श्री रामदेव चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
श्री रामदेव चालीसा का आरंभ गुरु, गणेश और देव कृपा के स्मरण से होता है। इसमें कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा से श्री रामदेव जी का यश सुनता और गाता है, उसके पाप स्वतः नष्ट हो जाते हैं। द्वारकेश (भगवान विष्णु) के अंशावतार के रूप में रामदेव जी ने अजमल जी के घर मनुष्य रूप में अवतार लिया और उनके जन्म से ही जगत में जय-जयकार होने लगी।
चालीसा में श्री रामदेव जी को विष्णु स्वरूप, सुर-नर के स्वामी, परम प्रतापी और अन्तर्यामी बताया गया है। वे पृथ्वी पर अवतार लेकर संत-भक्तों के कष्ट दूर करने और दुष्ट, दानव व अत्याचारियों का नाश करने आए। उनका जीवन करुणा, न्याय और चमत्कारों से परिपूर्ण है।
इस चालीसा का मुख्य आधार श्री रामदेव जी के चौबीस प्रसिद्ध परचे (चमत्कार) हैं।
- प्रारंभिक परचों में उन्होंने अपने माता-पिता और नगरवासियों को दिव्य संकेत देकर अपनी शक्ति प्रकट की।
- भैरव का वध, रतना और पुंगल को संकट से मुक्त करना, डूबती नाव को बचाना, मृत पुत्र को जीवित करना, नमक को मिश्री में बदल देना जैसे चमत्कार उनके करुणामय और सर्वशक्तिमान स्वरूप को दर्शाते हैं।
- उन्होंने व्यापारियों, किसानों, शासकों, सेठों, चोरों और बादशाहों तक को अपने परचों द्वारा न्याय और भक्ति का मार्ग दिखाया।
- जो भी शरणागत होकर उनके पास आया, उसे अभय, वरदान और समाधान मिला।
चालीसा में स्पष्ट किया गया है कि जब-जब किसी भक्त ने सच्चे मन से श्री रामदेव जी का सुमिरन किया, तब-तब प्रभु लीले पर सवार होकर तुरंत सहायता के लिए पहुँचे। उनकी लीलाओं का गायन करने से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।
जो भक्त श्रद्धा से श्री रामदेव चालीसा का पाठ, श्रवण या गायन करता है, उसके सभी दुख-कष्ट कट जाते हैं। प्रभु की महिमा अपरम्पार है और वे अपने दास की लाज अवश्य रखते हैं। रचनाकार अपनी अल्प बुद्धि स्वीकार करते हुए प्रभु की शरण में स्वयं को समर्पित करता है।
श्री रामदेव चालीसा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति, विश्वास और शरणागति से असंभव भी संभव हो जाता है। श्री रामदेव जी लोकदेवता होते हुए भी विष्णु स्वरूप हैं, जो हर वर्ग के भक्तों की पुकार सुनते हैं। उनका स्मरण करने से भय, रोग, दरिद्रता और अन्याय का नाश होता है तथा जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। जो रामदेव जी की शरण में आता है, वह कभी निराश नहीं होता।
श्री रामदेव चालीसा – Shri Ramdev Chalisa
॥ दोहा ॥
श्री गुरु पद नमन करि, गिरा गनेश मनाय।
कथूं रामदेव विमल यश, सुने पाप विनशाय॥
द्वार केश से आय कर, लिया मनुज अवतार।
अजमल गेह बधावणा, जग में जय जयकार॥
॥ चौपाई ॥
जय जय रामदेव सुर राया। अजमल पुत्र अनोखी माया॥१॥
विष्णु रूप सुर नर के स्वामी। परम प्रतापी अन्तर्यामी॥२॥
ले अवतार अवनि पर आये। तंवर वंश अवतंश कहाये॥३॥
संत जनों के कारज सारे। दानव दैत्य दुष्ट संहारे॥४॥
परच्या प्रथम पिता को दीन्हा। दूध परीण्डा मांही कीन्हा॥५॥
कुमकुम पद पोली दर्शाये। ज्योंही प्रभु पलने प्रगटाये॥६॥
परचा दूजा जननी पाया। दूध उफणता चरा उठाया॥७॥
परचा तीजा पुरजन पाया। चिथड़ों का घोड़ा ही साया॥८॥
परच्या चौथा भैरव मारा। भक्त जनों का कष्ट निवारा॥९॥
पंचम परच्या रतना पाया। पुंगल जा प्रभु फंद छुड़ाया॥१०॥
परच्या छठा विजयसिंह पाया। जला नगर शरणागत आया॥११॥
परच्या सप्तम् सुगना पाया। मुवा पुत्र हंसता भग आया॥१२॥
परच्या अष्टम् बौहित पाया। जा परदेश द्रव्य बहु लाया॥१३॥
भंवर डूबती नाव उबारी। प्रगत टेर पहुँचे अवतारी॥१४॥
नवमां परच्या वीरम पाया। बनियां आ जब हाल सुनाया॥१५॥
दसवां परच्या पा बिनजारा। मिश्री बनी नमक सब खारा॥१६॥
परच्या ग्यारह किरपा थारी। नमक हुआ मिश्री फिर सारी॥१७॥
परच्या द्वादश ठोकर मारी। निकलंग नाड़ी सिरजी प्यारी॥१८॥
परच्या तेरहवां पीर परी पधारया। ल्याय कटोरा कारज सारा॥१९॥
चौदहवां परच्या जाभो पाया। निजसर जल खारा करवाया॥२०॥
परच्या पन्द्रह फिर बतलाया। राम सरोवर प्रभु खुदवाया॥२१॥
परच्या सोलह हरबू पाया। दर्श पाय अतिशय हरषाया॥२२॥
परच्या सत्रह हर जी पाया। दूध थणा बकरया के आया॥२३॥
सुखी नाडी पानी कीन्हों। आत्म ज्ञान हरजी ने दीन्हों॥२४॥
परच्या अठारहवां हाकिम पाया। सूते को धरती लुढ़काया॥२५॥
परच्या उन्नीसवां दल जी पाया। पुत्र पाय मन में हरषाया॥२६॥
परच्या बीसवां पाया सेठाणी। आये प्रभु सुन गदगद वाणी॥२७॥
तुरंत सेठ सरजीवण कीन्हा। उक्त उजागर अभय वर दीन्हा॥२८॥
परच्या इक्कीसवां चोर जो पाया। हो अन्धा करनी फल पाया॥२९॥
परच्या बाईसवां मिर्जो चीहां। सातो तवा बेध प्रभु दीन्हां॥३०॥
परच्या तेईसवां बादशाह पाया। फेर भक्त को नहीं सताया॥३१॥
परच्या चैबीसवां बख्शी पाया। मुवा पुत्र पल में उठ धाया॥३२॥
जब-जब जिसने सुमरण कीन्हां। तब-तब आ तुम दर्शन दीन्हां॥३३॥
भक्त टेर सुन आतुर धाते। चढ़ लीले पर जल्दी आते॥३४॥
जो जन प्रभु की लीला गावें। मनवांछित कारज फल पावें॥३५॥
यह चालीसा सुने सुनावे। ताके कष्ट सकल कट जावे॥३६॥
जय जय जय प्रभु लीला धारी। तेरी महिमा अपरम्पारी॥३७॥
मैं मूरख क्या गुण तब गाऊँ। कहाँ बुद्धि शारद सी लाऊँ॥३८॥
नहीं बुद्धि बल घट लव लेशा। मती अनुसार रची चालीसा॥३९॥
दास सभी शरण में तेरी। रखियों प्रभु लज्जा मेरी॥४०॥
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जय हो रामापीर! 🙏