कालरात्रि माता की आरती – Kalratri Mata Ki Aarti

कालरात्रि माता की आरती का – सार (भावार्थ)

यह कालरात्रि माता की आरती माँ के उग्र किंतु करुणामयी स्वरूप का भावपूर्ण गुणगान है। इस आरती का सार भक्त को यह समझाता है कि माँ कालरात्रि केवल संहार की देवी नहीं, बल्कि भय, रोग, शोक और अधर्म से रक्षा करने वाली परम शक्ति हैं।

आरती की शुरुआत में माँ कालरात्रि को महाकाली कहकर संबोधित किया गया है, जो स्वयं काल के मुख से भक्तों की रक्षा करती हैं। इसका भाव यह है कि माँ अपने शरणागत को मृत्यु, भय और अनिष्ट शक्तियों से बचाकर जीवन में सुरक्षा और साहस प्रदान करती हैं। उनका नाम ही दुष्टों का नाश करने वाला है और महाचण्डी के रूप में उनका अवतार अधर्म के विनाश का प्रतीक है।

आरती में यह भी बताया गया है कि माँ का प्रभाव पृथ्वी से लेकर आकाश तक व्याप्त है। सम्पूर्ण सृष्टि में उनकी शक्ति का विस्तार है और कोई भी स्थान ऐसा नहीं जहाँ उनकी महिमा न हो। खड्ग और खप्पर धारण करने वाली माँ कालरात्रि दुष्ट शक्तियों के अंत का प्रतीक हैं, जिससे यह संदेश मिलता है कि अधर्म, अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है।

कलकत्ता (कालीघाट) को उनका प्रमुख धाम बताया गया है, परंतु भाव यह है कि माँ हर स्थान पर विद्यमान हैं और भक्त उन्हें हर रूप में अनुभव कर सकता है। देवता, मनुष्य, स्त्री-पुरुष सभी उनकी स्तुति करते हैं, क्योंकि उनकी कृपा से ही संसार में संतुलन बना रहता है।

आरती में माँ को रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा भी कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि वे एक ओर दुष्टों का संहार करती हैं और दूसरी ओर भक्तों का पालन-पोषण भी करती हैं। उनकी कृपा से रोग, चिंता, भय, दुःख और बड़े से बड़े संकट समाप्त हो जाते हैं। जिस पर माँ महाकाली की कृपा छाया बनी रहती है, उसके जीवन में कोई भी कष्ट टिक नहीं पाता।

अंत में आरती भक्त को प्रेम और श्रद्धा के साथ माँ कालरात्रि की जय बोलने का संदेश देती है। यह आरती हमें सिखाती है कि माँ का उग्र स्वरूप भी मूलतः रक्षा, करुणा और कल्याण के लिए है। सच्चे मन से की गई भक्ति से माँ कालरात्रि जीवन को निर्भय, शक्तिशाली और मंगलमय बना देती हैं।

कालरात्रि माता की आरती – Kalratri Mata Ki Aarti

कालरात्रि जय जय महाकाली।
काल के मुँह से बचाने वाली॥१॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा।
महाचण्डी तेरा अवतारा॥२॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा।
महाकाली है तेरा पसारा॥३॥

खड्ग खप्पर रखने वाली।
दुष्टों का लहू चखने वाली॥४॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा।
सब जगह देखूँ तेरा नजारा॥५॥

सभी देवता सब नर-नारी।
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥६॥

रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा।
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥७॥

ना कोई चिन्ता रहे ना बीमारी।
ना कोई गम ना संकट भारी॥८॥

उस पर कभी कष्ट ना आवे।
महाकाली माँ जिसे बचावे॥९॥

तू भी भक्त प्रेम से कह।
कालरात्रि माँ तेरी जय॥१०॥


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