श्री गिरिराज आरती का सार (भावार्थ)
श्री गिरिराज जी की आरती श्रद्धा, शरणागति, भक्ति और मोक्ष के गहन भाव को प्रकट करती है। इसमें गिरिराज महाराज को ऐसे करुणामय स्वामी के रूप में स्मरण किया गया है, जो संकट के समय अपने भक्तों की लाज रखते हैं और हर विपत्ति से उनकी रक्षा करते हैं। आरती का सार यह संदेश देता है कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती।
आरती की शुरुआत में गिरिराज जी की त्रिकाल जय-जयकार की गई है, जिससे उनकी महिमा और सर्वशक्तिमान स्वरूप का बोध होता है। वे केवल भक्तों के रक्षक ही नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी ध्यान किए जाने वाले पूज्य हैं। इन्द्र सहित सभी देवगण उनका स्मरण करते हैं और ऋषि-मुनि उनकी कीर्ति का गान करके भवसागर से पार होते हैं।
गिरिराज जी का रूप अत्यंत सुंदर और मनोहारी बताया गया है। श्याम शिला स्वरूप, वन-उपवन, लताएँ और हरियाली—सब मिलकर भक्तों के मन को आकर्षित करते हैं और भक्ति भाव को दृढ़ करते हैं। उनके दर्शन मात्र से ही हृदय में शांति और आनंद का संचार होता है।
आरती में मानसी गंगा का विशेष उल्लेख है, जो कलियुग के पापों का नाश करने वाली मानी गई है। यहाँ दीप जलाने और श्रद्धा से स्नान करने पर वैतरणी से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है—यह कर्मकांड नहीं, बल्कि आस्था की शक्ति का प्रतीक है।
नवल अप्सरा कुण्ड और राधा-कुण्ड की महिमा भी वर्णित है। राधा-कुण्ड में स्नान को महापापहारी बताया गया है, जो भक्त को भीतर से पवित्र कर देता है। ये तीर्थ केवल जल के कुंड नहीं, बल्कि प्रेम, तप और करुणा के केंद्र हैं।
गिरिराज जी को कलियुग के स्वामी और मुक्ति के दाता कहा गया है। वे दीन-दुखियों के रक्षक और अंतर्यामी प्रभु हैं—अर्थात् भक्त के हृदय की हर पीड़ा और भावना को जानते हैं। यही कारण है कि भक्त पूर्ण विश्वास के साथ उनकी शरण ग्रहण करता है।
आरती में भक्त अपनी दीनता स्वीकार करते हुए गिरिवर गिरधारी से कृपा की प्रार्थना करता है और उन्हें देवकीनंदन का स्वरूप मानकर भक्त-हित में कृपा बरसाने का निवेदन करता है। यह भाव दर्शाता है कि गिरिराज भक्ति स्वयं श्रीकृष्ण से अभिन्न है।
फलश्रुति में कहा गया है कि जो भक्त परिक्रमा, पूजन और नित्य आरती करता है, उसे पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता—अर्थात् वह मोक्ष का अधिकारी बनता है। यह आरती कर्म, भक्ति और विश्वास—तीनों के समन्वय का संदेश देती है।
समग्र सार
श्री गिरिराज आरती हमें सिखाती है कि संकट में शरण, जीवन में भक्ति और अंत में मुक्ति—ये तीनों गिरिराज जी की कृपा से सहज हो जाते हैं। उनकी आराधना से पापों का क्षय, मन की शुद्धि और आत्मा की उन्नति होती है। यही इस आरती का आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी सार है।
श्री गिरिराज जी की आरती – Shri Giriraj Ji Ki Aarti
ॐ जय जय जय गिरिराज,स्वामी जय जय जय गिरिराज।
संकट में तुम राखौ,निज भक्तन की लाज॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
इन्द्रादिक सब सुर मिलतुम्हरौं ध्यान धरैं।
रिषि मुनिजन यश गावें,ते भवसिन्धु तरैं॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
सुन्दर रूप तुम्हारौश्याम सिला सोहें।
वन उपवन लखि-लखि केभक्तन मन मोहें॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
मध्य मानसी गङ्गाकलि के मल हरनी।
तापै दीप जलावें,उतरें वैतरनी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
नवल अप्सरा कुण्डसुहावन-पावन सुखकारी।
बायें राधा-कुण्ड नहावेंमहा पापहारी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
तुम्ही मुक्ति के दाताकलियुग के स्वामी।
दीनन के हो रक्षकप्रभु अन्तरयामी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
हम हैं शरण तुम्हारी,गिरिवर गिरधारी।
देवकीनंदन कृपा करो,हे भक्तन हितकारी॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
जो नर दे परिकम्मापूजन पाठ करें।
गावें नित्य आरतीपुनि नहिं जनम धरें॥
ॐ जय जय जय गिरिराज…॥
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🙏 श्री गिरिराज महाराज आप सभी पर अपनी करुणा बनाए रखें—संकट हरें, भक्ति बढ़ाएँ और जीवन को मंगलमय करें।