो लोग करते हैं
- गलत दिशा में घुमाना – दीपक को कभी भी वामावर्त न घुमाएं, यह अशुभ माना जाता है।
- आरती के बीच में बात करना – आरती के समय अनावश्यक बातचीत न करें।
- जल्दबाजी करना – आरती जल्दी-जल्दी में न करें, धीरे-धीरे और भाव से करें।
- अशुद्ध वस्त्र – गंदे या अनुचित वस्त्रों में आरती न करें।
- मोबाइल का उपयोग – आरती के समय मोबाइल फोन बंद या साइलेंट रखें।
- आरती के बाद लापरवाही – आरती के बाद दीपक को तुरंत न बुझाएं, उसे स्वयं बुझने दें।
6. विभिन्न देवताओं की प्रमुख आरतियाँ
यहाँ हम प्रमुख देवताओं की आरतियों के बारे में जानकारी देंगे। प्रत्येक आरती का अपना विशेष महत्व और समय है। आप इन पर क्लिक करके विस्तृत आरती, अर्थ और विधि पढ़ सकते हैं:
- गणेश जी की आरती : भगवान गणेश प्रथम पूजनीय देवता हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की आरती की जाती है। उनकी आरती में “जय गणेश जय गणेश देवा” की प्रसिद्ध आरती सबसे लोकप्रिय है।
- शिव जी की आरती : भोलेनाथ शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी आरती का विशेष महत्व है। सोमवार के दिन शिव जी की आरती करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
- हनुमान जी की आरती : हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा के साथ आरती करने से सभी संकट दूर होते हैं।
- दुर्गा जी की आरती : माँ दुर्गा शक्ति की देवी हैं। नवरात्रि के दिनों में इनकी आरती का विशेष महत्व है।
- लक्ष्मी जी की आरती : धन की देवी माँ लक्ष्मी की आरती शुक्रवार और दीपावली के दिन विशेष रूप से की जाती है।
- कृष्ण जी की आरती : कन्हैया की आरती में “छप्पन भोग” और माखन-मिश्री का विशेष महत्व है। जन्माष्टमी पर इनकी आरती का विशेष महत्व है।
- राम जी की आरती : प्रभु श्रीराम की आरती में “श्री रामचंद्र कृपालु भजमन” की आरती प्रसिद्ध है।
- विष्णु जी की आरती : भगवान विष्णु की आरती में “ॐ जय जगदीश हरे” सबसे प्रसिद्ध है। यह आरती सभी देवताओं के लिए की जा सकती है।
- सरस्वती जी की आरती : ज्ञान और संगीत की देवी माँ सरस्वती की आरती वसंत पंचमी और बुधवार के दिन विशेष रूप से की जाती है।
- शनिदेव आरती : शनि देव की आरती शनिवार के दिन करने से शनि के प्रकोप से मुक्ति मिलती है।
7. आरती के विभिन्न प्रकार: भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्पूर्ण विवरण
भारत विविधताओं का देश है। यहाँ की हर परंपरा, हर रीति-रिवाज में अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट छाप देखने को मिलती है। आरती की परंपरा भी इससे अछूती नहीं है। जैसे-जैसे आप भारत के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा करते हैं, वैसे-वैसे आरती करने की शैली, वाद्य यंत्र, गायन की पद्धति और भाव-भंगिमाओं में अद्भुत विविधता देखने को मिलती है। आइए, विस्तार से समझते हैं कि भारत के विभिन्न भागों में आरती की क्या विशेषताएँ हैं।
उत्तर भारतीय आरती पद्धति
उत्तर भारत में आरती को लेकर एक अलग ही उत्साह और उमंग देखने को मिलता है। यहाँ की आरती में भव्यता, ऊर्जा और सामूहिकता का अद्भुत समावेश होता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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घंटी और शंख की गूंज: उत्तर भारतीय मंदिरों में आरती की शुरुआत घंटी और शंख की गूंज से होती है। माना जाता है कि शंख की ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है और देवताओं का आह्वान करती है। आरती के दौरान घंटी निरंतर बजती रहती है, जिसका उद्देश्य नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाना और मन को एकाग्र करना है ।
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ऊँचे स्वर में भजन-कीर्तन: यहाँ आरती के दौरान भजन-कीर्तन ऊँचे स्वर में गाए जाते हैं। ‘ॐ जय जगदीश हरे’ जैसे सार्वभौमिक आरती गीतों का उद्गम भी उत्तर भारत की ही देन है। भक्त पूरे उत्साह के साथ आरती में सम्मिलित होते हैं और ऊँचे स्वर में जयकारे लगाते हैं।
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भव्य थाली सज्जा: आरती की थाली को विशेष रूप से सजाया जाता है। इसमें फूल, रोली, अक्षत (चावल), और कई बत्तियों वाला दीपक होता है। कपूर का विशेष महत्व है और आरती के अंत में कपूर जलाकर देवता के सामने घुमाया जाता है।
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प्रसिद्ध मंदिर: वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर की झांकी आरती, अयोध्या के राम मंदिर की सुबह की आरती और हरिद्वार के हर की पौड़ी पर होने वाली गंगा आरती उत्तर भारतीय शैली के जीवंत उदाहरण हैं। इन आरतियों में हज़ारों श्रद्धालु एक साथ सम्मिलित होते हैं, जहाँ घंटी, शंख और मंत्रों का नाद एक अद्भुत दिव्य वातावरण का निर्माण करता है।
दक्षिण भारतीय आरती पद्धति
दक्षिण भारत की आरती शैली उत्तर भारत से काफी भिन्न है। यहाँ की आरती में संस्कृत मंत्रों, वेदों की ऋचाओं और परंपरागत अनुष्ठानों का विशेष महत्व है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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दीपाराधना का विशेष महत्व: दक्षिण भारत में आरती को मुख्यतः ‘दीपाराधना’ कहा जाता है। इसमें भगवान को दीपक दिखाने की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। पूजा के दौरान विभिन्न प्रकार के दीपक (पंचदीप, सहस्रदीप) जलाए जाते हैं।
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संस्कृत मंत्रों का बाहुल्य: यहाँ आरती के दौरान वैदिक मंत्रों और संस्कृत श्लोकों का उच्चारण किया जाता है। ‘पुरुष सूक्त’, ‘श्री सूक्त’ और विभिन्न देवताओं के स्तोत्रों का गायन होता है। आरती का स्वरूप भक्ति से अधिक मंत्रमय और अनुष्ठानिक होता है।
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वाद्य यंत्र: दक्षिण भारतीय मंदिरों में आरती के दौरान ‘नागस्वरम’ (एक प्रकार का वाद्य यंत्र) और ‘तविल’ (ताल वाद्य) का विशेष रूप से उपयोग किया जाता है। इन वाद्यों की धुन आरती के दौरान एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करती है।
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प्रसिद्ध मंदिर: तिरुपति के श्री वेंकटेश्वर मंदिर में होने वाली ‘सहस्रदीप आरती’ अत्यंत प्रसिद्ध है। इसके अलावा, मदुरै के मीनाक्षी मंदिर और रामेश्वरम मंदिर की आरतियाँ दक्षिण भारतीय शैली का अद्भुत नमूना हैं।

पूर्व भारतीय आरती (बंगाल की आरती शैली)
पूर्व भारत, विशेषकर बंगाल की आरती शैली में भाव-प्रवणता, कला और संगीत का सुंदर संगम देखने को मिलता है। यहाँ की आरती में माँ दुर्गा और काली की उपासना का विशेष महत्व है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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धूप-दीप का विशिष्ट प्रयोग: यहाँ आरती की शुरुआत धूप-दीप से होती है। धूप को देवी के सामने विशेष अंदाज में घुमाया जाता है। माना जाता है कि धूप की सुगंध से वातावरण शुद्ध होता है और देवी प्रसन्न होती हैं।
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उलूल-ध्वनि (उलुध्वनि): बंगाली आरती की सबसे खास पहचान है ‘उलूल-ध्वनि’। यह महिलाओं द्वारा अपने मुँह से जीभ को हिलाते हुए निकाली जाने वाली एक विशिष्ट मधुर ध्वनि है। इसे ‘उलुध्वनि’ या ‘उलूल’ कहा जाता है। यह ध्वनि शुभ अवसरों पर देवी के आह्वान और प्रसन्नता की अभिव्यक्ति के रूप में की जाती है।
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शंख की अलग भूमिका: बंगाल में शंख को सिर्फ बजाया ही नहीं जाता, बल्कि इसे फूंककर लंबी और लयबद्ध ध्वनि निकाली जाती है। आरती के दौरान शंखनाद और उलुध्वनि का संगम अद्भुत वातावरण का निर्माण करता है।
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प्रसिद्ध मंदिर और आरतियाँ:
- दक्षिणेश्वर काली मंदिर (कोलकाता): यहाँ की काली आरती में तांत्रिक विधि-विधान और बंगाली शैली की झलक देखने को मिलती है।
- कालीघाट मंदिर (कोलकाता): यहाँ की संध्या आरती में दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। इस दौरान महिलाओं द्वारा उलुध्वनि और शंखनाद की परंपरा आज भी जीवंत है।
पश्चिम भारतीय आरती – महाराष्ट्र की कीर्तन शैली
महाराष्ट्र में आरती और भक्ति का स्वरूप ‘कीर्तन’ परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहाँ आरती केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संगीत, कथा और प्रवचन का सम्मिलित रूप है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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कीर्तन परंपरा से जुड़ाव: महाराष्ट्र की आरती शैली ‘कीर्तन’ परंपरा का अभिन्न अंग है। कीर्तन, भक्ति का वह स्वरूप है जिसमें ईश्वर के नाम और गुणों का संकीर्तन संगीत के माध्यम से किया जाता है । कीर्तन के दौरान आरती को एक विशेष स्थान प्राप्त होता है।
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कीर्तन की संरचना में आरती: पारंपरिक महाराष्ट्रीयन कीर्तन में मुख्यतः दो भाग होते हैं – पूर्वरंग और उत्तररंग। पूर्वरंग में आध्यात्मिक चर्चा और भजन होते हैं, जबकि उत्तररंग में किसी पौराणिक कथा का वर्णन किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के अंत में भैरवी गायन और अंत में देवता की आरती की जाती है ।
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भक्ति रस का परिपाक: महाराष्ट्र में आरती को ‘भक्ति रस’ का परिपाक माना जाता है। ज्ञानेश्वर, तुकाराम, नामदेव जैसे संतों ने अभंग और भजनों के माध्यम से आरती की परंपरा को समृद्ध किया।
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वारकरी संप्रदाय और आरती: पंढरपुर के विठोबा (विठ्ठल) मंदिर में होने वाली आरती वारकरी संप्रदाय की विशेष पहचान है। यहाँ की आरतियों में अभंग गायन की परंपरा है। वारकरी संतों द्वारा रचित अभंगों को विशेष चालों (रागों) में गाया जाता है और अंत में आरती होती है ।
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प्रसिद्ध स्थल: पंढरपुर का विठ्ठल मंदिर, देहू में संत तुकाराम महाराज मंदिर और आळंदी में संत ज्ञानेश्वर महाराज मंदिर में कीर्तन शैली में होने वाली आरतियाँ अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
गुजराती आरती शैली
गुजरात की आरती शैली में लय, ताल और सामूहिकता का अनोखा समन्वय देखने को मिलता है। यहाँ आरती का स्वरूप अत्यंत उल्लासमय और ऊर्जा से भरपूर होता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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झांझ-मंजीरा की धुन: गुजराती आरती की सबसे बड़ी पहचान है झांझ और मंजीरे का उपयोग। ये दोनों ताल वाद्य हैं जो आरती के दौरान एक विशिष्ट लय उत्पन्न करते हैं। इन वाद्यों की थाप पर पूरी आरती की लय निर्धारित होती है ।
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सामूहिक आरती की परंपरा: गुजरात में आरती को सामूहिक रूप से करने की परंपरा है। चाहे वह घर का पूजा कक्ष हो या कोई बड़ा मंदिर, सभी भक्त एक साथ खड़े होकर, झांझ-मंजीरा बजाते हुए और एक स्वर में आरती गाते हैं।
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गरबा और आरती का संबंध: गुजरात का प्रसिद्ध गरबा भी आरती से ही प्रेरित है। नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा की आरती के बाद ही गरबा की शुरुआत होती है। गरबे में भी झांझ-मंजीरे का ही उपयोग होता है, जो दर्शाता है कि कैसे आरती की लोक परंपरा ने गुजरात के लोकसंगीत को प्रभावित किया है।
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प्रसिद्ध मंदिर और आरतियाँ:
- द्वारकाधीश मंदिर (द्वारका): भगवान द्वारकाधीश (कृष्ण) की आरती गुजराती शैली का अद्भुत नमूना है। यहाँ की ‘संध्या आरती’ में हज़ारों श्रद्धालु झांझ-मंजीरा लेकर शामिल होते हैं।
- सोमनाथ मंदिर: यहाँ की ‘संगम आरती’ का अपना विशेष महत्व है। हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों के संगम पर होने वाली इस आरती में 108 दीपों से भगवान सोमनाथ की महाआरती की जाती है ।
- अंबाजी मंदिर: माँ अंबा के इस शक्तिपीठ में होने वाली आरती में राजस्थानी और गुजराती दोनों शैलियों का प्रभाव देखने को मिलता है।
आरती के समय आधारित प्रकार (मंदिर परंपरा)
भौगोलिक विविधता के अलावा, आरती को समय के आधार पर भी विभिन्न प्रकारों में बाँटा गया है। बड़े मंदिरों में दिनभर में कई बार आरती होती है। प्रत्येक आरती का अपना विशेष समय और महत्व होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आरती मुख्य रूप से सात प्रकार की होती है :
| आरती का प्रकार | समय | विशेषता |
|---|---|---|
| मंगला आरती | सुबह (प्रातः 4-5 बजे) | यह आरती सुबह मंदिर खुलने से पहले की जाती है। प्रसिद्ध मंदिरों में यह आरती सुबह 4-5 बजे के आसपास होती है। यह देवताओं को जगाने की आरती मानी जाती है। |
| श्रृंगार आरती | सुबह (मंगला आरती के बाद) | भगवान का श्रृंगार करने के बाद की जाने वाली आरती |
| पूजा आरती | दिन में | दैनिक पूजा के दौरान की जाने वाली आरती |
| भोग आरती | दोपहर में | भगवान को भोग अर्पित करने के बाद की जाने वाली आरती |
| धूप आरती | दोपहर बाद | धूप दिखाने के बाद की जाने वाली आरती |
| संध्या आरती | शाम (सूर्यास्त के समय) | शाम के समय सूर्यास्त के बाद यह आरती होती है। यह सबसे प्रसिद्ध आरती होती है जिसमें सबसे अधिक भक्त शामिल होते हैं। मंदिरों में घंटियाँ और शंख की ध्वनि के साथ यह आरती की जाती है। |
| शयन आरती | रात (सोने से पहले) | रात में मंदिर बंद होने से पहले यह आरती की जाती है। इसमें भगवान को सुलाने की प्रक्रिया होती है। भगवान को शयन कराते समय विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। |
यह भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता ही भारत की आध्यात्मिक समृद्धि की सबसे बड़ी पहचान है। चाहे उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम, आरती का मूल उद्देश्य एक ही है – ईश्वर के प्रति प्रेम, समर्पण और कृतज्ञता का भाव प्रकट करना। फर्क सिर्फ शैली, भाषा और वाद्य यंत्रों का है।
जब आप कभी किसी दूसरे राज्य के मंदिर में जाएँ, तो वहाँ की आरती की शैली पर ध्यान जरूर दें। आप पाएँगे कि आरती का स्वरूप चाहे जो भी हो, उसमें व्याप्त भक्ति भाव और ईश्वर के प्रति समर्पण की अनुभूति एक जैसी ही है। यही विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी देन है।
8. घर में आरती करने के लाभ
- परिवार में सकारात्मकता – नियमित रूप से घर में आरती करने से वहाँ का वातावरण सकारात्मक और शुद्ध बना रहता है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सद्भाव बढ़ता है। झगड़े और कलह कम होते हैं।
- मानसिक शांति – आरती के समय उत्पन्न ध्वनि तरंगें और दीपक की लौ का ध्यान मानसिक शांति प्रदान करता है। यह तनाव और चिंता को दूर करने में सहायक है। नियमित आरती करने वाले लोग अधिक शांत और संतुलित रहते हैं।
- बच्चों पर संस्कार प्रभाव – बच्चे छोटी उम्र में जो देखते और सीखते हैं, उसका उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। घर में आरती करने से बच्चों में: धार्मिक संस्कार विकसित होते हैं, अनुशासन की भावना आती है, बड़ों का आदर करना सीखते हैं, भक्ति भावना जागृत होती है और संस्कृति से जुड़ाव बढ़ता है।
- आर्थिक समृद्धि – धार्मिक मान्यता के अनुसार, नियमित आरती करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। लक्ष्मी जी की आरती से विशेष रूप से आर्थिक लाभ होता है।
- रोगों से रक्षा – कपूर और धूप में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। इससे वायुजनित रोगों से बचाव होता है।
9. आरती का वैज्ञानिक महत्व: आधुनिक शोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ध्वनि, प्रकाश, सुगंध, अग्नि और ऊर्जा का समन्वित विज्ञान है। आधुनिक शोध अब यह प्रमाणित कर रहे हैं कि आरती की प्रत्येक क्रिया का कोई न कोई वैज्ञानिक आधार अवश्य है।
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार भी है। घंटी की ध्वनि से जीवाणुओं का नाश होता है, कपूर के एंटी-बैक्टीरियल गुण वातावरण को शुद्ध करते हैं, और दीपक की लौ से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इन सबके बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारा विशेष लेख पढ़ें: [आरती का वैज्ञानिक रहस्य: घंटी, दीपक और कपूर के अद्भुत फायदे]

- ध्वनि चिकित्सा में घंटी का महत्व – 1928 में बर्लिन विश्वविद्यालय के शोध में पाया गया कि प्रति सेकंड 27 घनफुट वायु शक्ति से बजाई गई घंटी 1200 फुट की दूरी तक के जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। घंटी की ध्वनि तरंगें न केवल वातावरण को शुद्ध करती हैं, बल्कि हमारे स्वायत्त तंत्रिका तंत्र को संतुलित कर मानसिक शांति प्रदान करती हैं। यही कारण है कि आरती के बाद हम तरोताजा महसूस करते हैं।
- अग्नि चिकित्सा और दीपक का प्रभाव – दीपक की लौ वातावरण में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करती है। यह ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के संतुलन को बनाए रखती है तथा धनात्मक-ऋणात्मक आयनों का संतुलन स्थापित करती है। पारंपरिक चीनी चिकित्सा में ‘मोक्सीबस्टन’ जैसी प्रक्रियाएँ भी अग्नि चिकित्सा के वैश्विक महत्व को प्रमाणित करती हैं।
- कपूर के वैज्ञानिक गुण – कपूर में शक्तिशाली जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुण होते हैं। यह त्वचा संक्रमण, सिरदर्द, पेट दर्द, दस्त और जोड़ों के दर्द में लाभकारी है। जलने पर कपूर फिनॉल और एंटीसेप्टिक यौगिक छोड़ता है, जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। यह एकमात्र ऐसा पदार्थ है जो बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह जल जाता है।
- सुगंध चिकित्सा में धूप-अगरबत्ती की भूमिका – धूप की सुगंध मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम को प्रभावित कर तनाव कम करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। धूप के धुएं में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं जो वातावरण को शुद्ध करते हैं। विभिन्न देवताओं के लिए भिन्न सुगंधों का विधान उनके चिकित्सीय गुणों पर आधारित है – शिव के लिए कपूर, विष्णु के लिए चंदन, लक्ष्मी के लिए गुलाब।
- ऊर्जा तरंगों का प्रभाव – घंटी, शंख और मंत्रों से उत्पन्न ध्वनि तरंगें वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करती हैं। ये तरंगें हमारी कोशिकाओं को सक्रिय बनाती हैं। सामूहिक आरती में उत्पन्न ऊर्जा की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है।
- रंग चिकित्सा और दीपक की लौ – दीपक की लौ का पीला रंग बुद्धि और आत्मविश्वास बढ़ाता है, नारंगी रंग उत्साह और रचनात्मकता बढ़ाता है, जबकि लाल रंग ऊर्जा और शक्ति का संचार करता है। घी की लौ सात्विक और तेल की लौ तामसिक ऊर्जा का प्रतीक है।
- धातुओं का वैज्ञानिक महत्व – तांबे के पात्र में रखा जल रोगाणुरोधी होता है – यही कारण है कि चरणामृत तांबे के पात्र में रखा जाता है। चांदी में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं।
इस प्रकार, आरती हमारे ऋषियों की वैज्ञानिक दूरदर्शिता का प्रमाण है। यह शरीर, मन और वातावरण को शुद्ध और ऊर्जावान बनाने की संपूर्ण प्रक्रिया है।
10. आरती और संगीत का संबंध: एक दिव्य समन्वय
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह संगीत, लय और भक्ति का अद्भुत संगम है। जब घंटी की ध्वनि, शंखनाद, मंजीरे की झनकार और मधुर भजन एक साथ गूंजते हैं, तो वह वातावरण दिव्य बन जाता है। भारतीय संगीत परंपरा और आरती का गहरा संबंध रहा है। आइए, इस संबंध को विस्तार से समझते हैं।
🎵 विभिन्न रागों में गाई जाने वाली आरतियाँ
भारतीय शास्त्रीय संगीत में रागों का विशेष महत्व है। प्रत्येक राग का अपना समय, मिजाज और प्रभाव होता है। आरतियाँ भी अलग-अलग समय पर अलग-अलग रागों में गाई जाती हैं।
- सुबह की आरती के राग – सुबह की मंगला आरती में प्रायः राग भैरव, राग रामकली या राग बिलावल का प्रयोग किया जाता है। ये राग सुबह के समय गाए जाते हैं और इनमें गंभीरता तथा शांति का भाव होता है। राग भैरव का संबंध स्वयं भगवान शिव से माना जाता है और यह आरती को एक अलग ही दिव्यता प्रदान करता है।
- शाम की आरती के राग – संध्या आरती में राग पूरिया, राग यमन या राग भीमपलासी का प्रयोग होता है । राग यमन विशेष रूप से संध्या के समय गाया जाता है और इसमें करुणा, शांति और भक्ति रस का अद्भुत संगम होता है। पटना के कंगन घाट पर आयोजित गंगोत्सव में संगीतज्ञों ने राग यमन और झाला की प्रस्तुति दी थी ।
- रात्रि की आरती के राग – रात्रि में होने वाली शयन आरती में प्रायः राग दरबारी, राग मालकौंस या राग चंद्रकौंस का प्रयोग किया जाता है। ये राग गंभीर, मधुर और निद्रा के लिए अनुकूल होते हैं।
- विशेष अवसरों के राग – त्योहारों और विशेष अवसरों पर आरती में राग देस, राग केदार, राग हमीर या राग बहार का प्रयोग किया जाता है। दीपावली पर राग दीपक की विशेष मान्यता है।
🥁 आरती के समय प्रयुक्त वाद्य यंत्र
आरती के दौरान अनेक वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व और ध्वनि है।

- घंटी – घंटी आरती का सबसे महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र है। आरती के दौरान लगातार घंटी बजती रहती है। शास्त्रों के अनुसार, घंटी की ध्वनि नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाती है और देवताओं का आह्वान करती है । घंटी की ध्वनि से उत्पन्न कंपन वातावरण को शुद्ध करते हैं और मन को एकाग्र करते हैं।
- शंख- शंखनाद का विशेष महत्व है। शंख को देवताओं का वाद्य यंत्र माना गया है। आरती से पहले और बाद में शंख बजाया जाता है। शंख की ध्वनि में जीवाणुनाशक गुण होते हैं और यह वातावरण को पवित्र करता है । शंख में जल भरकर भगवान के चारों ओर घुमाने की भी परंपरा है।
- झांझ- झांझ धातु के बने होते हैं और इन्हें आपस में टकराकर बजाया जाता है। यह मुख्यतः उत्तर भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान में प्रचलित है। झांझ की तेज और स्पष्ट ध्वनि आरती में उत्साह और ऊर्जा का संचार करती है। द्वारकाधीश मंदिर की आरती में झांझ का विशेष प्रयोग होता है।
- मंजीरा- मंजीरा भी झांझ की तरह ही होता है, लेकिन आकार में छोटा होता है। यह पीतल या कांसे का बना होता है। मंजीरा की ध्वनि मधुर और स्थिर होती है। इसका प्रयोग लय बनाए रखने के लिए किया जाता है। भजन-कीर्तन में मंजीरे का विशेष स्थान है।
- हारमोनियम – हारमोनियम एक पाश्चात्य वाद्य यंत्र है जो भारतीय संगीत में पूरी तरह घुल-मिल गया है। आरती के दौरान हारमोनियम पर आरती की धुन बजाई जाती है। यह स्वर प्रदान करता है और गायन में सहायक होता है। लगभग सभी मंदिरों और घरों में हारमोनियम का प्रयोग होता है।
- तबला- तबला भारतीय ताल वाद्य यंत्रों में सबसे प्रमुख है। आरती के दौरान तबले पर ताल दी जाती है। वाराणसी में गंगा आरती के दौरान तबले की टनकार आरती को और भी मधुर बना देती है । तबले की विभिन्न तालें आरती के प्रकार और समय के अनुसार बदलती हैं।
- अन्य वाद्य यंत्र- इनके अलावा आरती में ढोलक, खड़ताल, नगाड़ा, ढोल, शहनाई और सारंगी आदि का भी प्रयोग किया जाता है। बड़े मंदिरों में तो पूरा वाद्य वृंद ही होता है।
🎤 प्रसिद्ध संगीतकारों द्वारा गाई गई आरतियाँ
अनेक प्रसिद्ध संगीतकारों ने आरतियों को अपनी मधुर आवाज़ दी है।
- पंडित भीमसेन जोशी – पंडित भीमसेन जोशी ने “ॐ नमः शिवाय” और कई शिव आरतियाँ गाई हैं। उनकी गंभीर आवाज़ में गाई गई आरती सुनकर भक्ति रस का अनूठा अनुभव होता है।
- एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी- दक्षिण भारत की प्रसिद्ध गायिका एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने “विष्णु सहस्रनाम” और कई आरतियाँ गाई हैं। उनकी आवाज़ में गाई गई आरती अत्यंत भावपूर्ण होती है।
- लता मंगेशकर – स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अनेक आरतियाँ गाई हैं। उनका गाया “ॐ जय जगदीश हरे” तो घर-घर में प्रसिद्ध है। उन्होंने गणेश आरती, लक्ष्मी आरती, दुर्गा आरती सहित लगभग सभी प्रमुख आरतियाँ गाई हैं।
- पंडित जसराज- पंडित जसराज ने “हरे राम हरे राम” और कई आरतियाँ गाई हैं। उनकी मधुर आवाज़ में गाई गई आरती सुनकर मन शांत हो जाता है।
- अनुराधा पौडवाल – अनुराधा पौडवाल ने भी कई आरतियाँ गाई हैं। उनका गाया “शिव शंकर करुणाकर” बहुत प्रसिद्ध है।
11. आरती के आर्थिक और सामाजिक पहलू
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे समाज और अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ी एक व्यापक परंपरा है। आरती की परंपरा ने एक विशाल आर्थिक तंत्र को जन्म दिया है। मंदिरों में आरती से जुड़ी व्यवस्था से लेकर पूजा सामग्री के व्यवसाय तक, यह हजारों लोगों की आजीविका का साधन है। साथ ही, सामूहिक आरती समाज में समरसता और एकता का भाव पैदा करती है। इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए पढ़ें: [आरती का आर्थिक और सामाजिक महत्व : मंदिरों से लेकर बाजार तक]
मंदिरों में आरती की व्यवस्था
मंदिरों में आरती एक सुव्यवस्थित प्रबंधन तंत्र के तहत होती है। पुजारी और आचार्य वैदिक मंत्रों से आरती करते हैं, सहायक पुजारी शंख-घंटी बजाते हैं, और प्रबंधन समिति समय-आयोजन निर्धारित करती है। मंदिरों में सात प्रकार की आरतियाँ होती हैं – मंगला, श्रृंगार, पूजा, भोग, धूप, संध्या और शयन आरती। गंगा आरती (वाराणसी, हरिद्वार), द्वारकाधीश मंदिर और तिरुपति बालाजी की आरतियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं।
आरती सामग्री का व्यवसाय
आरती ने एक विशाल उद्योग विकसित किया है। तांबा-पीतल की थालियाँ, दीपक, घंटी, शंख का निर्माण मुरादाबाद, जयपुर, वाराणसी जैसे शहरों में हजारों कारीगरों की आजीविका का साधन है। दीपावली पर लाखों मिट्टी के दीपक बेचे जाते हैं, जिससे कुम्हार समुदाय को रोजगार मिलता है।
धूप-अगरबत्ती उद्योग भारत का प्रमुख उद्योग है। मैसूर, बेंगलुरु, कानपुर, दिल्ली, अहमदाबाद और हैदराबाद इसके प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ से अगरबत्ती का निर्यात भी होता है। भीमसेनी कपूर, शुद्ध घी, सरसों-तिल का तेल, फूल-मालाओं का व्यवसाय भी लाखों लोगों को रोजगार देता है। डिजिटल युग में पूजा सामग्री का ऑनलाइन बाजार भी तेजी से बढ़ा है।
दान-दक्षिणा की परंपरा
दक्षिणा संस्कृत के ‘दक्षिण’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है सम्मान स्वरूप दी गई भेंट। मनुस्मृति के अनुसार, “दक्षिणा ही यज्ञ का फल है, बिना दक्षिणा यज्ञ अधूरा है।” पुजारी को दक्षिणा देने के पीछे सम्मान, कृतज्ञता और उनकी जीविका का भाव है। यह पुजारी के सत्कर्म से ऋणमुक्त होने और कर्म का फल समर्पित करने का माध्यम है। मंदिरों में दान-दक्षिणा से ही मंदिरों का रख-रखाव, पुजारियों का वेतन और सामाजिक कार्य संभव होते हैं।

सामाजिक समरसता में योगदान
आरती जाति, वर्ग और धन के भेदभाव को मिटाकर सामाजिक समरसता का भाव पैदा करती है। ‘समरसता आरती’ के आयोजनों में समाज के सभी वर्ग एक साथ भाग लेते हैं। मंदिरों में सभी एक पंक्ति में खड़े होते हैं, एक साथ आरती गाते हैं और एक ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। महिलाओं की भागीदारी भी विशेष महत्व रखती है – बंगाल की आरती में महिलाओं की उलूल-ध्वनि इसकी पहचान है।
सामूहिक आरती के लाभ
सामूहिक आरती से सामुदायिक एकता, सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आरती के मधुर गायन से तनाव कम होता है, अकेलेपन का अहसास नहीं होता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। आयोजनों से सामाजिक संगठन और नेतृत्व क्षमता भी विकसित होती है।
आर्थिक दृष्टि से आरती ने लाखों लोगों की आजीविका का साधन बनाया है, तो सामाजिक दृष्टि से यह समाज को जोड़ने, समरसता बढ़ाने और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम है। आरती वास्तव में एक संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक तंत्र है।
12. आरती से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: आरती कितनी बार करनी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः दिन में दो बार (सुबह और शाम) आरती करना उचित माना जाता है। यदि समय न हो तो एक बार शाम को भी आरती कर सकते हैं। विशेष अवसरों और त्योहारों पर अतिरिक्त आरती की जा सकती है।
प्रश्न 2: क्या बिना दीपक के आरती कर सकते हैं?
उत्तर: दीपक आरती का मुख्य अंग है। बिना दीपक के आरती पूर्ण नहीं मानी जाती। यदि घी या तेल न हो तो कपूर जलाकर आरती कर सकते हैं, लेकिन दीपक का होना आवश्यक है।
प्रश्न 3: आरती के बाद हाथ क्यों फेरते हैं?
उत्तर: आरती के बाद हाथ फेरने का दोहरा महत्व है:
- आध्यात्मिक दृष्टि से – ऐसा माना जाता है कि दीपक की लौ में देवता की दिव्य ऊर्जा होती है, जिसे हाथों से ग्रहण करना शुभ है।
- वैज्ञानिक दृष्टि से – दीपक जलाने से सकारात्मक आयन उत्पन्न होते हैं, जो हाथों से होते हुए शरीर में प्रवेश करते हैं।
प्रश्न 4: क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान आरती कर सकती हैं?
उत्तर: यह व्यक्तिगत आस्था और परंपरा पर निर्भर करता है। कुछ परंपराओं में इस दौरान पूजा-पाठ से विश्राम लिया जाता है, जबकि कुछ में कोई प्रतिबंध नहीं है। अधिकांश आधुनिक विचारधारा में इसे व्यक्तिगत इच्छा और शारीरिक सुविधा पर छोड़ दिया गया है।
प्रश्न 5: आरती में कितनी बत्तियाँ जलानी चाहिए?
उत्तर: सामान्यतः आरती में 2 या 5 बत्तियाँ जलाई जाती हैं। 2 बत्तियाँ – जीव और शिव का प्रतीक। 5 बत्तियाँ – पंच तत्व या पंच प्राण का प्रतीक। कुछ विशेष अवसरों पर 7 या 11 बत्तियाँ भी जलाई जाती हैं।
प्रश्न 6: क्या आरती में घी और तेल दोनों का उपयोग कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, दोनों का उपयोग किया जा सकता है। घी का दीपक सात्विक और शुद्ध माना जाता है। तेल का दीपक (सरसों या तिल का तेल) भी उपयोग किया जाता है, खासकर शनि देव और हनुमान जी की पूजा में।
प्रश्न 7: आरती के बाद दीपक कब बुझाना चाहिए?
उत्तर: आरती के बाद दीपक को स्वयं बुझने देना चाहिए। यदि किसी कारण से बुझाना आवश्यक हो तो हाथ हिलाकर बुझाएं, फूंक मारकर नहीं। फूंक मारना अशुद्ध माना जाता है।
प्रश्न 8: क्या सभी देवताओं की एक ही आरती कर सकते हैं?
उत्तर: “ॐ जय जगदीश हरे” यह सार्वभौमिक आरती है जो सभी देवताओं के लिए की जा सकती है। लेकिन विशिष्ट देवताओं के लिए उनकी विशेष आरतियाँ अधिक प्रभावी मानी जाती हैं।
प्रश्न 9: आरती की थाली में क्या-क्या होना चाहिए?
उत्तर: एक पूर्ण आरती की थाली में निम्न चीजें होनी चाहिए:
- दीपक (घी या तेल का)
- कपूर
- धूप या अगरबत्ती
- रोली
- अक्षत (चावल)
- फूल
- जल से भरा शंख या कलश
- घंटी
प्रश्न 10: क्या मंदिर न जा सकने पर घर पर ही आरती का लाभ मिलता है?
उत्तर: हाँ, नियमित रूप से घर पर श्रद्धा और भक्ति से की गई आरती का भी उतना ही लाभ मिलता है। भावना और विश्वास का अधिक महत्व है।
प्रश्न 11: क्या गर्भवती महिलाएं आरती कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, गर्भवती महिलाएं आरती कर सकती हैं। हालाँकि, लंबे समय तक खड़े रहने से बचना चाहिए और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर सावधानी बरतनी चाहिए। घर पर बैठकर भी आरती की जा सकती है।
प्रश्न 12: क्या बच्चे आरती कर सकते हैं?
उत्तर: अवश्य, बच्चों को छोटी उम्र से ही आरती में शामिल करना चाहिए। इससे उनमें संस्कार विकसित होते हैं। बच्चों को सरल आरतियाँ सिखाई जा सकती हैं।
प्रश्न 13: क्या एक ही आरती की थाली कई देवताओं को दिखा सकते हैं?
उत्तर: हाँ, एक ही थाली से सभी देवताओं को आरती दिखाई जा सकती है। पहले मुख्य देवता को आरती दिखाएं, फिर अन्य देवताओं को।
प्रश्न 14: क्या रविवार को आरती नहीं करनी चाहिए?
उत्तर: यह गलत धारणा है। रविवार को भी आरती की जा सकती है। हाँ, शनि देव और हनुमान जी की विशेष पूजा के कुछ नियम अलग हो सकते हैं।
प्रश्न 15: क्या यात्रा पर जाते समय आरती कर सकते हैं?
उत्तर: यात्रा के दौरान मानसिक आरती या सरल विधि से आरती की जा सकती है। होटल में भी स्वच्छ स्थान पर दीपक जलाकर आरती कर सकते हैं।
13. निष्कर्ष (Conclusion)
आरती केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिकता का जीवंत प्रतीक है। यह हमें ईश्वर से जोड़ती है, हमारे मन को शांति प्रदान करती है और हमारे जीवन में सकारात्मकता का संचार करती है।
दैनिक जीवन में आरती का महत्व
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ तनाव और अशांति बढ़ रही है, वहाँ आरती जैसे सरल धार्मिक अनुष्ठान हमें ईश्वर से जोड़ने के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। नियमित आरती करने से न केवल हमारा मन शांत होता है, बल्कि हमारे घर का वातावरण भी सकारात्मक बना रहता है।
आरती हमें सिखाती है कि प्रकाश ही सत्य है, अंधकार केवल प्रकाश का अभाव है। जैसे दीपक की लौ अंधकार को दूर करती है, वैसे ही हमारा सत्कर्म और भक्ति भाव हमारे जीवन के अंधकार को दूर कर सकते हैं।
नियमित आरती करने का संदेश
इस विस्तृत लेख के माध्यम से हमने आरती के हर पहलू को समझने का प्रयास किया है – इसके अर्थ से लेकर विधि तक, इसके महत्व से लेकर लाभ तक। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इस ज्ञान को अपने जीवन में कैसे उतारते हैं।
यदि आपने अब तक नियमित रूप से आरती नहीं की है, तो आज ही इसकी शुरुआत करें। शुरुआत में आप केवल एक दीपक जलाकर और “ॐ जय जगदीश हरे” की आरती कर सकते हैं। धीरे-धीरे इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि कैसे यह छोटा-सा अनुष्ठान आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है।
हमारी वेबसाइट पर आपको सभी प्रमुख देवताओं की आरतियाँ, उनके अर्थ और करने की विधि विस्तार से मिलेगी। नियमित रूप से आरती करें, ईश्वर की कृपा प्राप्त करें और अपने जीवन को सुख-शांति से भरें।
ॐ शांति शांति शांति! 🙏
नोट: इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न धार्मिक ग्रंथों, पुराणों और विद्वानों के विचारों पर आधारित है। यह केवल सूचना और ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से है।