1. भजन क्या है? सनातन धर्म में भक्ति संगीत का महत्व, परिभाषा और अर्थ
भजन सिर्फ एक गीत नहीं है, बल्कि यह आत्मा की वह पुकार है जो सीधे परमात्मा तक पहुँचती है। सनातन धर्म में भक्ति के विभिन्न मार्गों में से भजन सबसे सरल, सुलभ और हृदयस्पर्शी माध्यम माना गया है। जब मनुष्य शब्दों से परे जाकर ईश्वर से जुड़ना चाहता है, तो भजन उसके भावों को स्वर देता है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक अमृत है जो न केवल मन को शांति देता है बल्कि जीवन के हर दुःख-दर्द को दूर करने की क्षमता रखता है ।
आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में, जहाँ हर तरफ तनाव और अशांति है, भजन एक ऐसी सिद्ध औषधि की तरह काम करता है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है । आइए, भजन की इस पवित्र यात्रा को विस्तार से समझते हैं।

भजन की परिभाषा: केवल गीत नहीं, एक भाव
भजन क्या होता है? सरल शब्दों में कहें तो भजन किसी देवी-देवता, अवतार या गुरु के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण को व्यक्त करने वाला एक भक्ति गीत है । यह एक ऐसा माध्यम है जिसमें भक्त अपने आराध्य के प्रति अपने मन के भावों को प्रकट करता है। भजन का कोई निश्चित प्रारूप नहीं होता; यह कहीं भी, कभी भी गाया जा सकता है। चाहे वह मंदिर की पवित्र बेला हो, घर की दैनिक पूजा हो या फिर एकांत में बैठकर प्रभु का स्मरण, भजन हर जगह उपस्थित रहता है ।
भजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भाव प्रधान होता है, भाषा नहीं। भले ही व्यक्ति को गाने का शास्त्रीय ज्ञान न हो, लेकिन अगर उसके हृदय में प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम है, तो उसकी सरल धुन भी परमात्मा तक पहुँच जाती है ।
भजन शब्द का अर्थ: ‘भज्’ से ‘भजन’ तक की यात्रा
भजन शब्द का अर्थ बहुत गहरा है। यह संस्कृत की ‘भज्’ धातु से बना है। ‘भज्’ का अर्थ होता है बांटना, हिस्सा लेना, सेवा करना, आश्रय लेना और प्रेम करना । यह वह प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने अहंकार, दुखों और सीमाओं को ईश्वर को समर्पित कर देता है और बदले में उनके प्रेम, आनंद और दिव्यता का हिस्सा बन जाता है।
इसका तात्पर्य है कि भजन केवल गाना ही नहीं, बल्कि प्रभु के गुणों का स्मरण, कीर्तन और उनमें मन को लीन करना भी है। जब हम ‘भजन’ करते हैं, तो हम केवल गीत नहीं गा रहे, बल्कि अपने आराध्य के और करीब आ रहे हैं। यह एक आत्मिक प्रक्रिया है, जो हमें आत्मा से परमात्मा से जोड़ती है ।
सनातन धर्म में भजन का महत्व: क्यों जरूरी है भजन?
सनातन धर्म में भजन का महत्व अतुलनीय है। शास्त्रों और पुराणों में भजन को कलियुग में भगवान को पाने का सबसे सरल और सशक्त माध्यम बताया गया है । आइए जानते हैं कि भजन हमारे जीवन में इतना महत्वपूर्ण क्यों है:
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मन की शांति और एकाग्रता: जब मन भजन में लीन होता है, तो वह विकारों और चिंताओं से मुक्त हो जाता है। भजन की लय और ताल मस्तिष्क को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है, जिससे मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ती है ।
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भगवान से सीधा संवाद: भजन व्यक्ति और भगवान के बीच की दूरी को मिटा देता है। मीरा के भजन हों या सूरदास के पद, हर रचना में आत्मा और परमात्मा के बीच प्रेम संवाद की झलक मिलती है ।
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नकारात्मक ऊर्जा का नाश: जिस घर या स्थान पर नियमित रूप से सच्चे मन से भजन-कीर्तन होता है, वहां कभी नकारात्मक शक्तियां नहीं ठहरतीं। भजन की ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध और दिव्य बना देती हैं ।
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भक्ति का सरल मार्ग: यह धर्म का वह रूप है जिसमें किसी जटिल अनुष्ठान या कठोर तपस्या की आवश्यकता नहीं है। बस एक सच्चा हृदय चाहिए, जो प्रभु के नाम में रम सके ।
भजन और कीर्तन में अंतर: क्या है असली फर्क?
अक्सर लोग भजन और कीर्तन को एक ही मान लेते हैं, लेकिन ये दोनों भक्ति की दो अलग-अलग धाराएँ हैं। इनके स्वरूप, उद्देश्य और अनुभव में सूक्ष्म अंतर है, जिसे जानना बेहद जरूरी है ।
नीचे दी गई तालिका में हमने भजन और कीर्तन में अंतर को स्पष्ट किया है:
| विशेषता | भजन | कीर्तन |
|---|---|---|
| स्वरूप | यह एक भावपूर्ण, मधुर गीत की तरह होता है जिसमें प्रेम, विरह और समर्पण की भावना होती है। यह व्यक्तिगत अनुभव है। | यह सामूहिक उत्सव का रूप है। इसमें मुख्य गायक एक पंक्ति गाता है और समूह उसे दोहराता है। ऊर्जा और उत्साह इसमें मुख्य है । |
| उद्देश्य | इसका उद्देश्य आत्मिक शांति, एकांत में प्रभु से संवाद और अपने मन को स्थिर करना होता है। | इसका उद्देश्य सामूहिक भक्ति, नाम का जोर-शोर से उच्चारण और वातावरण को भक्तिमय बनाना है । |
| संगीत और गति | भजन की गति धीमी, शांत और लयात्मक होती है। इसे हारमोनियम, तबला या सिर्फ मन ही मन गाया जा सकता है। | कीर्तन में नृत्य, तालियाँ और ऊर्जा होती है। इसे मृदंग, झांझ, करताल जैसे वाद्यों के साथ तीव्र गति में गाया जाता है । |
| प्रभाव | भजन का प्रभाव गहरा और धीमा होता है, जो हृदय को छूता है और आंसू ला देता है। | कीर्तन का प्रभाव तात्कालिक होता है, यह समूह में उल्लास और सकारात्मक कंपन पैदा करता है। |
| उदाहरण | मीराबाई द्वारा रचित “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” । | हरे कृष्ण आंदोलन द्वारा प्रसिद्ध किया गया “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे” का सामूहिक जाप। |
नोट: कुछ विद्वानों का मत है कि भजन में मंत्र की अपेक्षा भाव अधिक होता है, जबकि कीर्तन मंत्र उच्चारण पर केंद्रित होता है, इसलिए इसका प्रभाव अधिक शक्तिशाली माना गया है ।
भजन सनातन संस्कृति की वह धरोहर है जिसने सदियों से लोगों को भक्ति के सूत्र में बांधा है। यह केवल संगीत की विधा नहीं, बल्कि योग, ध्यान और प्रार्थना का सम्मिलित रूप है । चाहे आप मंदिर में बैठकर भजन गाएं या घर के किसी कोने में एकांत में, भजन आपको हमेशा ईश्वर की उस दिव्य उपस्थिति का एहसास कराता है, जहां कोई दुख नहीं, केवल प्रेम और आनंद है।
2. भजन की उत्पत्ति और इतिहास: संतों से सुरों तक की यात्रा
भजन केवल संगीत की एक विधा नहीं है, बल्कि यह भारतीय आध्यात्मिक चेतना की वह जीवंत धारा है जो हज़ारों वर्षों से अविरल बह रही है। भजन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि स्वयं सनातन धर्म। जहां परमात्मा की स्तुति के स्वर फूटे, वहीं भजन की उत्पत्ति हुई ।
भजन का उद्गम: वैदिक काल से लोक तक
भजन की उत्पत्ति का सीधा संबंध वैदिक मंत्रों और स्तोत्रों से है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि अग्नि, इंद्र, वरुण आदि देवताओं की स्तुति में जो मंत्रों का उच्चारण करते थे, वही आगे चलकर भजन का आधार बना । धीरे-धीरे संस्कृत के इन जटिल मंत्रों ने जनभाषा का रूप लिया और यहीं से लोकगीत और भक्तिगीत की परंपरा शुरू हुई।
जब वैदिक काल की समाप्ति हुई और पौराणिक काल का आगमन हुआ, तो देवी-देवताओं के प्रति प्रेम और समर्पण को अभिव्यक्त करने के लिए सरल भाषा में रचनाएँ होने लगीं। बौद्ध और जैन परंपराओं ने भी इस रचना-विधि को अपनाया, जिससे भजन का दायरा और व्यापक हुआ ।

भक्ति आंदोलन: भजन का स्वर्णिम युग
यदि भजन के इतिहास की बात करें तो मध्यकालीन भक्ति आंदोलन उसका सबसे चमकता अध्याय है। 12वीं से 17वीं शताब्दी तक चले इस आंदोलन ने भजन को जन-जन तक पहुँचाया ।
भक्ति आंदोलन ने जाति, वर्ग और लिंग के भेदभाव को मिटाकर ईश्वर-भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया। इसी काल में भजन वह माध्यम बना जिससे आम गरीव जन भी परमात्मा से सीधा संवाद कर सका । दक्षिण भारत से शुरू हुआ यह आंदोलन उत्तर भारत में फैला और हर क्षेत्र ने अपनी स्थानीय भाषा और लोकधुनों में भजन गाए। इस दौरान सगुण (राम-कृष्ण के साकार रूप) और निर्गुण (निराकार ब्रह्म) दोनों ही धाराओं में अद्भुत भजन रचे गए ।
संत परंपरा में भजन का विकास: जन-जन की भाषा में प्रेम
संत परंपरा में भजन का विकास एक महत्वपूर्ण मोड़ है। संतों ने भजन को संस्कृत के बंधनों से मुक्त करके लोकभाषा (अवधी, ब्रज, राजस्थानी, खड़ी बोली) में गाने की परंपरा शुरू की। उनका मानना था कि ईश्वर किसी एक भाषा के मोहताज नहीं, वह तो भाव के भूखे हैं।
संतों ने भजन को केवल मंदिरों की चारदीवारी से निकालकर चौपालों, गलियों और रेगिस्तानों तक पहुँचाया। यही वह समय था जब भजन सामूहिक उपासना का सबसे सशक्त माध्यम बन गया।
निर्गुण धारा के संत
इस धारा के संतों ने निराकार ब्रह्म की उपासना पर बल दिया। उनके भजन में प्रेम, वैराग्य और समाज सुधार की झलक मिलती है।
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संत कबीरदास: भक्ति की निर्गुण धारा के सबसे प्रमुख स्तंभ हैं कबीर । उन्होंने सधुक्कड़ी भाषा में जो भजन (“साखी”, “सबद”) लिखे, वे सीधे हृदय को छूते हैं। उनके भजनों में आडंबरों पर चोट और एक ईश्वर में अटूट आस्था दिखती है। उदाहरण के लिए उनका प्रसिद्ध भजन “मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे” बताता है कि ईश्वर हर जगह विद्यमान है, बस उसे देखने की जरूरत है।
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संत दादूदयाल: कबीर के मार्ग पर चलते हुए दादूदयाल ने भी राजस्थानी भाषा में मधुर भजनों की रचना की। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और प्रेम का संदेश फैलाया ।
सगुण धारा के संत और उनका योगदान
सगुण धारा के संतों ने राम, कृष्ण, शिव और देवी के मानवीय रूप का गुणगान किया। उन्होंने अपने भजनों में वात्सल्य, श्रृंगार और प्रेम का अद्भुत चित्रण किया। यही वह समय था जब मीरा, सूरदास और तुलसीदास जैसी विभूतियों ने भजनों को एक नई ऊंचाई दी।

मीरा बाई का योगदान
मीरा बाई का नाम भजन की दुनिया में सबसे ऊपर आता है। उन्होंने अपने आराध्य कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को जिस तीव्रता और सरलता से भजनों में व्यक्त किया, वह अद्वितीय है। मीरा ने राजस्थानी और ब्रजभाषा में भजन लिखे।
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उनका भजन “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” या “बसो मेरे नैनन में नंदलाल” आज भी उतनी ही ताजगी के साथ गूंजते हैं जितने सदियों पहले गूंजते थे। मीरा के योगदान ने यह सिद्ध किया कि भजन के लिए न तो किसी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा जरूरी है और न ही किसी बंधन की, बस एक सच्चा प्रेमी हृदय चाहिए।
तुलसीदास का योगदान
तुलसीदास ने अवधी भाषा में जो अमर रचनाएँ दीं, उनमें भजनों का विशेष स्थान है। उनके द्वारा रचित राम भजन, “श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन”, “हनुमान चालीसा” और “रामचरितमानस” के पद आज भी हर घर में श्रद्धा से गाए जाते हैं। तुलसीदास ने भजनों के माध्यम से राम-भक्ति को इतना सुलभ बना दिया कि एक साधारण किसान भी राम के नाम में डूब सके ।
सूरदास का योगदान
सूरदास भक्तिकाल के सबसे महान कवियों में से एक हैं। उनका योगदान कृष्ण भजनों के क्षेत्र में अतुलनीय है। उनके प्रसिद्ध भजन “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” की मिठास और करुणा आज भी लोगों के मन में बसती है।
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सूरदास ने ब्रजभाषा में कृष्ण की बाल-लीलाओं और वात्सल्य भाव का ऐसा सजीव चित्रण किया कि श्रोता स्वयं को उसी लोक में पहुँचा हुआ महसूस करता है। उन्होंने अपने पदों में सभी रसों को भक्ति से जोड़ा।
मंदिरों और सत्संग में भजन परंपरा: आस्था का जीवंत स्वर
मंदिरों और सत्संग में भजन परंपरा सदियों से चली आ रही है। मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि संगीत और भक्ति के संगम स्थल भी रहे हैं। भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में सुबह की प्रभाती (सुबह गाए जाने वाले भजन) से लेकर शाम की आरती और रात के भजन संध्या तक की परंपरा रही है ।
मंदिरों में भजन
प्राचीन काल से ही मंदिरों में देवदासियों और मंदिर के पुजारियों द्वारा देवताओं को जगाने से लेकर सुलाने तक भजन गाए जाते थे। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि देवता को प्रसन्न करने और भक्तों को आध्यात्मिक अनुभूति कराने का माध्यम था। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत के मंदिरों में ठुमरी और दादरा शैली के भजन गाए जाते थे, जो बाद में शास्त्रीय संगीत से भी जुड़े ।
सत्संग में भजन
भक्ति आंदोलन के दौरान सत्संग की परंपरा बहुत मजबूत हुई। संत अपने शिष्यों के साथ एकत्रित होते थे और सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन करते थे। यह सत्संग लोगों को एक सूत्र में बांधता था ।
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सामूहिक चेतना: सत्संग में भजन का मुख्य उद्देश्य सामूहिक भक्ति था। जब एक साथ कई लोग भगवान के नाम का उच्चारण करते हैं, तो वहां एक विशेष ऊर्जा का संचार होता है। यह परंपरा आज भी हर शहर और गांव में देखी जा सकती है, जहां लोग हर सप्ताह एकत्रित होकर सत्संग करते हैं।
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निर्गुण-सगुण का संगम: सत्संग में निर्गुण (जैसे कबीर के पद) और सगुण (जैसे मीरा के भजन) दोनों प्रकार के भजन गाए जाते हैं। इससे भक्तों को दोनों प्रकार की भक्ति का आनंद मिलता है और उनकी आस्था और मजबूत होती है ।
भजन की उत्पत्ति वैदिक मंत्रों से हुई, भक्ति आंदोलन में उसने पंख लगाए और संतों ने उसे हृदय की भाषा दी। चाहे मीरा का प्रेम हो, सूरदास की करुणा हो या कबीर का सीधा सच, भजन ने हर भाव को आत्मसात किया। मंदिरों की पवित्र दीवारों से निकलकर यह सत्संगों के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक पहुँचा और लोगों को भक्ति के अमृत से सींचा।
आज भी जब कहीं “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे” या “वैष्णव जन तो तेने कहिये” के स्वर गूंजते हैं, तो लगता है जैसे वही संत परंपरा, वही मंदिर की गूंज और वही सदियों पुराना इतिहास हमारे बीच जीवित हो उठता है।
3. भजन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व: क्यों बदल जाता है जीवन?
भजन केवल गाने का नाम नहीं है, यह जीवन जीने की कला है। सनातन धर्म में भजन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व इतना गहरा है कि इसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। जब कोई व्यक्ति भजन गाता है, तो वह सिर्फ अपने कंठ से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा की गहराइयों से स्वर निकालता है।
भजन वह पुल है जो इस भौतिक संसार और उस परम धाम के बीच की दूरी को मिटा देता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जहां मनुष्य धीरे-धीरे अपने अहंकार को विसर्जित करता है और प्रभु चरणों में समर्पित हो जाता है। आइए समझते हैं कि आखिर भजन का हमारे जीवन में इतना गहरा महत्व क्यों है।
भगवान से जुड़ने का सरल माध्यम: बिना शर्त का प्रेम
आज के इस भागदौड़ भरे युग में, जहां हर रिश्ता शर्तों पर टिका है, भगवान से जुड़ने का सरल माध्यम है भजन। हम भगवान को देख नहीं सकते, छू नहीं सकते, लेकिन जब हम भजन गाते हैं, तो हम उनकी उपस्थिति को अपने हृदय में महसूस कर सकते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में भगवान का सबसे आसानी से साक्षात्कार नाम-स्मरण और भजन-कीर्तन से ही संभव है । क्योंकि इस युग में न तो घोर तपस्या की शक्ति है, न ही जटिल यज्ञों का सामर्थ्य, लेकिन सच्चे मन से गाया गया एक भजन सीधे परमात्मा तक पहुंच जाता है।
जब मीरा ने कहा “मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई”, तो उन्होंने किसी शास्त्रीय संगीत का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि अपने प्रभु के प्रति असीम प्रेम को व्यक्त किया। भजन वह खिड़की है, जिससे झांककर हम उस परम पिता को देख सकते हैं, जो हर जगह विद्यमान है।
भजन के माध्यम से हम भगवान से दो-तरफा संवाद स्थापित करते हैं। हम उनसे प्रेम करते हैं, उनसे शिकायत करते हैं, उनसे विनती करते हैं – और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि वह हमारी सुन रहे हैं। यही भगवान से जुड़ने का सरल माध्यम है, बिना किसी मध्यस्थ के, बिना किसी जटिल अनुष्ठान के ।
मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा: आधुनिक जीवन का तनाव-मुक्ति मंत्र
आज पूरी दुनिया में लोग मानसिक रोगों से जूझ रहे हैं। चिंता, अवसाद, तनाव – ये आम समस्या बन गए हैं। ऐसे में मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा पाने का सबसे कारगर उपाय है भजन।
जब हम भजन गाते हैं या सुनते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगें हमारे मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। यह एक प्रकार का ध्वनि चिकित्सा (Sound Therapy) है, जिसे हमारे ऋषि-मुनि हजारों वर्ष पहले जान गए थे।
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तनाव में कमी: भजन की लय और ताल हमारे हृदय की धड़कन को सामान्य करती है और मस्तिष्क में अल्फा तरंगें उत्पन्न करती है, जो गहरी विश्रांति की अवस्था होती है। इससे तनाव और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं अपने आप कम हो जाती हैं।
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नकारात्मकता का नाश: जिस घर में नियमित रूप से भजन गूंजते हैं, वहां कभी नकारात्मक ऊर्जा नहीं ठहरती। भजनों की दिव्य ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है और सकारात्मक कंपन से भर देती है।
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मन की एकाग्रता: भजन गाते समय हमारा पूरा ध्यान उसके शब्दों और भाव पर केंद्रित हो जाता है। यह एक प्रकार का ध्यान (Meditation) ही है। जो लोग ध्यान नहीं कर पाते, उनके लिए भजन ध्यान का सबसे सुंदर रूप है।
जब हम सच्चे मन से “हरे राम हरे कृष्ण” का उच्चारण करते हैं, तो वह कंपन हमारे शरीर की हर कोशिका में व्याप्त हो जाता है। यही मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा का रहस्य है।
भक्ति भाव को मजबूत करना: सूखी भक्ति से सराबोर भक्ति तक
कई बार हम भगवान की पूजा तो करते हैं, लेकिन वह यांत्रिक हो जाती है। सुबह उठकर मंत्र पढ़ लिए, आरती कर ली, लेकिन मन कहीं और भटक रहा था। यहां भक्ति भाव को मजबूत करना आवश्यक हो जाता है, और यही काम भजन बखूबी करता है।
भजन शुष्क भक्ति को सराबोर भक्ति में बदल देता है। यह हृदय में प्रेम की गंगा बहा देता है।
भाव-विभोर करने की शक्ति
भजन में वह अद्भुत शक्ति है कि यह कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला देता है। जब सूरदास कृष्ण की बाल-लीलाओं का वर्णन करते हैं, तो हमारी आंखों के सामने बाल कृष्ण की मूर्ति घूमने लगती है। जब तुलसीदास “श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन” गाते हैं, तो हमारा मन राम के चरणों में लीन हो जाता है।
भजन नवधा भक्ति के सभी अंगों को समेटे हुए है:
- श्रवण: भजन सुनना
- कीर्तन: भजन गाना
- स्मरण: भजन के शब्दों के माध्यम से प्रभु को याद करना
- अर्चन: भजन के माध्यम से भावपूर्ण आराधना
जब हम भजन गाते हैं, तो हम अपने अहंकार को त्याग रहे होते हैं। हम कह रहे होते हैं, “हे प्रभु, मैं कुछ नहीं हूं, तू ही सब कुछ है।” यह विनम्रता ही भक्ति भाव को मजबूत करती है और हमें भगवान के और करीब ले जाती है।
सामूहिक भक्ति में आनंद की वृद्धि
अकेले भजन करने का अपना अलग आनंद है, लेकिन जब हम सत्संग में बैठकर सामूहिक रूप से भजन गाते हैं, तो उसका आनंद कई गुना बढ़ जाता है। एकता में ही शक्ति है। जब सैकड़ों लोग एक साथ “निताई-गौरांगर” या “राधे-कृष्ण” के स्वर गूंजते हैं, तो वह कंपन पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देता है।
इस सामूहिक भजन में हमारा व्यक्तिगत अहंकार विलीन हो जाता है और हम उस विराट चेतना से जुड़ जाते हैं, जो परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। यही भक्ति भाव को मजबूत करने का सबसे सुंदर तरीका है।
भजन से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ
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कर्मों का क्षय: भजन गाने से हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का नाश होता है। यह एक प्रकार का प्रायश्चित है, जो बिना कष्ट के ही हमारे पापों को धो देता है।
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चित्त की शुद्धि: भजन हमारे मन के विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। मन निर्मल होता है, तो भगवान की प्राप्ति सहज हो जाती है।
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मोक्ष का मार्ग: अंततः सनातन धर्म का लक्ष्य मोक्ष है – जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति। भजन हमें उसी मार्ग पर ले जाता है। यह हमें संसार के मोह-माया से ऊपर उठाकर उस परम धाम की ओर ले जाता है, जहां केवल शाश्वत आनंद है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण
आधुनिक विज्ञान भी अब यह मानने लगा है कि ध्वनि कंपन का हमारे शरीर और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भजन के दौरान निकलने वाली ध्वनि तरंगें हमारे सेल्स को पुनर्जीवित करती हैं और हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत करती हैं।
जापान के वैज्ञानिक डॉ. इमोटो ने पानी पर किए गए प्रयोगों में सिद्ध किया कि सकारात्मक शब्द सुनने से पानी के क्रिस्टल सुंदर आकार लेते हैं। हमारा शरीर 70% पानी है। जब हम भजन गाते हैं, तो हमारे शरीर का हर अणु सकारात्मक कंपन से भर जाता है।
4. भजन गाने की सही विधि: जब सुर और भाव का मिलन हो जाए
भजन केवल गाने का नाम नहीं, यह तो ईश्वर से वार्तालाप है। जैसे किसी से बात करने के लिए हम सही समय, सही शब्द और सही भाव चुनते हैं, वैसे ही भजन गाने की भी एक विधि है। यह विधि कोई कठोर नियम नहीं, बल्कि सदियों के अनुभव से निकले वे सरल सुझाव हैं जो आपके भजन को महज गीत से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुभव बना देते हैं।

आज हम जानेंगे भजन गाने की सही विधि – उस तैयारी से लेकर वाद्य यंत्रों के उपयोग तक, जो आपके भजन को और भी मधुर और प्रभावी बना सकती है।
भजन से पहले की तैयारी: मन, शरीर और वातावरण का शुद्धिकरण
भजन से पहले की तैयारी सबसे महत्वपूर्ण चरण है। जैसे किसी उत्सव से पहले घर की साफ-सफाई और सजावट की जाती है, वैसे ही भजन से पहले अपने मन और शरीर को तैयार करना आवश्यक है।
- मन की तैयारी – भजन शुरू करने से पहले कुछ देर शांत बैठकर अपने मन को केंद्रित करें। दिनभर की चिंताओं, काम-काज और परेशानियों को कुछ देर के लिए भगवान के चरणों में छोड़ दें। एकाग्रता के लिए कुछ गहरी साँसें लें और अपने आराध्य का ध्यान करें। “मन ही भजन का मूल आधार है। बिना मन के भजन केवल कंठ का व्यायाम मात्र है।”
- शारीरिक शुद्धता – पारंपरिक रूप से भजन गाने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने की सलाह दी जाती है। यह बाहरी शुद्धि का प्रतीक है। यदि संभव न हो तो कम से कम हाथ-मुँह धोकर, साफ कपड़े पहनकर भजन का आसन ग्रहण करें। इससे शरीर में एक ताजगी और सकारात्मकता आती है।
- भाव की तैयारी – भजन में भाव सबसे महत्वपूर्ण है। यह न सोचें कि आपकी आवाज़ कितनी मधुर है, बल्कि यह सोचें कि आपके हृदय में प्रभु के प्रति कितना प्रेम है। ठाकुर जी के उस रूप का ध्यान करें, जिससे आप सबसे अधिक प्रेम करते हैं – चाहे वह ठाकुर जी का बाल स्वरूप हो, या फिर योगीराज का रौद्र रूप।
सही समय और स्थान: जब सृष्टि स्वयं भजनमय हो
सही समय और स्थान का चयन भजन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। हर समय और हर स्थान भजन के लिए उपयुक्त तो है, लेकिन कुछ विशेष समय और स्थान ऐसे हैं जहां भजन का प्रभाव अधिक गहरा होता है।
- प्रातःकाल का समय – ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 4 से 6 बजे के बीच का समय, जिसे ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, भजन के लिए सबसे उत्तम माना गया है। इस समय वातावरण शुद्ध और शांत रहता है। सृष्टि में सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। इस समय गाए गए भजन मन को गहरी शांति देते हैं और उनका प्रभाव दिनभर बना रहता है।
- संध्या का समय – शाम के समय, जब दिन भर की थकान के बाद घर लौटते हैं, उस समय गाए गए भजन मन को तरोताजा कर देते हैं। सूर्यास्त के समय का संध्या आरती का विशेष महत्व है। इस समय घर में दीपक जलाकर भजन गाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- पवित्र स्थान – मंदिर तो भजन के लिए सर्वोत्तम स्थान है ही, लेकिन घर का वह कोना भी पवित्र हो जाता है जहां नियमित रूप से भजन गूंजते हैं। अपने घर में एक भजन स्थल निर्धारित करें। वहां साफ-सफाई रखें, ईश्वर का चित्र या मूर्ति स्थापित करें। नियमित रूप से उसी स्थान पर बैठकर भजन करने से वह स्थान अपने आप में ऊर्जा से भर जाता है।
- प्राकृतिक वातावरण – यदि संभव हो तो कभी-कभी नदी के किनारे, पहाड़ों पर या बगीचे में बैठकर भजन गाएं। प्रकृति की गोद में गाया गया भजन हृदय को अलग ही आनंद देता है। पक्षियों का कलरव, पेड़ों की सरसराहट – ये सब मिलकर भजन की रागिनी को और मधुर बना देते हैं।
समूह में भजन गाने का महत्व: एकता में है शक्ति
समूह में भजन गाने का महत्व केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है। जब अनेक लोग एक साथ मिलकर भजन गाते हैं, तो उसकी ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
- सामूहिक ऊर्जा का प्रवाह – जब सौ लोग एक साथ “हरे राम हरे कृष्ण” का उच्चारण करते हैं, तो उनके हृदयों से निकली ऊर्जा मिलकर एक विशाल ऊर्जा लहर बन जाती है। यह ऊर्जा न केवल उपस्थित लोगों को प्रभावित करती है, बल्कि उस क्षेत्र के वातावरण को भी शुद्ध करती है।
- सत्संग का आनंद – सत्संग में गाए गए भजनों का आनंद ही अलग होता है। एक व्यक्ति मुख्य भजन गाता है, और बाकी सब उसके स्वर में स्वर मिलाते हैं। यह सामूहिक समर्पण का अद्भुत अनुभव होता है। सत्संग में हम अपने अहंकार को त्यागकर समूह के साथ बहना सीखते हैं। “अकेले भजन करो तो मन लगता है, समूह में भजन करो तो मन विलीन हो जाता है।”
- पारिवारिक एकता – घर में सभी सदस्य मिलकर भजन करें तो परिवार में प्रेम और एकता बढ़ती है। बच्चों में संस्कार आते हैं, बड़ों को सम्मान मिलता है। रविवार की शाम या किसी विशेष अवसर पर पूरा परिवार इकट्ठा होकर भजन गाए – यह परंपरा परिवार को जोड़ने का सबसे सुंदर माध्यम है।
वाद्य यंत्रों का उपयोग: जब सुर और ताल का संगम हो
वाद्य यंत्रों का उपयोग भजन को और अधिक मधुर और लयबद्ध बना देता है। ये यंत्र केवल संगीत नहीं बजाते, बल्कि भक्तों के भाव को स्वर देते हैं।
हारमोनियम – भजन की आत्मा
हारमोनियम भजन का सबसे लोकप्रिय वाद्य यंत्र है। यह भजन के स्वर को स्थिर रखता है और मुख्य गायक को सुर देने में मदद करता है। हारमोनियम पर भजन की धुन बजाना सीखना बहुत कठिन नहीं है। थोड़े अभ्यास से कोई भी भक्त हारमोनियम पर सरल धुनें बजा सकता है।
हारमोनियम बजाते समय ध्यान रखें:
- सुरों को साफ और स्पष्ट बजाएं
- भजन के भाव के अनुसार धुन का उतार-चढ़ाव रखें
- हारमोनियम की ध्वनि इतनी तेज न हो कि भजन के शब्द दब जाएं
ढोलक – भजन की धड़कन
ढोलक भजन में लय और ताल का संचार करती है। इसकी थाप हृदय की धड़कन की तरह होती है – जो भजन को जीवंत बना देती है। ढोलक की विभिन्न बोलियाँ (तिरकिट, धा, तिन, ना) भजन के रस को और गहरा करती हैं।
ढोलक के लाभ:
- यह भजन में उत्साह और ऊर्जा भर देती है
- इसकी ताल पर झूमना और नृत्य करना सहज हो जाता है
- समूह भजन में सबको एक लय में बांधे रखती है
करताल और झांझ – भक्ति की रुनझुन
करताल और झांझ छोटे लेकिन अत्यंत प्रभावशाली वाद्य यंत्र हैं। ये भजन में चंचलता और मधुरता लाते हैं। करताल की रुनझुन सुनते ही भक्तों के हाथ अपने आप ताली बजाने लगते हैं। करताल बजाना बहुत आसान है और कोई भी इसे सीख सकता है। बच्चे भी करताल बजाकर भजन में भाग ले सकते हैं। यह उन्हें भक्ति से जोड़ने का सरल माध्यम है।
अन्य पारंपरिक वाद्य
इनके अलावा भी अनेक वाद्य यंत्र हैं जो भजन को समृद्ध बनाते हैं:
- मंजीरा: छोटे से ताल देने वाले यंत्र
- खड़ताल: राजस्थानी भजनों में विशेष प्रयोग
- हरमोनियम का बैगपाइप संस्करण – कुछ क्षेत्रों में प्रचलित
- शंख और घंटी – आरती के समय विशेष प्रयोग
ध्यान रखने योग्य बातें
वाद्य यंत्रों का उपयोग करते समय कुछ बातों का ध्यान रखें:
- साधन का सम्मान: वाद्य यंत्र कोई साधारण वस्तु नहीं, यह भक्ति का माध्यम है। इसे साफ रखें और सम्मान दें।
- ध्वनि का संतुलन: सभी वाद्य यंत्रों की ध्वनि संतुलित होनी चाहिए। कोई एक यंत्र इतना तेज न हो कि भजन के शब्द सुनाई न दें।
- भाव प्रधान हो: याद रखें, वाद्य यंत्र केवल साधन हैं। असली चीज है आपका भाव। तकनीकी खामियों से घबराएं नहीं, सच्चे भाव से गाया गया भजन ही प्रभु तक पहुंचता है।
- अभ्यास का महत्व: यदि समूह में वाद्य बजा रहे हैं तो पहले थोड़ा अभ्यास कर लें। सबके सुर और ताल एक होने चाहिए।
भजन गाते समय ध्यान रखने योग्य विशेष बातें
- उच्चारण की स्पष्टता – भजन के शब्दों का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। भगवान के नाम को अस्पष्ट रूप में न गाएं। प्रभु के नाम की मिठास तभी अनुभव होगी जब शब्द साफ-साफ सुनाई देंगे।
- गति का संतुलन – भजन की गति न बहुत तेज हो और न बहुत धीमी। जहां भाव हो, वहां थोड़ा रुकें, जहां उत्साह हो, वहां थोड़ा तेज करें। भजन के भाव के अनुसार गति बदलनी चाहिए।
- दोहराव की कला – भजन के मुखड़े (कोरस) को दोहराने से भाव गहरा होता है। जब कोई पंक्ति बार-बार दोहराई जाती है, तो वह मन में बस जाती है और ध्यान की अवस्था में ले जाती है।
- आँखें बंद करके गाना – जब संभव हो, आँखें बंद करके भजन गाएं। बाहरी दुनिया से ध्यान हटेगा और अंदर की दुनिया में प्रवेश होगा। अपने आराध्य के रूप को हृदय में बसाएं और उनके लिए गाएं।
- बीच में रुकावट से बचें – भजन के दौरान बीच में बात करना, उठना-बैठना, या मोबाइल फोन देखना नहीं चाहिए। भजन के समय पूरा ध्यान केवल भजन पर होना चाहिए। यह समय प्रभु के साथ बिताया गया समय है, इसे पूरा सम्मान दें।
निष्कर्ष : भजन गाने की सही विधि का पालन करके हम अपने भजन को और अधिक प्रभावी और आनंददायक बना सकते हैं। याद रखें, ये सभी नियम सहायक हैं, लेकिन इनसे अधिक महत्वपूर्ण है आपका भाव और समर्पण।
सही समय पर, सही स्थान पर, उचित तैयारी के साथ, यदि संभव हो तो समूह में और वाद्य यंत्रों के साथ गाया गया भजन हृदय को गहराई से छू लेता है। लेकिन यदि इनमें से कुछ भी उपलब्ध न हो, तो बस एक कोना ढूंढ़ें और मन ही मन प्रभु का नाम जपें – वह भी सबसे उत्तम भजन ही है।
क्योंकि सच तो यह है कि प्रभु को हमारी आवाज़ की नहीं, हमारे भाव की जरूरत होती है। और जब भाव सच्चा हो, तो हर स्थान मंदिर बन जाता है, हर समय ब्रह्म मुहूर्त हो जाता है, और हर श्वास भजन बन जाती है।
नाथ संगीत सिखाइए, कैसे तुझसे प्रीत करूँ।
सुर न मिले न ताल मिले, कैसे तुझको गीत सुनाऊँ।।
5. भजन के प्रकार: हर रस में रंगा है प्रभु का नाम
भजन केवल एक नहीं, यह तो भावों का अथाह सागर है। जैसे ईश्वर के अनेक रूप हैं, वैसे ही उनकी स्तुति के भी अनेक रूप हैं। हर समय का अपना भजन है, हर भाव का अपना भजन है, हर देवी-देवता का अपना भजन है। यही विविधता ही भजन की सबसे बड़ी विशेषता है।
आज हम भजन के प्रकार को विस्तार से समझेंगे – देवी-देवताओं के भजनों से लेकर सत्संग भजनों तक की यात्रा करेंगे।
देवी-देवताओं के भजन: जब हर देवता का अपना राग हो
देवी-देवताओं के भजन सनातन धर्म की सबसे समृद्ध परंपरा है। हर देवता के अपने गुण हैं, अपनी कथाएं हैं, अपनी लीलाएं हैं, और उनके अनुसार ही भजन भी अलग-अलग रस से भरे होते हैं।

भगवान शिव के भजन – रुद्र का रौद्र और सौम्य रूप
भगवान शिव के भजनों में एक अलग ही तरह की शक्ति और समर्पण की भावना होती है। यह भजन दो रूपों में मिलते हैं – एक रौद्र रूप में जहां शिव की महिमा का गुणगान होता है, और दूसरा सौम्य रूप में जहां शिव को आदि योगी के रूप में पूजा जाता है।
प्रसिद्ध शिव भजन:
- “ओम नमः शिवाय” – यह पंचाक्षर मंत्र ही सबसे सरल और गहरा शिव भजन है
- “शिव तांडव स्तोत्रम्” – रावण रचित यह स्तोत्र शिव के तांडव का वर्णन करता है
- “बम बम भोले” – लोकप्रिय शिव भजन जो कांवड़ यात्रा के दौरान विशेष रूप से गाया जाता है
शिव भजन गाते समय एक अलग ही ऊर्जा का अनुभव होता है। यह भजन भक्तों को संसार के मोह-माया से ऊपर उठाकर उस परम सत्य से जोड़ देते हैं।
माता रानी के भजन – शक्ति का स्तवन
माता रानी के भजनों में शक्ति, वात्सल्य और करुणा का अद्भुत संगम होता है। मां के भजनों में भक्त उन्हें संकटमोचिनी के रूप में याद करता है तो कभी ममता की मूरत के रूप में।
प्रसिद्ध माता भजन:
- “जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी” – दुर्गा सप्तशती पर आधारित यह भजन हर घर में गूंजता है
- “शेरों वाली माँ तेरा जलवा निराला” – मां दुर्गा के पराक्रम का वर्णन
- “अम्बे तू है जगदम्बे काली” – मां के विभिन्न रूपों की स्तुति
नवरात्रि के नौ दिनों में माता के भजनों का विशेष महत्व होता है। इन दिनों घरों और मंदिरों में माता के भजनों की धूम रहती है। मां के भजन गाने से भक्तों में आत्मविश्वास और साहस का संचार होता है।
भगवान राम के भजन – मर्यादा और मधुरता
भगवान राम के भजनों में मर्यादा, करुणा और भक्ति का अद्भुत समावेश होता है। राम भजनों में एक अलग ही मिठास होती है जो हृदय को छू लेती है।
प्रसिद्ध राम भजन:
- “श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन” – गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह भजन राम भक्ति का आधार है
- “रघुपति राघव राजा राम” – महात्मा गांधी को प्रिय यह भजन सबको एक सूत्र में बांधता है
- “सियापति रामचंद्र की जय” – सामूहिक भजन के रूप में प्रसिद्ध
राम भजन गाने से मन में शांति और स्थिरता आती है। यह भजन हमें राम के आदर्शों की याद दिलाते हैं और जीवन में मर्यादा का पालन करने की प्रेरणा देते हैं।
भगवान कृष्ण के भजन – प्रेम और रास का सागर
भगवान कृष्ण के भजनों में सबसे अधिक विविधता देखने को मिलती है। बाल कृष्ण के वात्सल्य भाव से लेकर किशोर कृष्ण के श्रृंगार रस तक, हर भाव के लिए अलग भजन हैं।
प्रसिद्ध कृष्ण भजन:
- “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे” – महामंत्र के रूप में प्रसिद्ध
- “श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी” – सूरदास जी द्वारा रचित अमर भजन
- “माखन चोर नंदकिशोर” – बाल कृष्ण की माखन चोरी की लीला का वर्णन
- “राधे राधे बरसाने वाली” – राधा रानी की महिमा
कृष्ण भजन गाते समय हृदय में एक अलग ही उल्लास और आनंद का अनुभव होता है। यह भजन हमें प्रेम का सच्चा अर्थ समझाते हैं।
हनुमान जी के भजन – शक्ति और भक्ति का संगम
हनुमान जी के भजनों में बल, विद्या और भक्ति तीनों का समावेश होता है। हनुमान चालीसा तो हर घर में गूंजती ही है, इसके अलावा भी अनेक भजन हैं।
प्रसिद्ध हनुमान भजन:
- “हनुमान चालीसा” – गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह सबसे प्रसिद्ध हनुमान भजन है
- “बजरंग बाण” – संकट निवारण के लिए विशेष रूप से पढ़ा जाता है
- “संकट मोचन हनुमान” – हनुमान जी को संकट मोचक के रूप में स्मरण
मंगलवार और शनिवार को हनुमान भजनों का विशेष महत्व है। यह भजन गाने से शारीरिक और मानसिक बल मिलता है और सभी संकट दूर होते हैं।
गणेश जी के भजन – विद्या और बुद्धि के दाता
भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणेश भजन गाने की परंपरा है।
प्रसिद्ध गणेश भजन:
- “जय गणेश जय गणेश देवा” – सबसे लोकप्रिय गणेश भजन
- “वक्रतुण्ड महाकाय” – संस्कृत में प्रसिद्ध स्तोत्र
- “गणपति बप्पा मोरया” – सामूहिक उद्घोष के रूप में प्रसिद्ध
गणेश भजन गाने से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है और सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
सुबह के भजन: नए दिन की शुरुआत प्रभु के नाम से
सुबह के भजन का अपना एक अलग ही महत्व है। जब रात का अंधेरा छंटता है और सूर्य की पहली किरण धरती पर आती है, उस समय गाया गया भजन पूरे दिन के लिए सकारात्मक ऊर्जा भर देता है।
प्रभाती भजन – भोर की बेला में
प्रभाती सुबह के समय गाए जाने वाले विशेष भजन होते हैं। यह भजन धीमी और मधुर लय में गाए जाते हैं, जैसे प्रकृति स्वयं जाग रही हो।
प्रसिद्ध प्रभाती भजन:
- “उठो उठो हे माधव, उठो दीन दयाला” – भगवान को जगाने का भाव
- “ब्रज में भोर भयो, गोपियों के संग राधिका जागी” – राधा-कृष्ण के प्रभात का वर्णन
- “जागो बन्सीवाले, जागो मुरलीवाले” – कृष्ण को जगाने का मधुर भजन
सुबह के भजन गाने का सबसे अच्छा समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) होता है। इस समय वातावरण शुद्ध और शांत रहता है, जिससे भजन का प्रभाव और गहरा हो जाता है।
सूर्योदय भजन
सूर्योदय के समय गाए जाने वाले भजनों में सूर्य देव की स्तुति होती है। यह भजन हमें नई ऊर्जा और जीवन शक्ति प्रदान करते हैं।
प्रसिद्ध सूर्य भजन:
- “सूर्य देवता की जय, जगत के नयनों की ज्योति”
- “प्रातः स्मरणीय भास्कर, दिनकर तुम हो जीवनदाता”
सुबह के भजन गाने की आदत डालने से जीवन में अनुशासन आता है और मन दिनभर शांत और एकाग्र बना रहता है।
शाम / संध्या भजन: दिन के अंत में प्रभु का स्मरण
शाम / संध्या भजन का समय वह बेला होता है जब दिन भर की थकान के बाद मन को विश्राम और शांति की आवश्यकता होती है। यह भजन हमें दिन भर की भागदौड़ से निकालकर प्रभु चरणों में ले जाते हैं।
संध्या आरती का समय
शाम के समय होने वाली आरती का विशेष महत्व है। लगभग सभी मंदिरों में शाम को आरती होती है और भजन गाए जाते हैं।
प्रसिद्ध संध्या भजन:
- “आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की” – कृष्ण आरती
- “जय श्री राम आरती, जय श्री राम आरती” – राम आरती
- “ॐ जय जगदीश हरे” – सबसे लोकप्रिय आरती जो शाम के समय हर घर में गूंजती है
दीपदान और भजन
शाम के समय दीप जलाकर भजन गाने की परंपरा बहुत प्राचीन है। जैसे-जैसे अंधेरा बढ़ता है, दीपक की लौ और भजन की मधुरता हृदय में उजाला भर देती है।
प्रसिद्ध शाम के भजन:
- “श्याम सुंदर श्याम सुंदर, श्याम सुंदर नाम तुम्हारा”
- “थक गए हम आए शरण में, अब तो हार के हारे श्याम”
शाम के भजनों में एक अलग ही करुणा और समर्पण का भाव होता है। यह भजन हमें दिनभर की गलतियों और कमियों का अहसास कराते हैं और प्रभु से क्षमा याचना करने की प्रेरणा देते हैं।
त्योहारों के विशेष भजन: उत्सव में रंग भर दे भजन
त्योहारों के विशेष भजन उत्सव के रंग में और चार चांद लगा देते हैं। हर त्योहार का अपना अलग भजन होता है, जो उस पर्व की महिमा और विशेषता को बताता है।

होली के भजन – रंगों का त्योहार, भजनों का उल्लास
होली के भजनों में सबसे अधिक उल्लास और चंचलता होती है। यह भजन राधा-कृष्ण की होली का वर्णन करते हैं और श्रोताओं में उमंग भर देते हैं।
प्रसिद्ध होली भजन:
- “होली खेलें रसिया रंग भर के, संग संग खेलें राधा रसिया”
- “रंग बरसे भीगे चुनर वाली” – आधुनिक होली भजन
- “आज बिरज में होली रे रसिया” – पारंपरिक ब्रज की होली
होली के भजन गाते समय लोग झूम उठते हैं, नाच उठते हैं। यह भजन सामाजिक मेल-जोल और प्रेम को बढ़ाते हैं।
जन्माष्टमी के भजन – कृष्ण जन्म का उत्सव
जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष भजन गाए जाते हैं जो कृष्ण के जन्म की कथा और महिमा का वर्णन करते हैं।
प्रसिद्ध जन्माष्टमी भजन:
- “छोटे छोटे ग्वाल बाल, हाथ में लड्डू लाल”
- “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की”
- “माखन चोरी नंद किशोर की, करतब निराले”
दीपावली के भजन – रोशनी का पर्व
दीपावली पर लक्ष्मी जी और गणेश जी के विशेष भजन गाए जाते हैं। यह भजन समृद्धि और सौभाग्य की कामना करते हैं।
प्रसिद्ध दीपावली भजन:
- “जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता”
- “लक्ष्मी आएं घर आएं, सुख-समृद्धि लाएं”
- “दीप जले शुभ रात आई, लक्ष्मी जी के द्वार सजाई”
नवरात्रि के भजन – शक्ति की आराधना
नवरात्रि के नौ दिनों में माता के भजनों का विशेष महत्व है। हर दिन माता के एक अलग रूप की पूजा होती है और उनके अनुसार भजन गाए जाते हैं।
प्रसिद्ध नवरात्रि भजन:
- “जय आद्याशक्ति जय आद्याशक्ति, जय आद्याशक्ति माँ”
- “शेरों वाली माँ का, दरबार सजा है”
- “दुर्गा माँ के भजन से, हर संकट टल जाए”
शिवरात्रि के भजन – भोले का जागरण
शिवरात्रि के दिन भक्त रातभर जागरण करते हैं और शिव भजन गाते हैं। यह रात भोले भंडारी की भक्ति में बीतती है।
प्रसिद्ध शिवरात्रि भजन:
- “बम बम बम बम भोले, बम बम बम बम भोले”
- “जटा टवी गलज्जल प्रवाह” – शिव तांडव स्तोत्र
- “ओम नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय”
सत्संग भजन: सामूहिक भक्ति का आनंद
सत्संग भजन समूह में गाए जाने वाले भजन होते हैं। यह भजन विशेष रूप से इस तरह से रचे गए हैं कि इन्हें समूह में गाना सरल और आनंददायक हो।
मुखड़े और टेक वाले भजन
सत्संग भजनों में अक्सर एक मुखड़ा (मुख्य पंक्ति) होती है जिसे मुख्य गायक गाता है, और एक टेक होती है जिसे पूरा समूह दोहराता है।
प्रसिद्ध सत्संग भजन:
- “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे”
- “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे”
- “रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम”
भजन कीर्तन शैली
सत्संग में अक्सर भजन-कीर्तन की शैली अपनाई जाती है जहां भजन के साथ-साथ वाद्य यंत्रों की धूम होती है और लोग झूम-झूमकर भक्ति में लीन हो जाते हैं।
सत्संग भजन की विशेषताएं:
- सरल शब्द: सत्संग भजनों के शब्द सरल और दोहराए जाने वाले होते हैं
- उत्साहपूर्ण लय: इन भजनों की लय ऐसी होती है कि लोग झूम उठें
- सामूहिक भागीदारी: हर कोई गा सकता है, चाहे उसे संगीत का ज्ञान हो या न हो
प्रसिद्ध सत्संग भजन:
- “वैष्णव जन तो तेने कहिये, जो पीर पराई जाने रे” – नरसी मेहता द्वारा रचित यह भजन सत्संग में विशेष रूप से गाया जाता है
- “एक बार कहो प्रभु का नाम, मिट जाएगा हर काम का काम”
- “निताई-गौरांगर, निताई-गौरांगर” – चैतन्य महाप्रभु की परंपरा में प्रसिद्ध
निष्कर्ष – भजन के प्रकार उतने ही विविध हैं जितने कि भक्तों के भाव। कोई भजन सुबह की शांति में गूंजता है तो कोई शाम की आरती में। कोई होली के रंग में रंग जाता है तो कोई नवरात्रि की रातों में जागरण कराता है। कोई शिव के रौद्र रूप का वर्णन करता है तो कोई कृष्ण की मुरली की मिठास बिखेरता है।
लेकिन इन सभी भजनों का एक ही लक्ष्य है – हमें उस परमात्मा से जोड़ना, हमारे मन को शांति देना और हमारे जीवन में भक्ति का रस भरना। चाहे आप किसी भी प्रकार का भजन गाएं, याद रखें – असली चीज है आपका भाव, आपका समर्पण और आपका प्रेम।
तो आइए, हर समय, हर अवसर पर प्रभु के नाम का स्मरण करें। सुबह उठकर प्रभाती गाएं, शाम को आरती करें, त्योहारों पर विशेष भजनों से उत्सव मनाएं, और सत्संग में जुड़कर सामूहिक भक्ति के आनंद का अनुभव करें।
कभी राम बन जाता है, कभी श्याम बन जाता है।
भक्त के हृदय में बसने वाला, भजन ही भगवान बन जाता है।।
6. घर में भजन करने के लाभ: जहां भजन वहां भगवान
घर सिर्फ ईंट-पत्थर का बना आशियाना नहीं, यह तो हमारी आस्था, हमारे संस्कार और हमारे प्यार का मंदिर है। जिस तरह मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, उसी तरह घर में नियमित भजन करने से उस घर की हर ईंट में चेतना जाग जाती है।
घर में भजन करने के लाभ केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक भी हैं। यह परंपरा हमारे पूर्वजों ने सदियों पहले शुरू की थी और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों हर घर में भजन की गूंज होनी चाहिए।

परिवार में शांति और सकारात्मकता: जब घर बन जाए स्वर्ग
परिवार में शांति और सकारात्मकता हर व्यक्ति की चाहत होती है, लेकिन आज के भागदौड़ भरे जीवन में यह दुर्लभ हो गई है। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मनमुटाव, तनाव – यह सब परिवार की सुख-शांति को भंग कर देते हैं। ऐसे में भजन एक वरदान से कम नहीं है।
नकारात्मक ऊर्जा का नाश
हमारे घरों में कई बार अदृश्य रूप से नकारात्मक ऊर्जा का वास हो जाता है। यह ऊर्जा किसी बाहरी स्रोत से नहीं, बल्कि हमारे आपसी कलह, तनाव और चिंता से पैदा होती है। भजन की ध्वनि तरंगें इस नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती हैं।
जब हम घर में मधुर भजन गाते हैं, तो उसकी ध्वनि हर कमरे में, हर कोने में गूंजती है। यह ध्वनि वातावरण में मौजूद नकारात्मक कंपन को सकारात्मक में बदल देती है। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान का सिद्धांत है। सकारात्मक ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध करती हैं।
तनाव में कमी और मानसिक शांति
जब परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भजन करते हैं, तो उस समय सबके मन दिनभर की चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं। भजन की लय और ताल मस्तिष्क में सकारात्मक रासायनिक परिवर्तन लाती है।
- कोर्टिसोल हार्मोन कम होता है: यह तनाव का मुख्य कारण है। भजन से यह हार्मोन कम होता है।
- एंडोर्फिन बढ़ता है: यह खुशी का हार्मोन है। भजन गाने से यह बढ़ता है और पूरा परिवार प्रसन्न रहता है।
- रक्तचाप सामान्य रहता है: नियमित भजन से उच्च रक्तचाप की समस्या में लाभ होता है।
आपसी मनमुटाव का अंत
घर में नियमित भजन करने से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द बढ़ता है। जब सास-बहू, पति-पत्नी, भाई-बहन एक साथ बैठकर भगवान का नाम लेते हैं, तो उनके मन की कड़वाहट अपने आप दूर हो जाती है।
भजन के दौरान सब एक समान होते हैं – कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं। सब भगवान के सामने समान हैं। यह भाव परिवार में समानता और एकता की भावना पैदा करता है। जो लोग एक साथ भजन करते हैं, उनके बीच झगड़े की संभावना बहुत कम हो जाती है।
घर की सुरक्षा कवच
शास्त्रों में कहा गया है कि जिस घर में नियमित भजन-कीर्तन होता है, वहां यमदूत भी प्रवेश नहीं कर सकते। भजन की ध्वनि चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना देती है। यह कवच किसी भी प्रकार की बाहरी नकारात्मक शक्तियों को घर में प्रवेश नहीं करने देता।
बच्चों में धार्मिक संस्कार: अगली पीढ़ी को जोड़ना जड़ों से
आज के डिजिटल युग में बच्चे मोबाइल, टैबलेट और वीडियो गेम्स में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनका अपनी संस्कृति और परंपराओं से संपर्क लगभग टूट गया है। ऐसे में बच्चों में धार्मिक संस्कार डालने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है – घर में सामूहिक भजन।
संस्कारों की नींव
बचपन में डाले गए संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। जैसे मिट्टी के बर्तन को जब आकार दिया जाता है, वैसे ही बच्चों के मन को आकार देना होता है। घर में होने वाले भजन बच्चों के मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं।
जब बच्चे माता-पिता, दादा-दादी के साथ बैठकर भजन गाते हैं, तो उनके मन में अपने आप धर्म के प्रति श्रद्धा पैदा होती है। उन्हें पता चलता है कि जीवन में केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि कुछ और भी है – एक आध्यात्मिक आयाम।
धार्मिक ज्ञान का सरल माध्यम
बच्चों को धार्मिक ग्रंथ पढ़ने के लिए बैठाना कठिन हो सकता है, लेकिन भजनों के माध्यम से वे आसानी से धार्मिक कथाओं और सिद्धांतों से परिचित हो जाते हैं।
- राम भजनों से वे रामायण की कथाएं जानते हैं
- कृष्ण भजनों से वे कृष्ण की लीलाओं से परिचित होते हैं
- हनुमान चालीसा से उन्हें हनुमान जी के पराक्रम का पता चलता है
यह सब ज्ञान बिना किसी दबाव के, आनंद के साथ उनके मन में बसता जाता है।
संगीत और कला का विकास
भजन केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि संगीत की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध हैं। जो बच्चे बचपन से भजन गाते हैं, उनमें संगीत के प्रति रुचि स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।
- उनकी आवाज में मिठास आती है
- उनका उच्चारण स्पष्ट होता है
- उनमें लय और ताल की समझ विकसित होती है
- वे वाद्य यंत्र बजाना सीखते हैं (हारमोनियम, ढोलक, करताल)
नैतिक मूल्यों का विकास
भजनों के शब्दों में गहरे नैतिक मूल्य छिपे होते हैं। जैसे तुलसीदास जी का प्रसिद्ध भजन “रघुपति राघव राजा राम” में कहा गया है – “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सन्मति दे भगवान”। यह बच्चों को धार्मिक सहिष्णुता और सबके प्रति सम्मान का पाठ पढ़ाता है।
भजन “वैष्णव जन तो तेने कहिये, जो पीर पराई जाने रे” बच्चों को दया और करुणा का पाठ पढ़ाता है। ये मूल्य उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाते हैं।
तकनीकी आदतों से बचाव
आज के बच्चे घंटों मोबाइल और टीवी पर बिताते हैं, जिससे उनकी आंखें कमजोर हो रही हैं और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। भजन की आदत उन्हें इस डिजिटल लत से बचाती है।
जब परिवार में भजन का समय निर्धारित होता है, तो उस समय बच्चे स्क्रीन से दूर रहते हैं। वे वास्तविक दुनिया में, वास्तविक लोगों के साथ समय बिताते हैं। यह उनके सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
घर में आध्यात्मिक वातावरण: जब हर श्वास बन जाए भजन
घर में आध्यात्मिक वातावरण का मतलब यह नहीं कि घर मंदिर में बदल जाए। इसका मतलब है कि घर की हर वस्तु में, हर कोने में एक पवित्रता और सकारात्मकता का वास हो। और यह संभव है केवल नियमित भजन से।
ऊर्जा का संचार
हर घर की अपनी एक ऊर्जा होती है। कुछ घरों में जाते ही मन प्रसन्न हो जाता है, तो कुछ घरों में बेचैनी होने लगती है। यह अंतर वहां के वातावरण की ऊर्जा के कारण होता है। भजन इस ऊर्जा को शुद्ध और सकारात्मक बनाते हैं।
जब घर में नियमित भजन होता है, तो वहां की हर वस्तु में सकारात्मक कंपन भर जाते हैं। पानी सकारात्मक हो जाता है, हवा शुद्ध हो जाती है, और खाना प्रसाद बन जाता है।
दैनिक जीवन में धर्म का समावेश
बहुत से लोग धर्म को केवल मंदिर या त्योहारों तक सीमित रखते हैं। लेकिन भजन की परंपरा धर्म को दैनिक जीवन का हिस्सा बना देती है।
सुबह उठते ही भजन – दिन की शुरुआत प्रभु के नाम से
शाम को आरती और भजन – दिन के अंत में प्रभु का स्मरण
रात में सोते समय भजन – दिन का समापन प्रभु चरणों में
इस तरह भजन जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है। यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका बन जाता है।
परिवार की एकता और पहचान
जिस घर में नियमित भजन होता है, वह परिवार एक विशेष पहचान बना लेता है। वहां आने वाले मेहमान उस शांति और सकारात्मकता को महसूस करते हैं जो अन्यत्र दुर्लभ है।
भजन परिवार को एक सूत्र में बांधता है। जब सभी सदस्य एक साथ बैठते हैं, तो वह समय केवल भजन का नहीं, बल्कि पारिवारिक मेल-जोल और प्रेम का भी होता है। इस समय में परिवार के सदस्य एक-दूसरे के करीब आते हैं, अपनी खुशियाँ और चिंताएं साझा करते हैं, और एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।
आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग
घर में नियमित भजन करने से व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति अपने आप होने लगती है। उसे अलग से ध्यान या साधना के लिए समय निकालने की आवश्यकता नहीं होती। भजन ही उसका ध्यान बन जाता है, भजन ही उसकी साधना।
जैसे-जैसे व्यक्ति भजन में गहराई से उतरता है, उसके मन के विकार – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार – धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। उसका मन निर्मल होता है और वह ईश्वर के और करीब पहुंचता है।
भौतिक सुख से परे संतोष
भौतिक वस्तुएं अस्थायी सुख देती हैं, लेकिन संतोष नहीं दे पातीं। भजन से मिलने वाला आनंद शाश्वत और अटूट होता है। यह आनंद किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं करता, बल्कि हमारे अपने हृदय से निकलता है।
जिस घर में भजन होता है, वहां के लोगों में एक अलग ही संतोष और शांति दिखती है। वे भौतिक सुख-सुविधाओं की कमी में भी खुश रहते हैं, क्योंकि उनका सुख बाहरी नहीं, आंतरिक होता है।
घर में भजन शुरू करने के सरल उपाय
यदि आपने अब तक घर में भजन की परंपरा नहीं अपनाई है, तो चिंता न करें। इसे शुरू करना बहुत सरल है:
- छोटी शुरुआत करें – शुरुआत में सप्ताह में एक दिन, जैसे रविवार की शाम, पूरे परिवार के साथ बैठकर भजन करें। धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर दैनिक कर सकते हैं।
- बच्चों को शामिल करें – बच्चों को करताल, झांझ या छोटे मंजीरे दें। वे इन्हें बजाकर भजन में भाग ले सकते हैं। इससे उनकी रुचि बनी रहेगी।
- नियमित समय निर्धारित करें – हर दिन एक निश्चित समय (जैसे शाम 7-8 बजे) भजन के लिए निर्धारित करें। नियमितता से आदत जल्दी बनती है।
- वातावरण बनाएं – भजन स्थल पर दीपक जलाएं, फूल चढ़ाएं और भगवान का चित्र रखें। इससे वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
- सरल भजन चुनें – शुरुआत में सरल और प्रसिद्ध भजन चुनें, जैसे:
- “ॐ जय जगदीश हरे”
- “हरे कृष्ण हरे राम”
- “रघुपति राघव राजा राम”
निष्कर्ष : घर में भजन करने के लाभ केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि पारिवारिक, मानसिक और शारीरिक भी हैं। यह परंपरा हमारे पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है, जिसे हमें संजोकर रखना और आगे बढ़ाना चाहिए।
भजन से घर में परिवार में शांति और सकारात्मकता आती है। इससे बच्चों में धार्मिक संस्कार पुष्ट होते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण, इससे घर में आध्यात्मिक वातावरण बनता है, जहां हर श्वास में प्रभु का नाम बसता है।
तो आइए, आज ही संकल्प लें कि हम अपने घर में नियमित भजन की परंपरा शुरू करेंगे। एक छोटी सी शुरुआत, एक मधुर भजन, और देखिए कैसे आपका घर धीरे-धीरे स्वर्ग बन जाता है।
जहां भजन होता है, वहां भगवान का वास होता है।
जहां भगवान का वास होता है, वहां किसी बात की कमी नहीं होती।।
7. भजन से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQ)
1. भजन कब गाना चाहिए?
भजन किसी भी समय गाया जा सकता है, लेकिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) का समय सबसे उत्तम माना गया है। इस समय वातावरण शुद्ध और शांत रहता है, जिससे मन आसानी से एकाग्र होता है। शाम के समय सूर्यास्त के बाद भजन करना भी विशेष लाभकारी होता है। हालांकि, सच्चे मन से कभी भी गाया गया भजन प्रभु तक अवश्य पहुंचता है।
2. क्या रोज भजन गाना जरूरी है?
रोज भजन गाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन अत्यंत लाभकारी है। नियमित भजन से मन की शांति बनी रहती है, घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और ईश्वर से निरंतर जुड़ाव बना रहता है। जैसे शरीर को रोज भोजन चाहिए, वैसे ही आत्मा को रोज भजन रूपी भोजन की आवश्यकता होती है। यदि रोज संभव न हो तो सप्ताह में नियमित दिन निर्धारित करें।
3. क्या अकेले भजन गा सकते हैं?
बिल्कुल गा सकते हैं। अकेले भजन गाने का अपना अलग आनंद है। जब आप अकेले भजन गाते हैं, तो आपका सीधा संवाद प्रभु से होता है। यह एकांत साधना का रूप है, जहां आप बिना किसी संकोच के प्रभु में लीन हो सकते हैं। मीरा ने भी अकेले ही कृष्ण के भजन गाए थे। अकेले भजन से मन की एकाग्रता बढ़ती है और आत्मिक शांति मिलती है।
4. भजन और आरती में क्या अंतर है?
भजन और आरती में मुख्य अंतर उनके स्वरूप और समय का है।
| भजन | आरती |
|---|---|
| कभी भी गाया जा सकता है | निश्चित समय पर की जाती है (सुबह-शाम) |
| भाव प्रधान होता है | क्रिया प्रधान होती है |
| केवल गाया जाता है | गाई जाती है और दीपक घुमाया जाता है |
| कोई भी भक्त गा सकता है | प्रायः पुजारी या परिवार के मुखिया द्वारा की जाती है |
| लंबा चल सकता है | कुछ मिनटों की होती है |
आरती भजन का ही एक विशेष रूप है, जो देवता की उपासना का अंग है।
5. क्या बिना सुर-ताल के भी भजन गा सकते हैं?
हां, बिना सुर-ताल के भी भजन गाया जा सकता है। भजन में सुर से अधिक महत्वपूर्ण है भाव। यदि आपके हृदय में प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम है, तो आपकी सरल धुन भी परमात्मा तक पहुंच जाती है। कबीर ने कहा है – “चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय। दुई दान के बीच में, साबत बचना कोय।” भावना ही मुख्य है, सुर-ताल गौण।
6. भजन सुनने से भी लाभ मिलता है?
अवश्य मिलता है। भजन सुनना भी भक्ति का ही एक रूप है। नवधा भक्ति में श्रवण (सुनना) को पहला स्थान दिया गया है। जब आप सच्चे मन से भजन सुनते हैं, तो उसके शब्द और धुन आपके मन में उतर जाते हैं। इससे मन को शांति मिलती है और धीरे-धीरे आप भी गुनगुनाने लगते हैं। रेडियो, यूट्यूब या किसी भी माध्यम से भजन सुनना लाभकारी है।
7. क्या भजन गाते समय कोई नियम हैं?
भजन गाते समय कुछ सरल नियमों का पालन लाभकारी होता है:
- स्वच्छ वस्त्र पहनें
- मन को शांत और एकाग्र करें
- मोबाइल फोन आदि से दूर रहें
- भजन के शब्दों का स्पष्ट उच्चारण करें
- भाव में बहें, प्रदर्शन न करें
- बीच में अनावश्यक बातचीत न करें
ये नियम बंधन नहीं, सहायक मार्गदर्शन हैं।
8. क्या महिलाएं भजन गा सकती हैं?
बिल्कुल गा सकती हैं। सनातन धर्म में महिलाओं ने भजन-कीर्तन की परंपरा को सर्वोच्च स्थान दिलाया है। मीरा, गंगासती, बहिणाबाई जैसी अनेक महिला संतों ने भजनों के माध्यम से भक्ति की अलख जगाई। आज भी मंदिरों और सत्संगों में महिलाएं बढ़-चढ़कर भजन गाती हैं। भक्ति में स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं।
9. बच्चों को भजन कैसे सिखाएं?
बच्चों को भजन सिखाने के सरल तरीके:
- खुद भजन गाकर उनके सामने उदाहरण पेश करें
- सरल और छोटे भजनों से शुरुआत करें
- बच्चों को करताल, मंजीरा आदि बजाने दें
- उन्हें मजबूर न करें, रुचि पैदा करें
- पुरस्कार और प्रोत्साहन दें
- परिवार में सामूहिक भजन का माहौल बनाएं
बचपन में सीखे गए भजन जीवनभर साथ रहते हैं और उनमें धार्मिक संस्कार पुष्ट करते हैं।
10. क्या रात में भजन गाना चाहिए?
रात में भजन गाना उचित है, विशेषकर शयन से पूर्व। रात के समय गाए जाने वाले भजन मन को शांत करते हैं और गहरी नींद लाने में सहायक होते हैं। शिवरात्रि जैसे अवसरों पर तो रातभर भजन-कीर्तन (जागरण) की परंपरा है। हां, रात में बहुत तेज आवाज में भजन न करें कि पड़ोसियों को परेशानी हो।
11. भजन और मंत्र में क्या अंतर है?
भजन और मंत्र में मुख्य अंतर:
| भजन | मंत्र |
|---|---|
| भाव और प्रेम प्रधान | शब्द और ध्वनि प्रधान |
| सरल भाषा में होता है | संस्कृत में होते हैं |
| कोई भी गा सकता है | उचित उच्चारण आवश्यक |
| मनोरंजन और भक्ति दोनों | केवल साधना के लिए |
| लय और ताल हो सकती है | विशिष्ट छंद में होते हैं |
मंत्रों का जाप और भजन गाना – दोनों ही भक्ति के सशक्त माध्यम हैं।
12. क्या अन्य धर्मों के लोग भी हिंदी भजन गा सकते हैं?
बिल्कुल गा सकते हैं। भक्ति की कोई सीमा नहीं होती। भजन सार्वभौमिक प्रेम और ईश्वर-भक्ति का माध्यम है। कबीर, रैदास, नानक जैसे संतों ने सभी धर्मों को एक सूत्र में बांधा है। आज भी अनेक मुस्लिम और ईसाई कलाकार हिंदी भजन गाते हैं और श्रोताओं का दिल जीतते हैं। ईश्वर एक है, उसके नाम अनेक।
13. भजन का वैज्ञानिक महत्व क्या है?
भजन का गहरा वैज्ञानिक महत्व है:
- ध्वनि चिकित्सा: भजन की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करती हैं
- हार्मोन संतुलन: तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) कम होता है, खुशी के हार्मोन (एंडोर्फिन) बढ़ते हैं
- रक्तचाप नियंत्रण: नियमित भजन से उच्च रक्तचाप में लाभ
- प्रतिरक्षा प्रणाली: सकारात्मक ध्वनि कंपन से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है
- मस्तिष्क तरंगें: अल्फा तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो ध्यान की अवस्था है
भजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है।
14. सबसे प्रसिद्ध भजन कौन से हैं?
कुछ अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय भजन:
- “ॐ जय जगदीश हरे” – आरती के रूप में प्रसिद्ध
- “हरे कृष्ण हरे राम” – महामंत्र भजन
- “रघुपति राघव राजा राम” – महात्मा गांधी को प्रिय
- “श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन” – तुलसीदास रचित
- “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” – मीरा का भजन
- “वैष्णव जन तो तेने कहिये” – नरसी मेहता रचित
- “हनुमान चालीसा” – सबसे प्रसिद्ध हनुमान भजन
- “जय अम्बे गौरी” – माता का प्रसिद्ध भजन
15. क्या भजन का कोई निश्चित समय या मापदंड है?
भजन का कोई निश्चित समय या कठोर मापदंड नहीं है। भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और लचीलापन है। इसे कभी भी, कहीं भी, कैसे भी गाया जा सकता है। एकमात्र मापदंड है – सच्चा भाव और हृदय से समर्पण। बाकी सब गौण है। भले ही आपको सुर न आते हों, ताल न आती हो, लेकिन अगर आपके हृदय में प्रभु के प्रति प्रेम है, तो आपका भजन सर्वश्रेष्ठ है।
8. निष्कर्ष: भजन ही जीवन है, जीवन ही भजन है
भजन केवल गीत नहीं, यह तो आत्मा की वह प्यास है जो परमात्मा की ओर खिंची चली जाती है। इस लेख में हमने भजन की उत्पत्ति से लेकर उसके प्रकारों तक, उसकी विधि से लेकर उसके लाभों तक की पूरी यात्रा देखी। यह यात्रा हमें बताती है कि भजन सिर्फ मंदिरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के हर पल, हर श्वास में बसता है।
आज जब पूरा विश्व तनाव, अवसाद और चिंता से जूझ रहा है, ऐसे में भजन एक वरदान से कम नहीं है। यह एक ऐसी ध्वनि चिकित्सा है जो बिना किसी खर्च के, बिना किसी दुष्प्रभाव के हमें मानसिक शांति प्रदान करती है। यह एक ऐसा योग है जो हमें हमारे भीतर की गहराइयों से जोड़ता है।
तो आइए, हम संकल्प करें कि हम अपने जीवन में भजन को स्थान देंगे। चाहे सुबह उठकर पांच मिनट ही सही, कोई एक भजन गुनगुनाएं। चाहे शाम को परिवार के साथ बैठकर कोई एक आरती गाएं। छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव ला सकती है।
याद रखें, भगवान को हमारी आवाज की नहीं, हमारे भाव की जरूरत है। वह सिर्फ हमारे प्रेम के भूखे हैं। और भजन से बढ़कर प्रेम व्यक्त करने का और क्या माध्यम हो सकता है?
भजन सीखने की विधि नहीं, इसे तो बस हृदय से महसूस करना होता है।
सुर न मिले न ताल मिले, फिर भी जब प्रभु से प्रीत हो, हर शब्द भजन बन जाता है।।
भजन करो, भजन सुनो, भजन में रमो।
यही जीवन है, यही सनातन धर्म है।।
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अस्वीकरण (Disclaimer) :- यह लेख केवल सूचनात्मक और धार्मिक जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न शास्त्रों, संतों के प्रवचनों और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी आध्यात्मिक साधना को अपनाने से पहले कृपया अपने गुरु या विशेषज्ञ से परामर्श लें। लेखक या ब्लॉग इस जानकारी के उपयोग से होने वाली किसी भी हानि के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।
हरि: ॐ तत्सत्! 🙏
प्रिय पाठकों, यह लेख आपके लिए हृदय की गहराइयों से लिखा गया है। यदि इसमें से एक भी भजन आपके जीवन को छू पाया, एक भी बात आपके मन में उतर पाई, तो हमारी लेखनी सफल हुई। कृपया इस ज्ञान को केवल पढ़कर न छोड़ें, इसे जीवन में उतारें। भजन की इस अमृत धारा से स्वयं को सींचें और अपने परिवार को भी सींचें।
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जय श्री कृष्ण! जय श्री राम! हर हर महादेव! जय माता दी! 🌸🙏