श्री विश्वकर्मा चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह पावन श्री विश्वकर्मा चालीसा सृष्टि के महान शिल्पकार, देवताओं के वास्तुकार और समस्त कला-विज्ञान के अधिष्ठाता भगवान विश्वकर्मा की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन करती है। प्रारंभिक दोहे में भक्त मन, वचन और कर्म से प्रभु को प्रणाम कर उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसके मनोरथ पूर्ण करें और जीवन से दुष्टता, विघ्न और बाधाएँ दूर करें।
चालीसा में बताया गया है कि विश्वकर्मा का नाम अनूप और पावन है, जो मन को शांति और सुख प्रदान करता है। उनका सुयश चारों दिशाओं में फैला हुआ है और नर-नारी नित्य उनके गुणों का गान करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सरस्वती, शेषनाग और महादेवी तक उनकी विद्या, बुद्धि और शिल्पकला की प्रशंसा करते हैं।
वे आगम, निगम, वेद, पुराण और शास्त्रों के ज्ञाता हैं, गुणों से परे होकर भी गुणों से युक्त हैं। उन्हें जगतगुरु कहा गया है क्योंकि वे संसार से अज्ञान, अंधकार और भ्रम का नाश करते हैं।
चालीसा में बताया गया है कि आदि सृष्टि से ही विश्वकर्मा अविनाशी हैं और मोक्षधाम से उतरकर उन्होंने जगत के कल्याण हेतु अवतार लिया। उन्होंने सबसे पहले संसार में शिल्प, रेखांकन और निर्माण कला की नींव रखी।
उन्होंने चौदह विधाओं को पृथ्वी पर फैलाया — जैसे लोहा, लकड़ी, तांबा, सोना, पत्थर और शिल्पकला। इनके द्वारा संसार में सुख, समृद्धि और उन्नति का प्रकाश हुआ तथा दारिद्र्य और दुख का नाश हुआ।
सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद जैसे महान मुनि भी उन्हें गुरु मानते हैं। वे देवताओं के भी देव कहे गए हैं। जो भक्त उनके हृदय में अविचल भक्ति रखता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थ सहज ही प्राप्त होते हैं।
चालीसा में प्रभु के महान निर्माण कार्यों का विस्तार से वर्णन है – उन्होंने विष्णु का चक्र, ब्रह्मा का कमंडल, शिव का त्रिशूल, इन्द्र का धनुष, पिनाक धनुष, पुष्पक विमान, वायुयान, उड़ने वाले रथ, साथ ही विद्युत, यंत्र, तंत्र और आकाशीय लोकों की रचना की।
उन्होंने सूर्य, चंद्र, नवग्रह, दिशाएँ, लोक-लोकांतर, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश तक के सिद्धांतों का ज्ञान प्रदान किया। वे ही अथर्ववेद, शिल्पशास्त्र और धनुर्वेद के मूल प्रेरणास्रोत हैं।
चालीसा में बताया गया है कि दधीचि, हरिश्चंद्र, परशुराम, नल-नील, सुचेता, रावण, राम, द्रोणाचार्य और युधिष्ठिर जैसे महान पुरुष भी किसी न किसी रूप में विश्वकर्मा परंपरा से जुड़े थे। उनके द्वारा रचित मयसभा, यंत्र-पुतलियाँ और तिलस्मी रचनाएँ आज भी उनकी अद्भुत प्रतिभा की साक्षी हैं।
अंत में कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा, विश्वास और प्रेम से श्री विश्वकर्मा चालीसा का पाठ और मनन करता है, उसके जीवन से विघ्न, विपत्ति, रोग, भय और दरिद्रता दूर हो जाती है। प्रभु उसे मोक्ष, सुख, शांति और दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं।
श्री विश्वकर्मा चालीसा यह सिखाती है कि भगवान विश्वकर्मा केवल शिल्पकार ही नहीं, बल्कि सृष्टि के रचनाकार, विज्ञान के जनक और कला के अधिपति हैं। उनकी उपासना करने से जीवन में कर्मकौशल, बुद्धि, सफलता, समृद्धि और स्थिरता आती है।
जो भक्त नियमपूर्वक श्रद्धा से इस चालीसा का पाठ करता है, उसके कार्यों में बाधाएँ दूर होती हैं, व्यापार-कर्म में उन्नति होती है और अंत में उसे मोक्ष व परम शांति की प्राप्ति होती है। भगवान विश्वकर्मा की कृपा से जीवन में निर्माण, नवाचार और सफलता का दिव्य प्रकाश सदैव बना रहता है। 🙏🛠️
श्री विश्वकर्मा चालीसा – Shri Vishwakarma Chalisa
॥ दोहा ॥
विनय करौं कर जोड़कर, मन वचन कर्म संभारि।
मोर मनोरथ पूर्ण कर, विश्वकर्मा दुष्टारि॥
॥ चौपाई ॥
विश्वकर्मा तव नाम अनूपा। पावन सुखद मनन अनरूपा॥१॥
सुंदर सुयश भुवन दशचारी। नित प्रति गावत गुण नरनारी॥२॥
शारद शेष महेश भवानी। कवि कोविद गुण ग्राहक ज्ञानी॥३॥
आगम निगम पुराण महाना। गुणातीत गुणवंत सयाना॥४॥
जग महँ जे परमारथ वादी। धर्म धुरंधर शुभ सनकादि॥५॥
नित नित गुण यश गावत तेरे। धन्य-धन्य विश्वकर्मा मेरे॥६॥
आदि सृष्टि महँ तू अविनाशी। मोक्ष धाम तजि आयो सुपासी॥७॥
जग महँ प्रथम लीक शुभ जाकी। भुवन चारि दश कीर्ति कला की॥८॥
ब्रह्मचारी आदित्य भयो जब। वेद पारंगत ऋषि भयो तब॥९॥
दर्शन शास्त्र अरु विज्ञ पुराना। कीर्ति कला इतिहास सुजाना॥१०॥
तुम आदि विश्वकर्मा कहलायो। चौदह विधा भू पर फैलायो॥११॥
लोह काष्ठ अरु ताम्र सुवर्णा। शिला शिल्प जो पंचक वर्णा॥१२॥
दे शिक्षा दुख दारिद्र नाश्यो। सुख समृद्धि जगमहँ परकाश्यो॥१३॥
सनकादिक ऋषि शिष्य तुम्हारे। ब्रह्मादिक जै मुनीश पुकारे॥१४॥
जगत गुरु इस हेतु भये तुम। तम-अज्ञान-समूह हने तुम॥१५॥
दिव्य अलौकिक गुण जाके वर। विघ्न विनाशन भय टारन कर॥१६॥
सृष्टि करन हित नाम तुम्हारा। ब्रह्मा विश्वकर्मा भय धारा॥१७॥
विष्णु अलौकिक जगरक्षक सम। शिवकल्याणदायक अति अनुपम॥१८॥
नमो नमो विश्वकर्मा देवा। सेवत सुलभ मनोरथ देवा॥१९॥
देव दनुज किन्नर गन्धर्वा। प्रणवत युगल चरण पर सर्वा॥२०॥
अविचल भक्ति हृदय बस जाके। चार पदारथ करतल जाके॥२१॥
सेवत तोहि भुवन दश चारी। पावन चरण भवोभव कारी॥२२॥
विश्वकर्मा देवन कर देवा। सेवत सुलभ अलौकिक मेवा॥२३॥
लौकिक कीर्ति कला भंडारा। दाता त्रिभुवन यश विस्तारा॥२४॥
भुवन पुत्र विश्वकर्मा तनुधरि। वेद अथर्वण तत्व मनन करि॥२५॥
अथर्ववेद अरु शिल्प शास्त्र का। धनुर्वेद सब कृत्य आपका॥२६॥
जब जब विपति बड़ी देवन पर। कष्ट हन्यो प्रभु कला सेवन कर॥२७॥
विष्णु चक्र अरु ब्रह्म कमण्डल। रूद्र शूल सब रच्यो भूमण्डल॥२८॥
इन्द्र धनुष अरु धनुष पिनाका। पुष्पक यान अलौकिक चाका॥२९॥
वायुयान मय उड़न खटोले। विधुत कला तंत्र सब खोले॥३०॥
सूर्य चंद्र नवग्रह दिग्पाला। लोक लोकान्तर व्योम पताला॥३१॥
अग्नि वायु क्षिति जल अकाशा। आविष्कार सकल परकाशा॥३२॥
मनु मय त्वष्टा शिल्पी महाना। देवागम मुनि पंथ सुजाना॥३३॥
लोक काष्ठ, शिल ताम्र सुकर्मा। स्वर्णकार मय पंचक धर्मा॥३४॥
शिव दधीचि हरिश्चंद्र भुआरा। कृत युग शिक्षा पालेऊ सारा॥३५॥
परशुराम, नल, नील, सुचेता। रावण, राम शिष्य सब त्रेता॥३६॥
ध्वापर द्रोणाचार्य हुलासा। विश्वकर्मा कुल कीन्ह प्रकाशा॥३७॥
मयकृत शिल्प युधिष्ठिर पायेऊ। विश्वकर्मा चरणन चित ध्यायेऊ॥३८॥
नाना विधि तिलस्मी करि लेखा। विक्रम पुतली दॄश्य अलेखा॥३९॥
वर्णातीत अकथ गुण सारा। नमो नमो भय टारन हारा॥४०॥
॥ दोहा ॥
दिव्य ज्योति दिव्यांश प्रभु, दिव्य ज्ञान प्रकाश।
दिव्य दॄष्टि तिहुँ, कालमहँ विश्वकर्मा प्रभास॥
विनय करो करि जोरि, युग पावन सुयश तुम्हार।
धारि हिय भावत रहे, होय कृपा उद्गार॥
॥ छन्द ॥
जे नर सप्रेम विराग श्रद्धा, सहित पढ़िहहि सुनि है।
विश्वास करि चालीसा चोपाई, मनन करि गुनि है॥
भव फंद विघ्नों से उसे, प्रभु विश्वकर्मा दूर कर।
मोक्ष सुख देंगे अवश्य ही, कष्ट विपदा चूर कर॥
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