श्री नृसिंह चालीसा – Shri Narsingh Chalisa

श्री नृसिंह चालीसा का विस्तृत सार एवं भावार्थ

श्री नृसिंह चालीसा का यह सार भगवान नृसिंह के दिव्य अवतार, उनके उग्र-करुणामय स्वरूप और भक्त-रक्षा की महिमा को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर पृथ्वी का भार हरण किया और भक्तों के कष्ट दूर किए। चालीसा में उनके सिंह सदृश दिव्य शरीर, पवित्र नाम और स्मरण-मात्र से सभी कार्य पूर्ण होने की शक्ति का वर्णन है। भक्त भगवान से धन, बल, विद्या और दान-वृत्ति की कामना करता है, क्योंकि नरसिंह देव कृपालु, भक्तों के पालनहार और महाकाल के भी काल हैं।

हिरण्यकशिपु के अहंकार और अत्याचार से धरती व्याकुल हो उठी थी, पर उसका पुत्र भक्त प्रह्लाद विष्णु-भक्ति में अडिग रहा। पिता द्वारा दिए गए अस्त्र-शस्त्र, अग्नि-दाह और भयंकर यातनाएँ भी प्रह्लाद का बाल बाँका न कर सकीं। तभी भक्त-रक्षा हेतु भगवान ने खम्भे को फाड़कर प्रकट होकर अद्भुत नृसिंह रूप धारण किया। उनका शरीर तप्त स्वर्ण समान तेजस्वी, ऊर्ध्व केश, भयानक नख-दन्त, चतुर्भुज रूप, स्वर्ण मुकुट और कुण्डलों से सुशोभित बताया गया है। क्षण-मात्र में उन्होंने हिरण्यकशिपु का संहार कर धर्म की स्थापना की और प्रह्लाद के प्राणों की रक्षा की।

चालीसा में कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र तथा समस्त वेद-पुराण भगवान नरसिंह की महिमा का गान करते हैं। जो व्यक्ति नरसिंह नाम का ध्यान करता है, उसका सदा कल्याण होता है और भव-बंधन कट जाते हैं। नित्य जप से दुःख, रोग और व्याधि नष्ट होते हैं। सन्तान-हीन, बन्ध्या, दरिद्र या संकटग्रस्त व्यक्ति यदि श्रद्धा से जाप करे, तो उसे मनवांछित फल, सन्तान-सुख, धन-समृद्धि और जीवन-सुरक्षा प्राप्त होती है।

नरसिंह चालीसा का पाठ डाकिनी-शाकिनी, प्रेत-पिशाच, ग्रह-दोष, यम-भय, नज़र-दोष और भय-बाधाओं से रक्षा करता है। रोगी के लिए यह पाठ काया को कंचन समान स्वस्थ करता है और रोग-शोक दूर करता है। जो भक्त नियमित पाठ करता है, वह भगवान का प्रिय बनता है; उसके घर में आनन्द, शान्ति और वैभव का वास होता है। मंदिर-निर्माण या धर्म-सेवा करने वाले को लोक-सम्मान प्राप्त होता है। चालीसा पढ़ने-पढ़ाने से दुःख-दरिद्रता पास नहीं आती और साधारण जन भी उन्नति प्राप्त करता है।

श्री नृसिंह चालीसा केवल स्तुति नहीं, बल्कि भय-नाश, भक्त-रक्षा, धर्म-स्थापना और आत्मिक बल का शक्तिशाली माध्यम है। जो भक्त प्रेम, श्रद्धा और विश्वास से इसका पाठ करता है, उसके जीवन से अंधकार, भय और कष्ट दूर होते हैं तथा घर में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और वैभव निरंतर बढ़ता है। भगवान नरसिंह की कृपा से भक्त का जीवन सुरक्षित, सशक्त और मंगलमय बनता है।

श्री नृसिंह चालीसा – Shri Narsingh Chalisa

॥ दोहा ॥

मास वैशाख कृतिका युत, हरण मही को भार।
शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन, लियो नरसिंह अवतार॥

धन्य तुम्हारो सिंह तनु, धन्य तुम्हारो नाम।
तुमरे सुमरन से प्रभु, पूरन हो सब काम॥

॥ चौपाई ॥

नरसिंह देव मैं सुमरों तोहि। धन बल विद्या दान दे मोहि॥१॥
जय जय नरसिंह कृपाला। करो सदा भक्तन प्रतिपाला॥२॥

विष्णु के अवतार दयाला। महाकाल कालन को काला॥३॥
नाम अनेक तुम्हारो बखानो। अल्प बुद्धि मैं ना कछु जानों॥४॥

हिरणाकुश नृप अति अभिमानी। तेहि के भार मही अकुलानी॥५॥
हिरणाकुश कयाधू के जाये। नाम भक्त प्रहलाद कहाये॥६॥

भक्त बना बिष्णु को दासा। पिता कियो मारन परसाया॥७॥
अस्त्र-शस्त्र मारे भुज दण्डा। अग्निदाह कियो प्रचण्डा॥८॥

भक्त हेतु तुम लियो अवतारा। दुष्ट-दलन हरण महिभारा॥९॥
तुम भक्तन के भक्त तुम्हारे। प्रह्लाद के प्राण पियारे॥१०॥

प्रगट भये फाड़कर तुम खम्भा। देख दुष्ट-दल भये अचम्भा॥११॥
खड्ग जिह्व तनु सुन्दर साजा। ऊर्ध्व केश महादष्ट्र विराजा॥१२॥

तप्त स्वर्ण सम बदन तुम्हारा। को वरने तुम्हरों विस्तारा॥१३॥
रूप चतुर्भुज बदन विशाला। नख जिह्वा है अति विकराला॥१४॥

स्वर्ण मुकुट बदन अति भारी। कानन कुण्डल की छवि न्यारी॥१५॥
भक्त प्रहलाद को तुमने उबारा। हिरणा कुश खल क्षण मह मारा॥१६॥

ब्रह्मा, बिष्णु तुम्हे नित ध्यावे। इन्द्र महेश सदा मन लावे॥१७॥
वेद पुराण तुम्हरो यश गावे। शेष शारदा पारन पावे॥१८॥

जो नर धरो तुम्हरो ध्याना। ताको होय सदा कल्याना॥१९॥
त्राहि-त्राहि प्रभु दुःख निवारो। भव बन्धन प्रभु आप ही टारो॥२०॥

नित्य जपे जो नाम तिहारा। दुःख व्याधि हो निस्तारा॥२१॥
सन्तान-हीन जो जाप कराये। मन इच्छित सो नर सुत पावे॥२२॥

बन्ध्या नारी सुसन्तान को पावे। नर दरिद्र धनी होई जावे॥२३॥
जो नरसिंह का जाप करावे। ताहि विपत्ति सपनें नही आवे॥२४॥

जो कामना करे मन माही। सब निश्चय सो सिद्ध हुयी जाही॥२५॥
जीवन मैं जो कछु सङ्कट होयी। निश्चय नरसिंह सुमरे सोयी॥२६॥

रोग ग्रसित जो ध्यावे कोई। ताकि काया कञ्चन होई॥२७॥
डाकिनी-शाकिनी प्रेत बेताला। ग्रह-व्याधि अरु यम विकराला॥२८॥

प्रेत पिशाच सबे भय खाये। यम के दूत निकट नहीं आवे॥२९॥
सुमर नाम व्याधि सब भागे। रोग-शोक कबहूँ नही लागे॥३०॥

जाको नजर दोष हो भाई। सो नरसिंह चालीसा गाई॥३१॥
हटे नजर होवे कल्याना। बचन सत्य साखी भगवाना॥३२॥

जो नर ध्यान तुम्हारो लावे। सो नर मन वाञ्छित फल पावे॥३३॥
बनवाये जो मन्दिर ज्ञानी। हो जावे वह नर जग मानी॥३४॥

नित-प्रति पाठ करे इक बारा। सो नर रहे तुम्हारा प्यारा॥३५॥
नरसिंह चालीसा जो जन गावे। दुःख दरिद्र ताके निकट न आवे॥३६॥

चालीसा जो नर पढ़े-पढ़ावे। सो नर जग में सब कुछ पावे॥३७॥
यह श्री नरसिंह चालीसा। पढ़े रङ्क होवे अवनीसा॥३८॥

जो ध्यावे सो नर सुख पावे। तोही विमुख बहु दुःख उठावे॥३९॥
शिव स्वरूप है शरण तुम्हारी। हरो नाथ सब विपत्ति हमारी॥४०॥

॥ दोहा ॥

चारों युग गायें तेरी, महिमा अपरम्पार।
निज भक्तनु के प्राण हित, लियो जगत अवतार॥

नरसिंह चालीसा जो पढ़े, प्रेम मगन शत बार।
उस घर आनन्द रहे, वैभव बढ़े अपार॥


यदि यह श्री नृसिंह चालीसा का सार आपको भावपूर्ण और लाभकारी लगा हो, तो कृपया कमेंट करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करें, इसे अपने परिवार व मित्रों के साथ अवश्य शेयर करें, और ऐसे ही धार्मिक व आध्यात्मिक लेखों के लिए हमारे प्लेटफ़ॉर्म को सब्सक्राइब / फॉलो करना न भूलें
आपका सहयोग हमें सनातन ज्ञान को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है।

Leave a Comment