आरती श्री रामायण जी की – Aarti Shri Ramayan Ji Ki

आरती श्री रामायण जी की – – सार (भावार्थ)

आरती श्री रामायण जी की, आरती श्रीरामचरितमानस / रामायण की महिमा का भक्तिपूर्ण गुणगान है। इसमें रामायण को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि सीता-राम की कीर्ति से आलोकित, ललित और कल्याणकारी दिव्य वाणी के रूप में नमन किया गया है। आरती का मूल भाव यह है कि रामायण का स्मरण, पाठ और कीर्तन मनुष्य के जीवन को शुद्ध, संयमित और धर्ममय बनाता है।

आरती के पहले पद में बताया गया है कि ब्रह्मा, नारद, वाल्मीकि, शुक, सनकादि, शेष और शारदा (सरस्वती) जैसे दिव्य ज्ञानियों द्वारा भी रामायण की महिमा गाई जाती है। यह संकेत करता है कि रामकथा का गौरव केवल लोक में ही नहीं, बल्कि देवलोक और ज्ञान-परंपरा में भी सर्वोपरि है। साथ ही, हनुमान (पवनसुत) की कीर्ति का सुंदर उल्लेख यह दर्शाता है कि रामायण भक्ति, पराक्रम और सेवा-भाव का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करती है।

अगले पद में कहा गया है कि वेद, अठारह पुराण, छह शास्त्र और समस्त ग्रंथों का सार रामायण में समाहित है। मुनि-जन इसे जीवन का धन, संतान और सर्वस्व मानते हैं। अर्थात्, यह ग्रंथ धर्म, कर्म, भक्ति और ज्ञान—चारों पुरुषार्थों का समन्वित मार्ग दिखाता है। सरल शब्दों में, जो सत्य, मर्यादा, करुणा और कर्तव्य का निचोड़ अन्य शास्त्रों में विस्तृत रूप में मिलता है, वही रामायण में सरल, सुबोध और जीवनोपयोगी रूप में प्राप्त होता है।

तीसरे पद में बताया गया है कि शिव-पार्वती, अगस्त्य मुनि, व्यास जैसे महर्षि, तथा कागभुशुंडि और गरुड़ तक रामायण की महिमा का गान करते हैं। यह बताता है कि रामकथा पीढ़ियों, परंपराओं और विविध आध्यात्मिक धाराओं में समान श्रद्धा के साथ प्रतिष्ठित है। विभिन्न ऋषि-परंपराएँ, देव-उपासक और भक्त-समाज—सभी के लिए रामायण आस्था का साझा केंद्र है।

चौथे पद में रामायण के व्यावहारिक फल का स्पष्ट वर्णन है। इसे कलिमल (कलियुग के पाप) हरने वाली, विषय-रस को फीका करने वाली और मुक्ति-सौंदर्य से जीवन को सजाने वाली बताया गया है। यह रोग, भव-बंधन और अमंगल का नाश करती है तथा मनुष्य को आत्मिक शांति, विवेक और वैराग्य प्रदान करती है। यहाँ तुलसीदास जी की भूमिका भी निहित है—रामायण को जन-जन की भाषा में, माता-पिता समान करुणा से पोषित कर उन्होंने इसे जीवन का पथप्रदर्शक बनाया।

समापन में पुनः यही भाव पुष्ट होता है कि “आरती श्री रामायण जी की”—अर्थात् रामायण की आरती करना, उसके आदर्शों को हृदय में उतारना है। यह सीता-राम की कीर्ति से सुसज्जित वह दिव्य धरोहर है जो मन, वाणी और कर्म—तीनों को पवित्र करती है और साधक को धर्म, मर्यादा तथा भक्ति के पथ पर स्थिर करती है।

“आरती श्री रामायण जी की” हमें सिखाती है कि रामायण सभी शास्त्रों का सार, कलियुग में पाप-नाश का उपाय, और मुक्ति की ओर ले जाने वाला मार्ग है। इसका नियमित पाठ, कीर्तन और मनन विषय-आसक्ति को कम करता, रोग-शोक व भव-बंधन से मुक्ति देता और जीवन को सत्य, करुणा व कर्तव्य से सजाता है। जो भक्त श्रद्धा से रामायण की आरती करता है, वह अपने जीवन में शांति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव करता है।

आरती श्री रामायण जी की – Aarti Shri Ramayan Ji Ki

आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥

गावत ब्रहमादिक मुनि नारद ।
बाल्मीकि बिग्यान बिसारद ॥
शुक सनकादिक शेष अरु शारद ।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥

॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

गावत बेद पुरान अष्टदस ।
छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥
मुनि जन धन संतान को सरबस ।
सार अंश सम्मत सब ही की ॥

॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

गावत संतत शंभु भवानी ।
अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी ।
कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥

॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी ।
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥
दलनि रोग भव मूरि अमी की ।
तात मातु सब बिधि तुलसी की ॥

आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥


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