जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी – अम्बे माता आरती – Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri

आरती श्री अम्बा जी का सार (भावार्थ)

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी आरती श्री अम्बा जी देवी माँ के सौंदर्य, शक्ति, करुणा और रक्षण-स्वरूप को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती है। इस आरती का सार यह बताता है कि माँ अम्बा ही सम्पूर्ण सृष्टि की जननी हैं, जो भक्तों के कष्ट हरकर उन्हें सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करती हैं।

आरती की शुरुआत में माँ को अम्बे गौरी और श्यामा गौरी कहकर नमन किया गया है। यह दर्शाता है कि देवी एक ही होते हुए भी अनेक रूपों में पूजित हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश—तीनों देवता भी नित्य उनका ध्यान करते हैं, जिससे माँ की सर्वोच्च शक्ति और आदिशक्ति स्वरूप का बोध होता है।

माँ के श्रृंगार और सौंदर्य का सुंदर वर्णन मिलता है—माँग में सिंदूर, मृगमद का टीका, उज्ज्वल नेत्र और चंद्रमा समान मुख। यह रूप भक्तों के मन में श्रद्धा, आकर्षण और आत्मिक शांति उत्पन्न करता है। उनका कलेवर स्वर्ण के समान तेजस्वी है और लाल वस्त्र, पुष्पमाला तथा आभूषण उनकी दिव्यता को और बढ़ाते हैं।

आरती में माँ के शक्तिशाली स्वरूप का भी वर्णन है। सिंह उनका वाहन है, जो साहस और बल का प्रतीक है। हाथों में खड्ग और खप्पर धारण कर वे दुष्टों का संहार करती हैं। देव, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी उनकी सेवा करते हैं, क्योंकि माँ सभी के दुःख हरने वाली हैं।

माँ अम्बा ने शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, मधु-कैटभ जैसे असुरों का विनाश कर संसार को भयमुक्त किया। यह दर्शाता है कि जब अधर्म बढ़ता है, तब देवी धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती हैं। उनका उग्र रूप भी भक्तों के लिए रक्षक और कल्याणकारी ही होता है।

आरती में माँ को ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला कहा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे ब्रह्मा, शिव और विष्णु—तीनों की शक्ति हैं। वे वेदों और शास्त्रों में वर्णित शिव की अर्धांगिनी और सम्पूर्ण जगत की अधिष्ठात्री देवी हैं।

चौंसठ योगिनियाँ, भैरव और गण उनके मंगलगान में नृत्य करते हैं, मृदंग और डमरू की ध्वनि से वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यह दृश्य माँ के सार्वभौमिक प्रभाव और दिव्य उत्सव को दर्शाता है।

माँ अम्बा को जगत की माता और पालनहार कहा गया है। वे अपने भक्तों के दुःख हरती हैं और उन्हें सुख-सम्पत्ति, मनोकामना पूर्ति और जीवन में स्थिरता प्रदान करती हैं। उनकी चार भुजाएँ वरदान और अभय का प्रतीक हैं, जो शरणागत को निश्चिंत करती हैं।

अंत में फलश्रुति में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से श्री अम्बा जी की आरती करता है, उसे जीवन में सुख, वैभव और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

समग्र सार

आरती श्री अम्बा जी हमें यह सिखाती है कि माँ में करुणा भी है और शक्ति भी। वे सौंदर्य की प्रतिमूर्ति हैं तो अधर्म के विनाश की शक्ति भी। उनकी भक्ति से भय दूर होता है, मन शुद्ध होता है और जीवन मंगलमय बनता है—यही इस आरती का गूढ़ और जीवनदायी सार है।

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी – आरती – Jai Ambe Gauri Maiya Jai Shyama Gauri

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

जय अम्बे गौरी॥

माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥

जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

जय अम्बे गौरी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥

जय अम्बे गौरी॥

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥

जय अम्बे गौरी॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

जय अम्बे गौरी॥

ब्रहमाणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥

जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूँ।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥

जय अम्बे गौरी॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥

जय अम्बे गौरी॥

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

जय अम्बे गौरी॥

कन्चन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥

जय अम्बे गौरी॥

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥

जय अम्बे गौरी॥


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🙏 जय अम्बे गौरी! मैया श्यामा गौरी आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें—सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करें।

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