श्री विष्णु चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ
यह पावन श्री विष्णु चालीसा भगवान श्रीहरि विष्णु के करुणामय स्वरूप, उनकी दिव्य शक्तियों, दशावतार लीलाओं, भक्त-वत्सलता तथा संसार-सागर से उद्धार करने वाली कृपा का अत्यंत सुंदर और विस्तारपूर्वक वर्णन करती है। प्रारंभिक दोहे में भक्त भगवान से विनयपूर्वक प्रार्थना करता है कि वे अपने सेवक की पुकार सुनें और उसे ज्ञान तथा भक्ति का मार्ग दिखाएँ।
चौपाइयों के आरंभ में भगवान को “नमो विष्णु भगवान खरारी” कहकर नमन किया गया है। वे सभी कष्टों का नाश करने वाले, संपूर्ण जगत में व्याप्त शक्ति के अधिपति और त्रिलोकी को प्रकाशित करने वाले दिव्य तेज के स्वामी हैं। उनका सुंदर, मनोहर और सरल स्वरूप, पीताम्बर धारण किए हुए देह, तथा बैजन्ती माला से सुसज्जित छवि भक्त के मन को मोहित कर लेती है।
उनके हाथों में विराजमान शंख, चक्र और गदा को देखकर दैत्य और असुर भयभीत होकर भाग जाते हैं। वे सत्य, धर्म, करुणा और संयम के प्रतीक हैं, जिनमें काम, क्रोध, लोभ और अहंकार का लेशमात्र भी नहीं। वे संतों और भक्तों के हृदय को आनंद देने वाले, तथा दुष्टों का संहार करने वाले धर्मरक्षक हैं।
चालीसा में भगवान की दशावतार लीलाओं का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन मिलता है। जब धरती और धर्म संकट में पड़े, तब प्रभु ने अनेक रूप धारण किए — राम अवतार में रावण का वध कर धरती का भार उतारा, वराह अवतार में हिरण्याक्ष का संहार कर पृथ्वी को बचाया, मत्स्य अवतार में समुद्र से चौदह रत्नों को बाहर निकाला, मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पान कराया और असुरों को छल से वंचित किया, कूर्म अवतार में मंदराचल पर्वत को धारण कर समुद्र मंथन सफल कराया।
इसके साथ ही भस्मासुर, जलंधर, तथा अन्य दैत्यों के वध की कथाएँ प्रभु की बुद्धि, लीला और न्यायप्रियता को दर्शाती हैं। उन्होंने प्रह्लाद और ध्रुव जैसे महान भक्तों की रक्षा की, तथा अजामिल और गणिका जैसे पापियों का भी उद्धार कर यह सिद्ध किया कि भगवान की कृपा सबके लिए समान है।
चालीसा के मध्य भाग में भक्त अपनी दीनता और अज्ञान स्वीकार करता है। वह कहता है कि उसे न तो जप-तप, न व्रत-पूजन, न ही विधिपूर्वक स्तुति का ज्ञान है। फिर भी वह भगवान से केवल दर्शन, दया और चरणदास बनने का वरदान माँगता है। यह भाव दर्शाता है कि भगवान को कर्म से अधिक भक्ति और सच्चा हृदय प्रिय है।
अंतिम चौपाइयों में भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसके पाप, दोष, संताप और भवबंधन का नाश करें, उसे संतान, संपत्ति, सुख और शांति प्रदान करें तथा अपने पावन चरणों का दास बना लें। कहा गया है कि जो श्रद्धा से इस विष्णु चालीसा का पाठ या श्रवण करता है, वह संसार के दुःखों से मुक्त होकर परम सुख प्राप्त करता है।
समापन में यह स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति नियमपूर्वक श्री विष्णु चालीसा का पाठ करता है, उसे भगवान की विशेष कृपा, भवसागर से मुक्ति, और अंततः परम गति वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।
श्री विष्णु चालीसा – Shri Vishnu Chalisa
॥ दोहा ॥
विष्णु सुनिए विनय, सेवक की चितलाय।
कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥
॥ चौपाई ॥
नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
तन पर पीताम्बर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥
शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
सन्तभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥
धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥
भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥
आप वाराह रूप बनाया। हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥
अमिलख असुरन द्वन्द मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥
देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छबि से बहलाया॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया। मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥
वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥
असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥
सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥
तुमने धुरू प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥
गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
देखहुँ मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥
जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥
करहुँ आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
करहुँ प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
सुर मुनि करत सदा सिवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥
दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥
पाप दोष संताप नशाओ। भव बन्धन से मुक्त कराओ॥
सुत सम्पति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥
निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
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