श्री पितर जी की आरती – Shri Pitar Ji Ki Aarti

श्री पितर जी महाराज की आरती – सार (भावार्थ)

श्री पितर जी की आरती, पितरजी महाराज को समर्पित भक्त के हृदय की पूर्ण शरणागति, कृतज्ञता और अटूट विश्वास को अभिव्यक्त करती है। इसमें पूर्वजों (पितरों) को केवल स्मरणीय आत्माएँ नहीं, बल्कि रक्षक, दाता और मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किया गया है, जो जीवन के हर मोड़ पर अदृश्य रूप से सहारा देते हैं। यह आरती पितरों के प्रति श्रद्धा को केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवंत आध्यात्मिक संबंध के रूप में प्रस्तुत करती है।

आरती की शुरुआत “मैं शरण पड़यो हूँ थारी” जैसे शब्दों से होती है, जो यह दर्शाते हैं कि भक्त स्वयं को पूरी तरह पितरजी महाराज की शरण में समर्पित कर देता है। यह शरणागति कोई औपचारिक निवेदन नहीं, बल्कि हृदय से निकला वह गहरा विश्वास है कि जीवन की हर चुनौती में पितरजी ही उसका सहारा हैं। यहाँ पितरों को आध्यात्मिक अभिभावक के रूप में देखा गया है, जिनकी छाया में भक्त स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है।

“आप ही रक्षक, आप ही दाता, आप ही खेवनहारे” जैसे भावों के माध्यम से पितरजी महाराज की त्रिविध भूमिका स्पष्ट होती है। वे संकट से रक्षा करने वाले रक्षक हैं, जीवन को सुचारु बनाने वाले दाता हैं और भव-सागर में डूबी जीवन-नौका को पार लगाने वाले खेवनहार हैं। भक्त अपनी अल्पज्ञता स्वीकार करते हुए कहता है कि वह स्वयं बहुत कुछ नहीं जानता, इसलिए पितरजी ही उसके वास्तविक रखवाले हैं। यह विनम्र स्वीकारोक्ति भक्ति की गहराई और आत्मसमर्पण को उजागर करती है।

“आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी” पंक्ति पितरों की निरंतर उपस्थिति का भाव प्रकट करती है। भक्त अनुभव करता है कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो, पितरजी का संरक्षण कभी क्षीण नहीं पड़ता। उन्हें सदैव जाग्रत प्रहरी की तरह देखा गया है, जो हर क्षण जीवन की रक्षा करते हुए अदृश्य रूप से साथ खड़े रहते हैं और मन को आश्वस्त करते हैं कि वह अकेला नहीं है।

“देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई” यह दर्शाता है कि पितरों की कृपा किसी स्थान, सीमा या परिस्थिति से बंधी नहीं है। चाहे भक्त अपने घर में हो या दूर देश में, पितरजी का स्मरण उसे साहस, सुरक्षा और मानसिक शांति प्रदान करता है। “काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई” के माध्यम से यह भाव प्रकट होता है कि कठिन समय में पितरों का नाम लेना मन को शीतलता देता है और संकट को सहनीय बना देता है।

“भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार” यह बताता है कि पितर-भक्ति केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि पूरे परिवार की रक्षा और कल्याण की कामना है। भक्त बार-बार यह प्रार्थना करता है कि पितरजी घर-परिवार, संतति और संबंधों की रक्षा करें, ताकि सभी पर उनका आशीर्वाद बना रहे। इस भाव में पितरों को परिवार की अदृश्य ढाल और पीढ़ियों के संरक्षक के रूप में देखा गया है।

“रटूँ मैं बारम्बार” यह स्पष्ट करता है कि पितरों का स्मरण एक क्षणिक कर्म नहीं, बल्कि निरंतर साधना है। बार-बार नाम जपने से भक्त का मन कृतज्ञता, अनुशासन और विनम्रता से भरता है, जिससे जीवन में संतुलन, स्थिरता और सकारात्मक दृष्टि विकसित होती है। यह निरंतर स्मरण ही पितर-भक्ति को जीवन-पद्धति में बदल देता है।

समग्र रूप से यह आरती पितर-भक्ति को जीवन का आधार बनाती है और पितरों को रक्षक, दाता और खेवनहार, हर घड़ी साथ खड़े रहने वाले प्रहरी, देश-विदेश में समान सहायक तथा परिवार सहित सबके कल्याणकर्ता के रूप में नमन करती है। भक्त अपनी सीमाएँ स्वीकार कर पितरों की शरण में जाता है, उनसे रक्षा, मार्गदर्शन और शांति की याचना करता है तथा उनके नाम-स्मरण को जीवन की कठिनाइयों में सबसे बड़ा संबल मानता है। संक्षेप में, यह आरती पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और पूर्ण समर्पण का जीवंत घोष है, जो भक्त के जीवन में सुरक्षा, स्थिरता और आध्यात्मिक बल का संचार करती है।

श्री पितर जी की आरती – Shri Pitar Ji Ki Aarti

जय जय पितरजी महाराज, मैं शरण पड़यो हूँ थारी।
शरण पड़यो हूँ थारी बाबा, शरण पड़यो हूँ थारी॥

आप ही रक्षक आप ही दाता, आप ही खेवनहारे।
मैं मूरख हूँ कछु नहि जाणू, आप ही हो रखवारे॥

जय जय पितरजी महाराज।

आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी।
हम सब जन हैं शरण आपकी, है ये अरज गुजारी॥

जय जय पितरजी महाराज।

देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई।
काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई॥

जय जय पितरजी महाराज।

भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार।
रक्षा करो आप ही सबकी, रटूँ मैं बारम्बार॥

जय जय पितरजी महाराज।


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