परिचय
होली भारत का वह पावन पर्व है जिसकी प्रतीक्षा हर आयु वर्ग के लोग बेसब्री से करते हैं। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की अमूल्य धरोहर है। जब चारों ओर बसंत की बहार छा जाती है, खेतों में सरसों के पीले फूल खिल उठते हैं और प्रकृति अपने शृंगार में सज जाती है, तब यह रंगीन पर्व धरती पर आनंद की बयार बहा देता है।
होली सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है। यह प्रेम, सौहार्द, भाईचारे और सामाजिक समरसता का संदेश देने वाला महापर्व है। यह वह अवसर है जब समाज की सारी बंधन टूट जाते हैं, मन-मुटाव समाप्त हो जाते हैं और लोग एक-दूसरे से गले मिलकर अपने स्नेह को नवीनीकृत करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से होली बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की अटूट भक्ति और होलिका के दहन की कथा हर भारतीय के हृदय में आस्था का संचार करती है। वहीं, राधा-कृष्ण के प्रेम से जुड़ी यह परंपरा हमें प्रेम की सर्वोच्चता का बोध कराती है।
होली क्या है?
होली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जिसे पूरे भारत और विश्व के विभिन्न भागों में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार अपने रंगों, मस्ती, उमंग और पारंपरिक व्यंजनों के लिए विख्यात है।
होली वास्तव में दो भागों में विभाजित है:
पहला भाग है होलिका दहन – जो फाल्गुन पूर्णिमा की रात को किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन लकड़ियों और उपलों का अलाव जलाया जाता है और नई फसल को अग्नि में भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
दूसरा भाग है रंगवाली होली या धुलेंडी – जो अगले दिन मनाई जाती है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर रंग-गुलाल डालते हैं, पिचकारी से रंगीन पानी उड़ेलते हैं और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते हैं।
होली केवल एक दिन का उत्सव नहीं है। यह कई दिनों तक चलने वाला महापर्व है। ब्रज में तो होली का उत्साह बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है और चालीस दिनों तक चलता है। इस दौरान मथुरा, वृंदावन, बरसाना और नंदगाँव में होली की अलग-अलग झाँकियाँ देखने को मिलती हैं।
कब मनाई जाती है? (फाल्गुन मास, पूर्णिमा)
होली का पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह तिथि विशेष महत्व रखती है और इसका सीधा संबंध प्रकृति के चक्र से है।
फाल्गुन मास वसंत ऋतु का अंतिम महीना होता है। इस समय प्रकृति पूरी तरह खिल जाती है। पेड़ों पर नए पत्ते आ जाते हैं, बगीचों में फूल खिल उठते हैं और चारों ओर हरियाली छा जाती है। यही कारण है कि होली को वसंतोत्सव भी कहा जाता है।
पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस दिन चंद्रमा अपनी पूरी आभा में होता है और रात्रि अत्यंत सुंदर होती है। पूर्णिमा को आध्यात्मिक ऊर्जा का दिन माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष फल प्राप्त होता है।
ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार होली प्रायः मार्च माह में आती है। कभी-कभी फरवरी के अंत में भी यह त्योहार मनाया जाता है। इसकी तिथि प्रतिवर्ष बदलती रहती है क्योंकि हिंदू कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित है।
होलिका दहन का शुभ मुहूर्त विशेष महत्व रखता है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि के प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) में होलिका दहन किया जाता है। इस समय भद्रा का साया समाप्त हो चुका होता है, जो पूजन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
होली कब है 2026 : होलिका दहन एवं रंगवाली होली की पूरी तिथि एवं मुहूर्त
- होलिका दहन एवं रंगवाली होली की तिथि – होली का पावन पर्व प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह उत्सव मार्च माह में आयोजित होगा। होलिका दहन मंगलवार, मार्च 3, 2026 को किया जाएगा, जबकि रंगवाली होली अगले दिन बुधवार, मार्च 4, 2026 को मनाई जाएगी।
- होलिका दहन का शुभ मुहूर्त – होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व है। शास्त्रों में निर्धारित है कि होलिका दहन सदैव प्रदोष काल में किया जाना चाहिए। वर्ष 2026 में होलिका दहन का सर्वोत्तम समय शाम 06:20 बजे से 08:45 बजे तक रहेगा। इस प्रकार कुल 02 घण्टे 25 मिनट की अवधि में आप पूजन एवं दहन की क्रिया सम्पन्न कर सकते हैं।
- भद्रा का समय – होलिका दहन से पूर्व भद्रा के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य वर्जित माना गया है। वर्ष 2026 में भद्रा पूँछ का समय रात्रि 01:25 बजे से 02:35 बजे तक रहेगा। तत्पश्चात भद्रा मुख का समय 02:35 बजे से 04:30 बजे तक रहेगा। चूँकि होलिका दहन का मुहूर्त शाम 06:20 बजे से ही प्रारंभ हो रहा है, अतः भद्रा का साया इस समय पूरी तरह समाप्त हो चुका होगा।
- पूर्णिमा तिथि का विवरण – पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ मार्च 2, 2026 को शाम 05:55 बजे होगा। इस तिथि का समापन अगले दिन मार्च 3, 2026 को शाम 05:07 बजे पर होगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि होलिका दहन उदय व्यापिनी पूर्णिमा के बिना ही प्रदोष काल में किया जाएगा, जो पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
- पूजन हेतु आवश्यक निर्देश – होलिका दहन से पूर्व होलिका पूजन का विधान है। इसके लिए उपरोक्त मुहूर्त का पालन करते हुए संध्या काल में ही पूजन क्रिया आरंभ कर देनी चाहिए। पूजन के पश्चात निर्धारित समय पर होलिका दहन करें। इस दिन नई फसल के गेहूँ और चने की बालियाँ अग्नि में भूनकर प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है। अगले दिन बुधवार, मार्च 4, 2026 को पूरे हर्षोल्लास के साथ रंगवाली होली खेलें और एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर इस पर्व की मस्ती में शामिल हों।
होली पूजा विधि – Holi Puja Vidhi
होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का महापर्व है। होलिका पूजन इसलिए विशेष है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि भक्त प्रह्लाद की तरह सच्ची भक्ति के सामने होलिका जैसी राक्षसी शक्तियाँ भी पराजित हो जाती हैं। मान्यता है कि होलिका पूजन से भय पर विजय मिलती है तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
निर्धारित मुहूर्त में होलिका दहन करें। अग्नि प्रज्वलित होने के बाद सभी पुरुष एक-दूसरे को रोली का तिलक लगाएँ। बड़ों से आशीर्वाद लें। भुने अनाज को प्रसाद के रूप में बाँटें। होलिका की राख को पवित्र माना जाता है। इसे माथे पर लगाने से शरीर और आत्मा शुद्ध होती है। इसी दिन रंगों वाली होली खेली जाती है।

पूजा सामग्री
होलिका पूजन के लिए ये सामग्री चाहिए:
- गंगाजल से भरा कलश
- गाय के गोबर की मालाएँ (गुलरी)
- रोली, अक्षत (चावल), चंदन
- धूप, दीपक, फूल
- कच्चा सूती धागा
- हल्दी के टुकड़े, साबुत मूँग दाल
- बताशे, गुलाल, नारियल
- गेहूँ-चने की बालियाँ
पूजा विधि
- स्थान शुद्धि: जहाँ होलिका रखी है, वहाँ गोबर से लीपकर गंगाजल छिड़कें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और दक्षिणा लेकर पूजा करने का संकल्प करें। इसमें अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलें।
- गणेश पूजन: सर्वप्रथम भगवान गणेश का ध्यान करें। उन्हें रोली, अक्षत, फूल और चंदन अर्पित करें। इससे विघ्न दूर होते हैं।
- देवी अम्बिका पूजन: देवी अम्बिका को फूल-अक्षत चढ़ाएँ। सुख-शांति के लिए उनका आशीर्वाद माँगें।
- नृसिंह भगवान पूजन: भगवान नृसिंह का ध्यान करें जिन्होंने प्रह्लाद की रक्षा की थी। उन्हें फूल अर्पित करें।
- प्रह्लाद पूजन: भक्त प्रह्लाद को याद करें। उनकी भक्ति से प्रेरणा लें और उन्हें अक्षत-फूल चढ़ाएँ।
- होलिका प्रार्थना: होलिका के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि वे सभी भय दूर करें और सुख-समृद्धि दें।
- सामग्री अर्पण: होलिका को अक्षत, फूल, हल्दी, मूँग दाल, नारियल और गुलाल चढ़ाएँ। गोबर की माला पहनाएँ।
- रक्षासूत्र बाँधें: होलिका के चारों ओर कच्चे सूती धागे की तीन या पाँच परिक्रमाएँ करते हुए धागा बाँधें।
- परिक्रमा: होलिका की तीन से सात परिक्रमा करें। गेहूँ-चने की बालियाँ अग्नि में भूनकर प्रसाद लें।
विशेष सावधानियाँ
- होलिका दहन हमेशा शुभ मुहूर्त में करें
- आग में प्लास्टिक या केमिकल न डालें
- पानी की व्यवस्था रखें
- पर्यावरण का ध्यान रखें, कम लकड़ी जलाएँ
-
बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें
होली से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएँ
1. होलिका और प्रह्लाद की अमर गाथा
होली का पावन पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, भक्ति और अटूट विश्वास की अमर गाथा है। इस त्योहार से जुड़ी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, किंतु सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रेरणादायक कथा है भक्त प्रह्लाद और राक्षसी होलिका की। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति के समक्ष कोई भी शक्ति टिक नहीं सकती और बुराई चाहे कितनी भी प्रबल क्यों न हो, अंततः उसका नाश निश्चित है।

प्रह्लाद का जन्म और बाल्यकाल – प्रह्लाद की कथा आरंभ होती है हिरण्यकशिपु नामक महाशक्तिशाली राक्षस राजा से। हिरण्यकशिपु ने घोर तपस्या करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे वरदान प्राप्त किया कि न कोई देवता, न कोई राक्षस, न कोई मनुष्य, न कोई पशु उसे मार सकेगा। वह न दिन में मरेगा, न रात में, न घर के अंदर, न बाहर। इस वरदान ने उसे अजेय और अमरता का अहंकार दे दिया।
जब हिरण्यकशिपु यह वरदान प्राप्त करने में व्यस्त था, उसी समय उसकी पत्नी कयाधु गर्भवती थी। देवर्षि नारद ने कयाधु को अपने आश्रम में शरण दी और उसे धार्मिक शिक्षाएँ प्रदान कीं। नारद जी के सान्निध्य में ही कयाधु के गर्भ में पल रहे शिशु ने भक्ति और ज्ञान के संस्कार ग्रहण किए। यही शिशु आगे चलकर प्रह्लाद के नाम से विख्यात हुआ।
प्रह्लाद का जन्म हुआ और उसने बाल्यकाल से ही भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति दिखानी आरंभ कर दी। उसके पिता हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु का परम शत्रु था, क्योंकि विष्णु ने ही उसके भाई हिरण्याक्ष का वध किया था।
पिता-पुत्र का संघर्ष – जब हिरण्यकशिपु को पता चला कि उसका अपना पुत्र उसके परम शत्रु की भक्ति करता है, तो उसे अत्यधिक क्रोध आया। उसने प्रह्लाद को समझाने का भरसक प्रयास किया। उसने राजगुरुओं को प्रह्लाद की शिक्षा का दायित्व सौंपा, किंतु प्रह्लाद का मन भगवान विष्णु से हटा पाना किसी के लिए भी संभव न था।
जब हिरण्यकशिपु ने देखा कि प्रह्लाद उसकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा और निरंतर भगवान विष्णु का नाम जप रहा है, तो उसने उसे अनेक कठोर दंड देने आरंभ कर दिए। उसने प्रह्लाद को सर्पों से डसवाया, हाथियों से कुचलवाया, पर्वत से ढकेलवाया, किंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बार-बार सुरक्षित बच निकला।
होलिका का आगमन – अपने सभी प्रयासों में असफल होने पर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती। उसे भगवान ब्रह्मा से एक दिव्य ओढ़नी (चादर) प्राप्त थी, जिसे ओढ़कर वह अग्नि में प्रवेश कर सकती थी और सुरक्षित बाहर आ सकती थी।
हिरण्यकशिपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, जिससे प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाए। होलिका ने अपने भाई की आज्ञा का पालन किया। उसने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाया और धधकती हुई अग्नि में प्रवेश कर गई।
चमत्कार और विजय – यह वह क्षण था जब भक्ति की शक्ति और अहंकार का पतन एक साथ देखने को मिला। होलिका ने यह सोचकर कि उसे वरदान प्राप्त है, अग्नि में प्रवेश किया, किंतु वह यह भूल गई कि उसका वरदान तभी प्रभावी था जब वह अकेली अग्नि में प्रवेश करती। उसने प्रह्लाद के साथ अग्नि में प्रवेश किया, अतः उसके वरदान का असर समाप्त हो गया।
लोककथाओं के अनुसार, जैसे ही होलिका अग्नि में बैठी, प्रह्लाद ने भगवान विष्णु का नाम जपना आरंभ कर दिया। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की पुकार सुनी और वायु देवता को आदेश दिया कि वे होलिका के ऊपर से ओढ़नी उड़ाकर प्रह्लाद पर डाल दें। वायु के एक प्रचंड झोंके ने होलिका के शरीर से वह दिव्य ओढ़नी उतारकर प्रह्लाद को ढक दिया।
परिणाम यह हुआ कि राक्षसी होलिका उसी अग्नि में जलकर भस्म हो गई, जिसमें वह कभी नहीं जलती थी, और भक्त प्रह्लाद पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकल आया। यह घटना बुराई पर अच्छाई की विजय और भक्ति की अटूट शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण बन गई।
नृसिंह अवतार – होलिका के वध के बाद भी हिरण्यकशिपु का क्रोध कम नहीं हुआ। उसने प्रह्लाद को मारने के और भी प्रयास किए, किंतु सभी असफल रहे। अंततः एक दिन उसने प्रह्लाद से पूछा, “कहाँ है तेरा भगवान? यदि वह सर्वव्यापी है, तो क्या वह इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “हाँ पिताश्री, वह इस खंभे में भी हैं।”
हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर खंभे पर प्रहार किया। उसी क्षण उस खंभे से भगवान नृसिंह प्रकट हुए – जिनका मुख सिंह का और शरीर मनुष्य का था। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु को संध्या के समय, द्वार की देहली पर, अपनी गोद में लेकर अपने नाखूनों से उसका वध कर दिया। इस प्रकार भगवान ने ब्रह्मा के वरदान की मर्यादा का पालन करते हुए राक्षस का अंत किया और अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
होली पर्व का नामकरण – इसी घटना के आधार पर होली पर्व का नामकरण हुआ। होलिका दहन उसी अग्नि का प्रतीक है, जिसमें राक्षसी होलिका जलकर भस्म हो गई थी। प्रतिवर्ष फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होलिका दहन किया जाता है, जो हमें स्मरण दिलाता है कि भक्ति और सत्य के समक्ष अन्याय और अधर्म की शक्तियाँ कितनी भी प्रबल क्यों न हों, अंततः उनका नाश निश्चित है।
होलिका दहन के अगले दिन जो रंगवाली होली मनाई जाती है, वह प्रह्लाद की विजय और भगवान विष्णु की कृपा का उत्सव है। रंग खुशी, उल्लास और जीवन की विजय के प्रतीक हैं।
2. राक्षसी ढुंडी के अंत की कथा: होली से जुड़ी एक रोचक पौराणिक गाथा
परिचय – होली का पावन पर्व केवल रंगों और उल्लास तक सीमित नहीं है। इसके पीछी अनेक पौराणिक कथाएँ छिपी हैं, जो इस त्योहार को एक विशिष्ट आध्यात्मिक आयाम प्रदान करती हैं। प्रह्लाद-होलिका की प्रसिद्ध कथा के अतिरिक्त, एक अत्यंत रोचक कथा राक्षसी ढुंडी से भी जुड़ी है, जिसका सीधा संबंध रघुवंश के प्रतापी राजा रघु से है। यह कथा हमें बताती है कि कैसे बच्चों के हुड़दंग और शोर-गुल ने एक शक्तिशाली राक्षसी का अंत कर दिया और कैसे यह परंपरा आज भी होली के रूप में जीवित है।

ढुंडी नामक राक्षसी की कथा – ढुंडी का वरदान
प्राचीन काल में रघुवंश में राजा रघु नामक एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा हुए। उनके राज्य में ढुंडी नाम की एक भयानक राक्षसी ने आतंक मचा रखा था। यह राक्षसी अत्यंत शक्तिशाली थी क्योंकि उसने भगवान शिव को प्रसन्न करके एक विशेष वरदान प्राप्त कर लिया था।
ढुंडी ने भोलेनाथ से यह वरदान मांगा कि उसे किसी देवता, दैत्य या शस्त्र से कोई हानि न पहुंचे। भगवान शिव ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर “तथास्तु” कह दिया और वहां से अंतर्ध्यान हो गए। लेकिन ढुंडी ने घमंड में आकर यह सुनिश्चित नहीं किया कि बच्चों और पागलों से भी उसे सुरक्षा प्राप्त हो। यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
ढुंडी का आतंक
वरदान प्राप्त करने के बाद ढुंडी ने राज्य में भयंकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया। वह छोटे बच्चों को परेशान करती, गांव-गांव में आतंक फैलाती और लोगों को भयभीत करती। राजा रघु की प्रजा इस राक्षसी के प्रकोप से अत्यंत परेशान हो गई। उन्होंने राजा रघु के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई और इस राक्षसी से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
महर्षि वशिष्ठ का उपाय
राजा रघु ने प्रजा की समस्या सुनी और तुरंत महर्षि वशिष्ठ के पास गए। उन्होंने वशिष्ठ जी को सारी स्थिति से अवगत कराया और ढुंडी से मुक्ति का उपाय पूछा। महर्षि वशिष्ठ ने ध्यान लगाकर सब कुछ जान लिया। उन्होंने बताया कि ढुंडी को भगवान शिव से वरदान प्राप्त है, जिसके कारण उसे कोई देवता, दैत्य या शस्त्र नहीं मार सकता। लेकिन उसने बच्चों और पागलों से सुरक्षा का वरदान नहीं लिया था।
वशिष्ठ जी ने राजा रघु को सुझाव दिया कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सभी बच्चों को एकत्रित किया जाए। उनसे हुड़दंग, शोर-गुल और नाच-गाना करवाया जाए। इस शोर से आकर्षित होकर ढुंडी वहां अवश्य आएगी। तब बच्चों के शोर-गुल के बीच उसे पराजित किया जा सकता है।
ढुंडी का अंत – तैयारियां और अनुष्ठान
राजा रघु ने महर्षि वशिष्ठ के निर्देशानुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को राज्य भर के बच्चों को एकत्रित किया। एक विशाल स्थान पर गोबर के कंडों, सूखे पत्तों और पेड़ों की सूखी टहनियों का ढेर लगाया गया। यह ढेर इतना बड़ा था कि उसमें कोई भी छिप सकता था।
बच्चों को वहां इकट्ठा करके हुड़दंग मचाने, ढोल-नगाड़े बजाने और जोर-जोर से नाचने-गाने के लिए कहा गया। बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ ऐसा किया। उनका शोर-गुल दूर-दूर तक गूंजने लगा।
ढुंडी का आगमन और वध
इस अपार शोर-गुल को सुनकर राक्षसी ढुंडी वहां आ पहुंची। उसने देखा कि बच्चों का एक समूह उस ढेर के आसपास खेल रहा है और हुड़दंग मचा रहा है। उसने सोचा कि यह अच्छा अवसर है बच्चों को परेशान करने का। वह उसी गोबर के कंडों और लकड़ियों के ढेर में जाकर छिप गई।
यही वह क्षण था जिसकी प्रतीक्षा की जा रही थी। राजा रघु के आदेश पर मंत्रों से अग्नि प्रज्वलित की गई और उस ढेर को आग लगा दी गई। ढुंडी उसी अग्नि में जलकर भस्म हो गई। वरदान प्राप्त होने के बावजूद वह बच सकी, क्योंकि उसने बच्चों के हुड़दंग और अग्नि के संयोग से अपना अंत पाया।
अगले दिन का उत्सव
अगले दिन सभी बच्चों और ग्रामीणों ने ढुंडी के अंत की खुशी में उसकी राख को उड़ाया और एक-दूसरे पर फेंका। यह राख उड़ाने की परंपरा धीरे-धीरे रंगों में बदल गई और आज भी होली के दिन लोग एक-दूसरे पर रंग-गुलाल डालकर इसी विजय का उत्सव मनाते हैं।
इस कथा के कारण ही होलिका दहन से एक दिन पहले बनाई जाने वाली गोबर के कंडों की मालाओं को आज भी “ढुंढेरी” या “गुलरियां” कहा जाता है। यह परंपरा उस ढेर की याद दिलाती है, जिसमें छिपकर ढुंडी ने अपना अंत पाया था।
3. होली से जुड़ी पूतना वध की कथा

इसी प्रकार की एक कथा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन से भी जुड़ी है। जब कंस को पता चला कि उसका संहारक गोकुल में पल रहा है, तो उसने पूतना नामक राक्षसी को भेजा। पूतना ने सुंदर स्त्री का रूप धारण करके गोकुल में प्रवेश किया और एक-एक कर नवजात शिशुओं को अपना विषैला दूध पिलाकर मारने लगी।
जब वह नन्हें कृष्ण को दूध पिलाने लगी, तो कृष्ण ने उसके प्राण ही पी लिए और पूतना मारी गई। पूतना के मरने पर गोकुलवासियों ने उसके शरीर का दाह-संस्कार किया और उसकी राख को घर-घर में बांटा। आज भी गोकुल में पूतना मंदिर से उसकी राख लाकर बच्चों पर डाली जाती है, ताकि वह बुरी नजर से रक्षा कर सके।
4. होली से जुड़ी एक दिव्य पौराणिक कथा – जब शिवजी ने किया था कामदेव को भस्म
होली केवल प्रह्लाद और होलिका की कथा से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि इसके पीछे एक और अत्यंत गहन और आध्यात्मिक प्रसंग छिपा है—जब भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। यह कथा हमें बताती है कि तप, संयम, कामना और करुणा का सनातन धर्म में कितना गहरा स्थान है। इस प्रसंग का वर्णन मुख्य रूप से शिव पुराण तथा अन्य पुराणों में मिलता है।

माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव गहरे वैराग्य और समाधि में लीन हो गए थे। संसार से उनका मन हट चुका था। वे हिमालय की गुफाओं में कठोर तपस्या कर रहे थे। उधर, सती ने पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। उनका उद्देश्य था—पुनः शिव को पति रूप में प्राप्त करना। पार्वती ने भी कठोर तपस्या आरंभ की, परंतु शिव का ध्यान समाधि में स्थिर था।
इसी समय एक और संकट उत्पन्न हुआ। तारकासुर नामक असुर ने वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल शिवपुत्र ही कर सकता है। देवताओं के सामने संकट खड़ा हो गया—यदि शिव विवाह नहीं करेंगे, तो पुत्र कैसे होगा? देवताओं ने उपाय खोजा और अंततः निर्णय लिया कि कामदेव की सहायता ली जाए।
कामदेव, जिन्हें प्रेम और आकर्षण का देवता माना जाता है, अपने साथ पत्नी रति को लेकर शिव की तपस्थली पर पहुँचे। वसंत ऋतु का समय था—चारों ओर पुष्प खिले थे, मंद सुगंध बह रही थी। कामदेव ने अपने पुष्प-बाण (फूलों से बने बाण) धनुष पर चढ़ाए और भगवान शिव की ओर चला दिए। उनका उद्देश्य था शिव के मन में पार्वती के प्रति प्रेम भाव जागृत करना।
जैसे ही बाण चला, शिव की समाधि भंग हो गई। तपस्या में विघ्न पड़ते ही भगवान शिव का क्रोध जाग उठा। उन्होंने चारों ओर दृष्टि डाली और तुरंत समझ गए कि यह कृत्य किसका है। क्षण भर में उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। यह तीसरा नेत्र केवल दृष्टि नहीं, बल्कि दिव्य अग्नि और विनाश की शक्ति का प्रतीक है।
जैसे ही वह नेत्र खुला, उससे निकली ज्वाला ने कामदेव को तत्काल भस्म कर दिया। कामदेव का शरीर वहीं राख में परिवर्तित हो गया। कामदेव की पत्नी रति यह दृश्य देखकर विलाप करने लगीं। उनका हृदय शोक से भर गया। उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की—
“हे महादेव! मेरे पति ने यह कार्य देवताओं के कहने पर किया था। उनका उद्देश्य कोई अधर्म नहीं था। कृपया उन्हें जीवनदान दें।”
देवताओं ने भी शिव से निवेदन किया कि यह सब विश्व कल्याण के लिए किया गया था। भगवान शिव यद्यपि रौद्र रूप में थे, परंतु वे करुणा के सागर भी हैं। रति की विनती और देवताओं के निवेदन को सुनकर उनका हृदय पिघल गया।
उन्होंने वरदान दिया—
- कामदेव शरीरहीन रूप में “अनंग” कहलाएँगे।
- भविष्य में वे पुनः जन्म लेकर अपनी पत्नी रति से मिलेंगे।
- वे भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में अवतरित होंगे।
इस प्रकार शिव ने दंड के साथ-साथ करुणा और पुनर्स्थापन का मार्ग भी दिया।
मान्यता है कि जिस दिन कामदेव भस्म हुए, वह फाल्गुन मास का समय था। बाद में जब शिव और पार्वती का विवाह हुआ, तब देवताओं ने आनंद मनाया और पुष्प वर्षा की। कुछ परंपराओं में यह भी माना जाता है कि कामदेव के दहन और पुनर्जन्म की स्मृति में ही होलिका दहन और रंगोत्सव की परंपरा विकसित हुई।
निष्कर्ष
होली भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जो हमें प्रेम, सौहार्द और एकता का संदेश देती है। यह पर्व सभी बंधनों से ऊपर उठकर मानवता का संदेश फैलाता है। चाहे वह भक्त प्रह्लाद की होलिका से रक्षा हो, राक्षसी ढुंडी का अंत हो, पूतना वध की कथा हो, या कामदेव के पुनर्जन्म की गाथा – होली हर रूप में हमें जीवन के उत्सव को मनाने की प्रेरणा देती है।
आज जब पूरा विश्व तनाव और विभाजन से जूझ रहा है, होली जैसे त्योहार हमें याद दिलाते हैं कि मूलतः हम सब एक हैं। रंगों की तरह हम सब इस सृष्टि के अभिन्न अंग हैं। आइए, इस होली हम सब मिलकर न केवल रंगों से, बल्कि प्रेम और सौहार्द के रंग में भी सराबोर हों।
आपका कीमती समय देने के लिए धन्यवाद!
आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है!
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होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…
जय श्री कृष्णा! 🙏🌸