श्री कुबेर चालीसा – Shri Kuber Chalisa

श्री कुबेर चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ

श्री कुबेर चालीसा का यह सार भगवान कुबेर के स्वरूप, महिमा, पराक्रम, तपस्या, वरदान, और भक्तों पर उनकी करुणा को सरल, भावपूर्ण और धार्मिक-आध्यात्मिक भाषा में प्रस्तुत करता है। यह चालीसा धन, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुरक्षा और विजय के साथ-साथ धर्म और भक्ति का भी गहरा संदेश देती है।

दोहा का भावार्थ- कुबेर जी को हिमालय और सुमेरु पर्वत की तरह अटल, अविचल और स्थिर बताया गया है। वे स्वर्ग के द्वार पर अडिग प्रहरी हैं, जो शरणागत भक्तों की पुकार सुनकर विघ्नों का नाश करते हैं और धन-माया का वितरण कर मंगल प्रदान करते हैं। यहाँ कुबेर की न्यायप्रियता और करुणा का सुंदर चित्रण है।

कुबेर का स्वरूप और सामर्थ्य- चालीसा में कुबेर को धन-माया के अधिकारी, तप-तेज से युक्त, निर्भय, और अद्भुत बल से सम्पन्न बताया गया है। उनकी देह-शक्ति पवन वेग के समान मानी गई है। वे इन्द्रदेव के आज्ञाकारी सेवक हैं और यक्ष-यक्षणियों की विशाल सेना के सेनापति के रूप में धनुष-शस्त्र धारण कर महायोद्धा बनते हैं। युद्ध में वे सदा विजयी रहते हैं और भक्तों के संकट हर लेते हैं।

वंश, तपस्या और वरदान- कुबेर जी का वंश परिचय गौरवशाली है—वे प्रजापति वंश से संबद्ध, विश्रवा ऋषि के पुत्र और विभीषण के भ्राता बताए गए हैं। शिव-चरणों में घोर तपस्या से उन्होंने अमृत-पान और अमरता का वरदान पाया। उनके हाथ में धर्म-ध्वजा सदा विराजमान रहती है, जो बताती है कि समृद्धि का मूल धर्म है।

ऐश्वर्य और दरबार का वैभव- कुबेर जी पीताम्बर धारण, स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान, त्रिशूल-गदा से सुशोभित हैं। उनके दरबार में शंख, मृदंग, नगाड़े, गंधर्वों का मधुर गायन, चौंसठ योगनियाँ, ऋद्धि-सिद्धि, यक्ष-यक्षणियाँ और चंवर-छत्र से सुसज्जित भव्यता दिखाई देती है—यह दैवी वैभव का प्रतीक है।

उपमाएँ और श्रेष्ठता- चालीसा में कुबेर की श्रेष्ठता को अनेक उपमाओं से बताया गया है—जैसे ऋषियों में परशुराम, देवों में हनुमान, पुरुषों में भीम, वैसे ही यक्षों में कुबेर सर्वोच्च हैं। यह बताता है कि कुबेर केवल धन के देवता नहीं, बल्कि बल, धर्म और विजय के भी प्रतीक हैं।

भक्त-वत्सलता और फलश्रुति- जो भक्त मन से कुबेर का स्मरण करता है, उसके बिगड़े काम बनते हैं, अन्न-धन के भंडार भरते हैं, गरीबी और कर्ज दूर होते हैं। कुबेर रोग-शोक, भय, भूत-प्रेत, कलंक, कोढ़ और दुख का नाश करते हैं। वे भाग्य जागृत करते हैं, व्यापार-वृद्धि, विजय, न्यायिक सफलता, सुरक्षा और जीवन में स्थिरता प्रदान करते हैं। नित्य पाठ से कला, बुद्धि और सौभाग्य बढ़ता है।

करुणा के अद्भुत कार्य- कुबेर प्यासे की प्यास, भूखे की भूख, रोगी का रोग, दुखिया का दुख हरते हैं। गृहस्थी, कारोबार, बंधन-मुक्ति, और सामाजिक सुरक्षा में वे सहायक हैं। यहाँ कुबेर की सर्वकल्याणकारी करुणा स्पष्ट होती है।

अंतिम दोहा का संदेश- अंतिम दोहा में कुबेर को शिव-भक्तों में अग्रणी बताते हुए, हृदय में ज्ञान-प्रकाश भरकर अंधकार दूर करने और दया-दृष्टि की प्रार्थना की गई है—यह आध्यात्मिक जागरण का संदेश है।

श्री कुबेर चालीसा केवल धन-समृद्धि की कामना नहीं सिखाती, बल्कि बताती है कि धर्म, तपस्या, सेवा और भक्ति से ही स्थायी ऐश्वर्य प्राप्त होता है। जो भक्त श्रद्धा और नियम से इसका पाठ करता है, उसके जीवन में सुख, सुरक्षा, स्थिरता, विजय और करुणा का संचार होता है। कुबेर जी की कृपा से अभाव दूर होते हैं और समृद्ध जीवन का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्री कुबेर चालीसा – Shri Kuber Chalisa

॥ दोहा ॥

जैसे अटल हिमालय, और जैसे अडिग सुमेर।
ऐसे ही स्वर्ग द्वार पै, अविचल खड़े कुबेर॥

विघ्न हरण मंगल करण, सुनो शरणागत की टेर।
भक्त हेतु वितरण करो, धन माया के ढ़ेर॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय श्री कुबेर भण्डारी। धन माया के तुम अधिकारी॥१॥
तप तेज पुंज निर्भय भय हारी। पवन वेग सम सम तनु बलधारी॥२॥

स्वर्ग द्वार की करें पहरे दारी। सेवक इन्द्र देव के आज्ञाकारी॥३॥
यक्ष यक्षणी की है सेना भारी। सेनापति बने युद्ध में धनुधारी॥४॥

महा योद्धा बन शस्त्र धारैं। युद्ध करैं शत्रु को मारैं॥५॥
सदा विजयी कभी ना हारैं। भगत जनों के संकट टारैं॥६॥

प्रपितामह हैं स्वयं विधाता। पुलिस्ता वंश के जन्म विख्याता॥७॥
विश्रवा पिता इडविडा जी माता। विभीषण भगत आपके भ्राता॥८॥

शिव चरणों में जब ध्यान लगाया। घोर तपस्या करी तन को सुखाया॥९॥
शिव वरदान मिले देवत्य पाया। अमृत पान करी अमर हुई काया॥१०॥

धर्म ध्वजा सदा लिए हाथ में। देवी देवता सब फिरैं साथ में॥११॥
पीताम्बर वस्त्र पहने गात में। बल शक्ति पूरी यक्ष जात में॥१२॥

स्वर्ण सिंहासन आप विराजैं। त्रिशूल गदा हाथ में साजैं॥१३॥
शंख मृदंग नगारे बाजैं। गंधर्व राग मधुर स्वर गाजैं॥१४॥

चौंसठ योगनी मंगल गावैं। ऋद्धि सिद्धि नित भोग लगावैं॥१५॥
दास दासनी सिर छत्र फिरावैं। यक्ष यक्षणी मिल चंवर ढूलावैं॥१६॥

ऋषियों में जैसे परशुराम बली हैं। देवन्ह में जैसे हनुमान बली हैं॥१७॥
पुरुषों में जैसे भीम बली हैं। यक्षों में ऐसे ही कुबेर बली हैं॥१८॥

भगतों में जैसे प्रहलाद बड़े हैं। पक्षियों में जैसे गरुड़ बड़े हैं॥१९॥
नागों में जैसे शेष बड़े हैं। वैसे ही भगत कुबेर बड़े हैं॥२०॥

कांधे धनुष हाथ में भाला। गले फूलों की पहनी माला॥२१॥
स्वर्ण मुकुट अरु देह विशाला। दूर दूर तक होए उजाला॥२२॥

कुबेर देव को जो मन में धारे। सदा विजय हो कभी न हारे॥२३॥
बिगड़े काम बन जाएं सारे। अन्न धन के रहें भरे भण्डारे॥२४॥

कुबेर गरीब को आप उभारैं। कुबेर कर्ज को शीघ्र उतारैं॥२५॥
कुबेर भगत के संकट टारैं। कुबेर शत्रु को क्षण में मारैं॥२६॥

शीघ्र धनी जो होना चाहे। क्युं नहीं यक्ष कुबेर मनाएं॥२७॥
यह पाठ जो पढ़े पढ़ाएं। दिन दुगना व्यापार बढ़ाएं॥२८॥

भूत प्रेत को कुबेर भगावैं। अड़े काम को कुबेर बनावैं॥२९॥
रोग शोक को कुबेर नशावैं। कलंक कोढ़ को कुबेर हटावैं॥३०॥

कुबेर चढ़े को और चढ़ादे। कुबेर गिरे को पुनः उठा दे॥३१॥
कुबेर भाग्य को तुरंत जगा दे। कुबेर भूले को राह बता दे॥३२॥

प्यासे की प्यास कुबेर बुझा दे। भूखे की भूख कुबेर मिटा दे॥३३॥
रोगी का रोग कुबेर घटा दे। दुखिया का दुख कुबेर छुटा दे॥३४॥

बांझ की गोद कुबेर भरा दे। कारोबार को कुबेर बढ़ा दे॥३५॥
कारागार से कुबेर छुड़ा दे। चोर ठगों से कुबेर बचा दे॥३६॥

कोर्ट केस में कुबेर जितावै। जो कुबेर को मन में ध्यावै॥३७॥
चुनाव में जीत कुबेर करावैं। मंत्री पद पर कुबेर बिठावैं॥३८॥

पाठ करे जो नित मन लाई। उसकी कला हो सदा सवाई॥३९॥
जिसपे प्रसन्न कुबेर की माई। उसका जीवन चले सुखदाई॥४०॥

जो कुबेर का पाठ करावै। उसका बेड़ा पार लगावै॥४१॥
उजड़े घर को पुनः बसावै। शत्रु को भी मित्र बनावै॥४२॥

सहस्र पुस्तक जो दान कराई। सब सुख भोग पदार्थ पाई॥४३॥
प्राण त्याग कर स्वर्ग में जाई। मानस परिवार कुबेर कीर्ति गाई॥४४॥

॥ दोहा ॥

शिव भक्तों में अग्रणी, श्री यक्षराज कुबेर।
हृदय में ज्ञान प्रकाश भर, कर दो दूर अंधेर॥

कर दो दूर अंधेर अब, जरा करो ना देर।
शरण पड़ा हूं आपकी, दया की दृष्टि फेर॥


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