श्री ब्रह्मा चालीसा- Shri Brahma Chalisa

श्री ब्रह्मा चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ

यह पावन श्री ब्रह्मा चालीसा सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी की महिमा, स्वरूप, सृष्टि-रचना की कथा, त्रिदेवों का रहस्य तथा अहंकार से मुक्ति का दिव्य उपदेश अत्यंत सुंदर और विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करती है। प्रारंभिक दोहों में भक्त भगवान स्वयंभू ब्रह्मा से करुणा की प्रार्थना करता है और उन्हें ब्रह्माण्ड के स्रष्टा, विधाता और विश्वविधाता कहकर नमन करता है।

चौपाइयों के आरंभ में ब्रह्मा जी को “कमलासन जगमूला” कहा गया है – अर्थात् वे कमल पर विराजमान, समस्त जगत के मूल कारण हैं। उनका स्वरूप चतुर्भुज, चार मुखों वाला (चतुरानन), रक्तवर्ण शरीर, जटाजूट, मुकुट, श्वेत दाढ़ी, श्वेत वस्त्र और यज्ञोपवीत से सुशोभित बताया गया है। उनके कुंडल, मोतियों की माला और दिव्य आभूषण उनकी महिमा को और बढ़ाते हैं।

ब्रह्मा जी को चारों वेदों का प्राकट्यकर्ता कहा गया है, जिन्होंने सम्पूर्ण त्रिलोकी को दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया। उनका लोक ब्रह्मलोक अत्यंत पवित्र और यशस्वी बताया गया है। उनकी अर्धांगिनी सावित्री (गायत्री माता) हैं और पुत्री सरस्वती देवी, जो वीणा वादिनी और विद्या की अधिष्ठात्री हैं।

इसके बाद सृष्टि-रचना का गूढ़ रहस्य बताया गया है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन कर रहे थे, तभी उनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, और उसी कमल पर ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मा जी को मोह और भ्रम हो गया कि वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। उन्होंने कमलनाल के मूल को खोजने का प्रयास किया, परंतु असंख्य वर्षों तक खोजने पर भी अंत न पा सके

तब उन्हें आकाशवाणी द्वारा यह बोध हुआ कि परब्रह्म ही अनादि, अलख और सर्वशक्तिमान हैं, और उनकी इच्छा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्राकट्य हुआ है। इस प्रकार त्रिदेवों का कार्य विभाजन बताया गया – ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं, और शिव संहार करते हैं

फिर ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के दर्शन के लिए क्षीरसागर में गए। वहाँ उन्होंने श्यामवर्ण, चतुर्भुज, किरीटधारी, शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए श्रीहरि को शेषनाग शय्या पर विराजमान देखा। भगवान विष्णु ने उन्हें समझाया कि वे तीनों परब्रह्म के ही साकार रूप हैं और सब मिलकर ब्रह्म की सेवा करते हैं। यह सुनकर ब्रह्मा जी का अहंकार नष्ट हो गया और उन्होंने परब्रह्म की महिमा का गान किया।

इसके बाद बताया गया है कि ब्रह्मा जी ने जड़-चेतन समस्त सृष्टि की रचना की, अनेक बार अवतार लिए और उनका यश सम्पूर्ण जगत में फैल गयादेव, दानव और मनुष्य सभी उनकी उपासना करते हैं और उनसे मनवांछित फल प्राप्त करते हैं।

चालीसा के अंत में पुष्कर तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है, जहाँ ब्रह्मा जी सदा निवास करते हैं। जो भक्त वहाँ स्नान और पूजन करता है, उसके सभी दोष, पाप और बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं और उसे सुख, शांति तथा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार श्री ब्रह्मा चालीसा यह सिखाती है कि भगवान ब्रह्मा केवल सृष्टि के रचयिता ही नहीं, बल्कि वे हमें अहंकार त्याग, ज्ञान प्राप्ति और परब्रह्म की शरण का मार्ग भी दिखाते हैं। जो भक्त श्रद्धा से इस चालीसा का पाठ करता है, उसका जीवन पवित्र, सफल और कल्याणमय बन जाता है।

श्री ब्रह्मा चालीसा- Shri Brahma Chalisa

॥ दोहा ॥

जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल।
करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल॥

तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि घाता नाम।
विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम॥

॥ चौपाई ॥

जय जय कमलासान जगमूला। रहहु सदा जनपै अनुकूला॥१॥
रुप चतुर्भुज परम सुहावन। तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन॥२॥

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरा। मस्तक जटाजुट गंभीरा॥३॥
ताके ऊपर मुकुट बिराजै। दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै॥४॥

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर। है यज्ञोपवीत अति मनहर॥५॥
कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं। गल मोतिन की माला राजहिं॥६॥

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये। दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये॥७॥
ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा। अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा॥८॥

अर्द्धांगिनि तव है सावित्री। अपर नाम हिये गायत्री॥९॥
सरस्वती तब सुता मनोहर। वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर॥१०॥

कमलासन पर रहे बिराजे। तुम हरिभक्ति साज सब साजे॥११॥
क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा। नाभि कमल भो प्रगट अनूपा॥१२॥

तेहि पर तुम आसीन कृपाला। सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥१३॥
एक बार की कथा प्रचारी। तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी॥१४॥

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा। और न कोउ अहै संसारा॥१५॥
तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा। अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा॥१६॥

कोटिक वर्ष गये यहि भांती। भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती॥१७॥
पै तुम ताकर अन्त न पाये। ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये॥१८॥

पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा। महापघ यह अति प्राचीन॥१९॥
याको जन्म भयो को कारन। तबहीं मोहि करयो यह धारन॥२०॥

अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं। सब कुछ अहै निहित मो माहीं॥२१॥
यह निश्चय करि गरब बढ़ायो। निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये॥२२॥

गगन गिरा तब भई गंभीरा। ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा॥२३॥
सकल सृष्टि कर स्वामी जोई। ब्रह्म अनादि अलख है सोई॥२४॥

निज इच्छा इन सब निरमाये। ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये॥२५॥
सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा। सब जग इनकी करिहै सेवा॥२६॥

महापघ जो तुम्हरो आसन। ता पै अहै विष्णु को शासन॥२७॥
विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई। तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई॥२८॥

भैतहू जाई विष्णु हितमानी। यह कहि बन्द भई नभवानी॥२९॥
ताहि श्रवण कहि अचरज माना। पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना॥३०॥

कमल नाल धरि नीचे आवा। तहां विष्णु के दर्शन पावा॥३१॥
शयन करत देखे सुरभूपा। श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा॥३२॥

सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर। क्रीटमुकट राजत मस्तक पर॥३३॥
गल बैजन्ती माल बिराजै। कोटि सूर्य की शोभा लाजै॥३४॥

शंख चक्र अरु गदा मनोहर। शेष नाग शय्या अति मनहर॥३५॥
दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू। हर्षित भे श्रीपति सुख धामू॥३६॥

बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन। तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन॥३७॥
ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना। ब्रह्मारुप हम दोउ समाना॥३८॥

तीजे श्री शिवशंकर आहीं। ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही॥३९॥
तुम सों होई सृष्टि विस्तारा। हम पालन करिहैं संसारा॥४०॥

शिव संहार करहिं सब केरा। हम तीनहुं कहँ काज धनेरा॥४१॥
अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु। निराकार तिनकहँ तुम जानहु॥४२॥

हम साकार रुप त्रयदेवा। करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा॥४३॥
यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये। परब्रह्म के यश अति गाये॥४४॥

सो सब विदित वेद के नामा। मुक्ति रुप सो परम ललामा॥४५॥
यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा। पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा॥४६॥

नाम पितामह सुन्दर पायेउ। जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ॥४७॥
लीन्ह अनेक बार अवतारा। सुन्दर सुयश जगत विस्तारा॥४८॥

देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं। मनवांछित तुम सन सब पावहिं॥४९॥
जो कोउ ध्यान धरै नर नारी। ताकी आस पुजावहु सारी॥५०॥

पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई। तहँ तुम बसहु सदा सुरराई॥५१॥
कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन। ता कर दूर होई सब दूषण॥५२॥


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