वामन देव की आरती – सार (भावार्थ)
वामन देव की आरती भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार – वामन अवतार की दिव्य लीला, करुणा और धर्मस्थापना का सुंदर वर्णन करती है। आरती की शुरुआत “ओम जय वामन देवा” के जयघोष से होती है, जिसमें भगवान हरि को नमन करते हुए बताया गया है कि वे बली राजा के द्वार पर संत रूप में सेवा स्वीकार करते हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि ईश्वर स्वयं भक्त के द्वार पर पहुँचकर उसकी भक्ति को स्वीकार करते हैं, चाहे वह राजा ही क्यों न हो।
आरती में वामन भगवान के अनुपम ब्राह्मण रूप का अत्यंत मनोहर वर्णन मिलता है। उनके हाथ में छत्र और दंड शोभा पाते हैं, ललाट पर सुंदर तिलक है और उनका मुखमंडल भक्तों के मन को मोहित कर लेता है। उनके कर्ण-कुंडल और दिव्य भूषण उनकी अलौकिक शोभा को और बढ़ाते हैं। यह रूप सिखाता है कि सच्ची महानता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि विनम्रता और तपस्वी स्वरूप में छिपी होती है।
आरती आगे बताती है कि वेद, पुराण और शास्त्र भी इस दिव्य अवतार की महिमा गाते हैं। भगवान वामन को परम कृपालु कहा गया है, जिन्होंने बली राजा से केवल तीन पग भूमि का दान माँगा। यह प्रसंग अहंकार और दान के वास्तविक अर्थ को प्रकट करता है। जब बली ने तीन पग भूमि देने का वचन दिया, तब भगवान ने अपने विराट रूप में त्रिविक्रम अवतार धारण किया।
पहले पग में उन्होंने ब्रह्मलोक को नाप लिया, दूसरे पग में पृथ्वी और समस्त लोकों को घेर लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान न बचा, तब बली राजा ने अपना मस्तक अर्पित कर दिया। यहाँ बली का अहंकार समाप्त होता है और वह सच्चा भक्त बनकर भगवान के चरणों में समर्पित हो जाता है। यह लीला सिखाती है कि अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण ही ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।
आरती में कहा गया है कि जो भक्त चित्त से वामन देव का स्मरण और गायन करता है, उसे भगवान की कृपा से सुख, समृद्धि, वैभव और अनेक प्रकार के कल्याण प्राप्त होते हैं। वामन देव केवल दैत्यराज के अभिमान को नष्ट करने वाले ही नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा करने वाले, भक्तों के कल्याणकर्ता और कृपालु नारायण हैं।
समग्र रूप से यह आरती हमें यह संदेश देती है कि विनम्रता, दान, भक्ति और समर्पण से ही जीवन सफल होता है। भगवान वामन की कथा यह सिखाती है कि ईश्वर के सामने कोई भी बड़ा नहीं, और जो अहंकार त्यागकर शरण में आता है, वही सच्चे अर्थों में धन्य होता है। यही वामन देव की आरती का सार है—धर्म की विजय, अहंकार का नाश और भक्ति की महिमा।
वामन देव की आरती – Vaman Dev Ki Aarti
ओम जय वामन देवा, हरि जय वामन देवा।
बली राजा के द्वारे, बली राजा के द्वारे, संत करे सेवा॥
ओम जय वामन देवा॥
वामन रूप अनुपम छत्र, दंड शोभा, हरि छत्र दंड शोभा।
तिलक भाल की मनोहर भगतन मन मोहा॥
ओम जय वामन देवा॥
अगम निगम पुराण बतावे, मुख मंडल शोभा, हरि मुख मंडल शोभा।
कर्ण, कुंडल भूषण, कर्ण, कुंडल भूषण, पार पड़े सेवा॥
ओम जय वामन देवा॥
परम कृपाल जाके भूमी तीन पगा, हरि भूमि तीन पड़ा।
तीन पांव है कोई, तीन पांव है कोई बलि, अभिमान खड़ा॥
ओम जय वामन देवा॥
प्रथम पाद रखे ब्रह्मलोक में, दूजो धार धरा, हरि दूजो धार धरा।
तृतीय पाद मस्तक पे, तृतीय पाद मस्तक पे, बली अभिमान खड़ा॥
ओम जय वामन देवा॥
रूप त्रिविक्रम हारे, जो सुख में गावे, हरि जो चित से गावे।
सुख सम्पति नाना विधि, सुख सम्पति नाना विधि, हरि जी से पावे॥
ॐ जय वामन देवा हरि जय वामन देवा।