देवी राधिका आरती – सार (भावार्थ)
देवी राधिका आरती श्रीवृषभानुनंदिनी राधा रानी के उस दिव्य, प्रेममय और आनंदस्वरूप तत्व की स्तुति है, जिसमें भक्ति, रस, करुणा और आध्यात्मिक चेतना एक साथ प्रकट होती है। यह आरती राधा रानी को सत्-चित्-आनन्द की मूल कली मानते हुए, उन्हें संपूर्ण सृष्टि के आनंद और मंगल का स्रोत बताती है।
आरती में सबसे पहले राधा रानी को भय का नाश करने वाली और भवसागर से पार लगाने वाली शक्ति के रूप में नमन किया गया है। वे पाप, ताप, कलियुग के दोष और मन की अशुद्धियों को हरने वाली हैं। उनका दिव्य धाम गोलोक है, जहाँ वे श्रीकृष्ण के साथ नित्य विहार करती हैं। इसी कारण वे केवल भक्तों की पालक ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जगत की जननी हैं।
आगे आरती में राधा रानी को अखिल विश्व को आनंद देने वाली और सर्वमंगलदायिनी कहा गया है। उनकी कृपा से जीवन में शुभता, सौभाग्य और आध्यात्मिक उल्लास का संचार होता है। वे भक्तों को नन्दनन्दन श्रीकृष्ण के चरणों का प्रेम प्रदान करती हैं, जो भक्ति मार्ग का सर्वोच्च लक्ष्य है। राधा रानी का प्रेम अमृतमय रस की तरह है, जो साधक के हृदय को रंग देता है और उसे संसार से ऊपर उठा देता है।
आरती में राधा रानी को नित्यानन्दमयी आह्लादिनी शक्ति कहा गया है—अर्थात वे श्रीकृष्ण की वह शक्ति हैं जो उन्हें भी आनंद प्रदान करती हैं। वे स्वयं आनंद से परिपूर्ण हैं और दूसरों को भी आनंद से सजाने वाली हैं। उनका स्वरूप पूर्णतः रसमय है, जो भक्त के मन को दिव्य प्रेम में उन्मत्त कर देता है। कमलिनी की तरह कोमल, वे श्रीकृष्ण रूपी भ्रमर को आकृष्ट करने वाली हैं।
अंतिम भाग में राधा रानी को नित्य निकुंजों की अधीश्वरी, राजेश्वरी और परम प्रेमस्वरूपा कहा गया है। वे गोपियों की शरण हैं और गोपिजन की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके भाव अत्यंत निर्मल, विचित्र और दिव्य हैं, जिनमें अहंकार का लेश भी नहीं। यही भाव भक्त को शुद्ध प्रेम और निष्काम भक्ति की ओर ले जाता है।
सार रूप में
देवी राधिका की यह आरती प्रेम, आनंद और शुद्ध भक्ति का सार प्रस्तुत करती है। यह बताती है कि राधा रानी केवल श्रीकृष्ण की प्रिया नहीं, बल्कि सत्-चित्-आनन्द की सजीव मूर्ति और सम्पूर्ण सृष्टि के आनंद की जननी हैं। इस आरती का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से हृदय में प्रेम-रस का उदय होता है और साधक को राधा-कृष्ण भक्ति का परम सुख प्राप्त होता है।
जय श्री राधे! 🌸🙏
देवी राधिका आरती – Devi Radhika Aarti
आरति श्रीवृषभानुलली की। सत-चित-आनन्द कन्द-कली की॥
भयभन्जिनि भव-सागर-तारिणि, पाप-ताप-कलि-कल्मष-हारिणि,
दिव्यधाम गोलोक-विहारिणि, जनपालिनि जगजननि भली की॥
आरति श्रीवृषभानुलली की।
सत-चित-आनन्द कन्द-कली की॥
अखिल विश्व-आनन्द-विधायिनि, मंगलमयी सुमंगलदायिनि,
नन्दनन्दन-पदप्रेम प्रदायिनि, अमिय-राग-रस रंग-रली की॥
आरति श्रीवृषभानुलली की।
सत-चित-आनन्द कन्द-कली की॥
नित्यानन्दमयी आह्लादिनि, आनन्दघन-आनन्द-प्रसाधिनि,
रसमयि, रसमय-मन-उन्मादिनि, सरस कमलिनी कृष्ण-अली की॥
आरति श्रीवृषभानुलली की।
सत-चित-आनन्द कन्द-कली की॥
नित्य निकुन्जेश्वरि राजेश्वरि, परम प्रेमरूपा परमेश्वरि,
गोपिगणाश्रयि गोपिजनेश्वरि, विमल विचित्र भाव-अवली की॥
आरति श्रीवृषभानुलली की।
सत-चित-आनन्द कन्द-कली की॥
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