शनि प्रदोष व्रत कथा – Shani Pradosh Vrat Katha

शनिवार को त्रयोदशी आने पर शनि प्रदोष व्रत किया जाता है। इसकी कथा में राजकुमार धर्मगुप्त को खोया हुआ राज्य, पद और प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त होने तथा गंधर्व कन्या अंशुमति से विवाह का वर्णन है। यह कथा बताती है कि शनि प्रदोष व्रत से जीवन की अटकी हुई बाधाएँ दूर होती हैं और भाग्य का उदय होता है।

शनि प्रदोष व्रत कथा — राजकुमार धर्मगुप्त और गन्धर्व कन्या अंशुमति की पावन कथा

गर्गाचार्य जी ने निवेदन किया— “हे महामते! आपने भगवान शिव को प्रसन्न करने वाले सभी प्रदोष व्रतों का विस्तार से वर्णन किया है। अब कृपया शनि प्रदोष व्रत की महिमा और उसकी फलदायी कथा का वर्णन करें।”

तब सूतजी बोले— “हे ऋषिवर! आपके हृदय में भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों के प्रति अटूट श्रद्धा है। इसलिए मैं शनि त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पुण्यमयी कथा आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करें।”

प्राचीन काल की बात है। एक ग्राम में एक निर्धन ब्राह्मण अपनी पत्नी और दो पुत्रों के साथ रहता था। दरिद्रता और कष्टों से पीड़ित होकर एक दिन उसकी पत्नी ऋषि शाण्डिल्य के पास पहुँची। उन्होंने मुनि को प्रणाम कर करुण स्वर में कहा— “हे मुनिराज! हमारे जीवन में घोर दुःख और अभाव है। मेरे दोनों पुत्र आपके शरणागत हैं। मेरा ज्येष्ठ पुत्र धर्म एक राजपुत्र है और छोटा पुत्र शुचिव्रत है। हम अनेक कष्टों से घिरे हुए हैं। कृपया हमारे दुःखों का निवारण करने का कोई उपाय बताइए।”

उस स्त्री की व्यथा सुनकर शाण्डिल्य ऋषि ने कहा— “हे पुत्री! यदि तुम अपने कष्टों से मुक्ति चाहती हो, तो भगवान शिव के प्रदोष व्रत को श्रद्धा और नियम से करो।” ब्राह्मणी ने अपने दोनों पुत्रों के साथ प्रदोष व्रत करने का संकल्प लिया। कुछ समय बाद प्रदोष का पावन दिन आया और तीनों ने विधिपूर्वक व्रत रखा।

एक दिन शुचिव्रत स्नान के लिए तालाब की ओर गया। मार्ग में उसे स्वर्ण कलश मिला, जो धन से भरा हुआ था। वह उसे घर लाकर माता से बोला— “माँ! मार्ग में मुझे यह अपार धन प्राप्त हुआ है।” माता ने इसे भगवान शिव की कृपा मानकर उनका स्मरण किया और बड़े पुत्र धर्मगुप्त से कहा— “पुत्र! यह धन प्रभु की कृपा से प्राप्त हुआ है, तुम दोनों इसे आधा-आधा बाँट लो।”

तब राजपुत्र धर्मगुप्त ने विनम्रता से उत्तर दिया— “माते! यह धन मेरे भाई का है। जब भगवान शिव और माता पार्वती मुझे कुछ देंगे, तभी मैं उसे स्वीकार करूँगा।” यह कहकर वह प्रतिदिन की भाँति शिव-भक्ति में लीन हो गया।

एक दिन दोनों भाई भ्रमण करते हुए एक वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने गन्धर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते देखा। शुचिव्रत तो वहीं रुक गया, परंतु धर्मगुप्त आगे बढ़ गया। उन कन्याओं में से एक अत्यंत सुंदर गन्धर्व कन्या अंशुमति राजकुमार के रूप पर मोहित हो गई।

अंशुमति ने अपनी सखियों को किसी बहाने से दूर भेज दिया और राजकुमार से पूछा— “आप कौन हैं? आपका नाम क्या है और आप किस कुल से हैं?” राजकुमार ने उत्तर दिया— “मैं विदर्भ नरेश का पुत्र हूँ। आप भी अपना परिचय दें।” कन्या बोली— “मैं गन्धर्वराज बिद्रविक की पुत्री अंशुमति हूँ। विधाता ने हमारे मिलन का विधान रचा है।”

इतना कहकर उसने राजकुमार को मोतियों का हार पहना दिया। राजकुमार ने संकोच से कहा— “देवि! मैं वर्तमान में अत्यंत निर्धन हूँ।” इस पर अंशुमति ने आश्वस्त करते हुए कहा— “प्रिय! आप निश्चिंत रहें। शीघ्र ही आपके सभी कष्ट दूर होंगे।”

कुछ दिनों बाद धर्मगुप्त अपने भाई के साथ पुनः उसी वन में पहुँचा। तभी वहाँ गन्धर्वराज अपनी पुत्री के साथ आए। गन्धर्वराज बोले— “मैं कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के दर्शन को गया था। वहाँ शिव जी ने मुझे बताया कि धर्मगुप्त नामक यह राजपुत्र मेरा अनन्य भक्त है, जिसे उसके शत्रुओं ने राज्य से निष्कासित कर दिया है। तुम इसकी सहायता करो और इसे पुनः राजसिंहासन पर स्थापित करो।”

भगवान शिव की आज्ञा से गन्धर्वराज ने अपनी पुत्री अंशुमति का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कर दिया और विवाह में अपार धन-संपदा प्रदान की। ससुर की सहायता से धर्मगुप्त ने अपना खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त कर लिया और सुख-समृद्धि से शासन करने लगा।

इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा से उस निर्धन ब्राह्मणी के दोनों पुत्रों का जीवन धन, यश और सुख से भर गया।

यह कथा बताती है कि जो भी भक्त श्रद्धा और विश्वास से शनि प्रदोष व्रत करता है, भगवान शिव उसकी दरिद्रता, शत्रु बाधा और दुर्भाग्य को दूर कर उसे पुनः वैभव और सम्मान प्रदान करते हैं।
हर-हर महादेव। 🙏

शनि प्रदोष व्रत के लाभ

शनि प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्रभावशाली व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से शनि दोष शांति, कष्ट निवारण और जीवन में स्थिरता प्रदान करने वाला बताया गया है। श्रद्धा, नियम और विधि-विधान से किया गया शनि प्रदोष व्रत भक्त के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं—

1. शिव कृपा के साथ शनि देव की अनुकंपा
शनि प्रदोष व्रत करने से साधक को भगवान शिव और शनि देव—दोनों की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन शनि देव की पूजा, दान और उनके मंत्रों का जप करने से शुभ फल मिलते हैं और जीवन की बाधाएँ कम होती हैं।

2. शनि दोष से राहत और व्रत का पूर्ण फल
इस व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है और साथ ही शनि दोष का प्रभाव कम होता है। शनि प्रदोष के दिन कथा का पाठ करने से व्रत का संपूर्ण फल मिलता है।

3. साढ़ेसाती, ढैय्या और शनि जनित दोषों की शांति
जिन जातकों की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य शनि दोष हों, उनके लिए शनि प्रदोष व्रत अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह व्रत शनि के कुप्रभाव को शांत कर जीवन में संतुलन और स्थिरता लाता है।

4. कष्ट निवारण और शिव कृपा की प्राप्ति
प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने से दुःख, भय और मानसिक परेशानियाँ दूर होती हैं। इसके बाद कथा का श्रवण या पाठ करने से शिव कृपा और अधिक प्रबल होती है।

5. वैवाहिक जीवन में सुख-शांति
शनि प्रदोष व्रत भगवान शिव के लिए रखा जाता है। इस व्रत को करने वालों पर शिव जी की विशेष कृपा बनी रहती है, जिससे सभी कष्ट दूर होते हैं। मान्यता है कि पूजा के समय कथा पढ़ने से दांपत्य जीवन सुखमय और संतुलित रहता है।

6. दरिद्रता से मुक्ति और सफलता का मार्ग
श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया शनि प्रदोष व्रत दुख-दरिद्रता को दूर करता है और जीवन में सुख, समृद्धि व उन्नति लाता है। विशेष रूप से इस व्रत से शनि की कुदृष्टि से मुक्ति मिलती है और करियर, व्यवसाय व अन्य क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है।

इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत न केवल शनि दोष शांति का श्रेष्ठ उपाय है, बल्कि यह जीवन को स्थिरता, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाला अत्यंत कल्याणकारी व्रत भी है।
ॐ नमः शिवाय। 🙏


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हर-हर महादेव🙏

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