मलमास (अधिक मास / पुरुषोत्तम मास) : तिथि, नियम, लाभ और व्रत विधि

1. प्रस्तावना – मलमास (अधिक मास) क्या है? तीन नाम, एक अद्भुत महीना

‘मलमास’ शब्द सुनते ही मन में अजीब-सी उलझन होती है – मल यानी गंदा, अशुद्ध और मास यानी महीना? यानी गंदा महीना? यह वह समय है जब शुभ कार्यों पर रोक होती है। कोई शादी नहीं होती, कोई गृह प्रवेश नहीं होता, नया कार्य शुरू नहीं किया जाता । लेकिन क्या सच में यह महीना केवल ‘गंदा’ है? नहीं, इसका दूसरा नाम सुनिए – ‘पुरुषोत्तम मास’ । वही महीना जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपना नाम देकर सबसे श्रेष्ठ घोषित कर दिया । आइए, इस रहस्यमयी और अद्भुत महीने को विस्तार से समझते हैं।

तीन नाम, तीन अर्थ – एक ही महीना

हिंदू पंचांग के इस अनोखे महीने के तीन प्रचलित नाम हैं, और हर नाम एक अलग पहलू को दर्शाता है :

नाम शाब्दिक अर्थ क्यों कहलाता है?
मलमास मल (गंदा/अशुद्ध) + मास (महीना) शुभ मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित होने के कारण इसे ‘अशुद्ध’ माना जाता था
अधिक मास अतिरिक्त महीना चंद्र और सौर कैलेंडर के अंतर को समायोजित करने के लिए हर 2-3 वर्ष में आने वाला 13वाँ महीना
पुरुषोत्तम मास ‘पुरुषोत्तम’ (भगवान विष्णु/कृष्ण) का महीना भगवान विष्णु ने स्वयं इस महीने को अपना नाम देकर इसे सर्वश्रेष्ठ बना दिया

‘अधिक मास’ की पहचान: जिस महीने में सूर्य संक्रांति (सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश) नहीं होती, वह अधिक मास कहलाता है । सूर्य हर महीने राशि बदलता है, लेकिन अधिक मास के दौरान वह किसी नई राशि में प्रवेश नहीं करता – इसीलिए इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता ।

2026 का विशेष अधिक मास – ज्येष्ठ अधिक मास

विक्रम संवत् 2083 (जो मार्च 2026 से शुरू होगा) में यह अधिक मास ज्येष्ठ मास में पड़ रहा है। इसे ‘ज्येष्ठ अधिक मास’ कहा जाएगा। इस दुर्लभ खगोलीय घटना के कारण वर्ष 2026 में कुल 13 महीने होंगे – एक अत्यंत दुर्लभ संयोग ।

2026 में दो ज्येष्ठ मास होंगे:

  • ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास): 17 मई 2026 से 15 जून 2026 तक

  • नियमित ज्येष्ठ मास: इसके तुरंत बाद (लगभग 22 मई से 29 जून तक, तिथियों के अंतर के साथ)

इस अद्वितीय संयोग के कारण इस वर्ष कई त्योहार 15-20 दिन विलंबित होंगे ।

2. अधिक मास क्यों आता है? – वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय कारण

अक्सर मन में प्रश्न आता है कि आखिर हर दो-तीन वर्ष में एक अतिरिक्त महीना क्यों आता है? क्या यह सिर्फ धार्मिक मान्यता है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक तर्क भी है? उत्तर है – यह पूर्णतः खगोलीय और गणितीय आवश्यकता है । आइए, इसे सरल भाषा में समझते हैं।

अधिक मास क्यों आता है – वैज्ञानिक एवं ज्योतिषीय कारण

चंद्र वर्ष बनाम सौर वर्ष – 11 दिन का अंतर

हमारे हिंदू पंचांग की गणना चंद्र और सौर दोनों गतियों पर आधारित है। चंद्र मास चंद्रमा की कलाओं (अमावस्या से पूर्णिमा तक) पर आधारित होता है, जबकि सौर मास सूर्य की राशियों में गति पर। यहाँ समस्या यह है कि ये दोनों माप एक-दूसरे से मेल नहीं खाते :

माप अवधि विशेषता
चंद्र वर्ष (12 चंद्र मास) लगभग 354 दिन चंद्रमा की कलाओं पर आधारित
सौर वर्ष (पृथ्वी की सूर्य परिक्रमा) लगभग 365 दिन ऋतुओं और संक्रांतियों पर आधारित
अंतर 11 दिन प्रति वर्ष यह अंतर ही ‘एपैक्ट’ (Epact) कहलाता है

🤔 गणित समझें: जैसे शाकाहारी थाली में सब्जी और दाल अलग-अलग होती है, वैसे ही चंद्र वर्ष छोटा है और सौर वर्ष बड़ा है। इनके बीच हर साल 11 दिन का फर्क पड़ जाता है ।

तीन वर्षों में बनता है एक पूरा महीना

यह 11 दिन का अंतर किसी एक वर्ष में तो बहुत कम लगता है, लेकिन जमा होते-होते यह बड़ा हो जाता है:

  • एक वर्ष में अंतर: 11 दिन

  • तीन वर्षों में कुल अंतर: 11 × 3 = 33 दिन (यानी लगभग एक पूरा महीना)

जब यह अंतर लगभग 32-33 दिन (एक चंद्र मास के बराबर) हो जाता है, तो हिंदू पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है। इसे ही ‘अधिक मास’ कहते हैं । यह लगभग हर 32.5 चंद्र मासों में (लगभग ढाई वर्ष) आता है ।

💡 सरल उदाहरण: कल्पना कीजिए कि आपके पास दो घड़ियाँ हैं। एक चंद्रमा के हिसाब से चलती है (थोड़ी धीमी), दूसरी सूर्य के हिसाब से (थोड़ी तेज़)। हर साल तेज़ घड़ी 11 दिन आगे निकल जाती है। तीन साल बाद यह अंतर लगभग 33 दिन (एक महीना) हो जाता है। तब हम यह सुनिश्चित करने के लिए कि धीमी घड़ी पीछे न रह जाए, एक अतिरिक्त महीना जोड़ देते हैं। यही अधिक मास है। यह सुनिश्चित करता है कि हमारे त्योहार, उपवास और ऋतुएँ एक जैसी बनी रहें ।

सूर्य संक्रांति – अधिक मास की पहचान

अधिक मास की सबसे पहचान यह है कि इस महीने में कोई सूर्य संक्रांति (Surya Sankranti) नहीं होती । सूर्य संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश। सामान्यतः हर महीने सूर्य एक नई राशि में प्रवेश करता है, लेकिन अधिक मास के दौरान पूरे महीने सूर्य एक ही राशि में रहता है । इसीलिए इसे ‘असंक्रांत मास’ भी कहते हैं।

जिस महीने में सूर्य राशि परिवर्तन नहीं करता, वह अधिक मास कहलाता है। यह ज्योतिषीय मानदंड इस महीने को ‘अतिरिक्त’ बनाने का कारण है।

2026 का विशेष संयोग – ज्येष्ठ अधिक मास

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, यह अद्वितीय अतिरिक्त महीना विक्रम संवत् 2083 में ज्येष्ठ महीने में पड़ रहा है – इसे ‘ज्येष्ठ अधिक मास’ कहा जाएगा ।

पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) 2026 – महत्वपूर्ण तिथियाँ:

घटना तिथि दिन
अधिक मास प्रारंभ 17 मई 2026 रविवार (ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा)
अधिक मास समापन 15 जून 2026 सोमवार (ज्येष्ठ अमावस्या)

दुर्लभ संयोग: इस वर्ष ज्येष्ठ मास 60 दिनों का होगा – पहले 30 दिन अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) और अगले 30 दिन नियमित ज्येष्ठ मास । ऐसा संयोग लगभग तीन वर्षों में एक बार बनता है। इस अवधि में दो संक्रांति, दो पूर्णिमा और दो अमावस्या होंगी।

अधिक मास – विज्ञान और आध्यात्म का अद्भुत संगम

अतः, अधिक मास कोई यादृच्छिक या केवल धार्मिक परिकल्पना नहीं है। यह प्राचीन ऋषियों की गहन खगोलीय समझ का परिणाम है। उन्होंने सहस्रों वर्ष पहले चंद्र और सौर मापों के बीच के अंतर को पहचान लिया था और इस अंतर को समायोजित करने के लिए अधिक मास की अवधारणा विकसित की ।

विज्ञान आध्यात्म
चंद्र-सौर अंतर (11 दिन/वर्ष) ‘मलमास’ – शुभ कार्यों हेतु वर्जित
3 वर्ष में 33 दिन (1 मास) ‘पुरुषोत्तम मास’ – स्वयं श्रीहरि द्वारा पवित्र किया गया
Sun stays in one zodiac the whole month भक्ति, दान, व्रत, पुराण पाठ का महाफलदायी समय

3. ‘मलमास’ से ‘पुरुषोत्तम मास’ तक – अद्भुत पौराणिक कथा

एक ही महीने के तीन नाम हैं – मलमासअधिक मासपुरुषोत्तम मास। पहला नाम ‘अपमान’ की कहानी कहता है, तो आखिरी नाम ‘गौरव’ की। आइए, जानते हैं वह दो अद्भुत कथाएँ जो बताती हैं कि कैसे उपेक्षित ‘मलमास’ स्वयं भगवान द्वारा सर्वश्रेष्ठ ‘पुरुषोत्तम मास’ बन गया।

कथा 1: मलमास की व्यथा और भगवान श्रीकृष्ण का वरदान

‘मलमास’ से ‘पुरुषोत्तम मास’ तक – अद्भुत पौराणिक कथा

जब 13वें महीने का कोई स्वामी नहीं था

हिंदू पंचांग के बारह महीनों के अलग-अलग अधिपति देवता होते हैं  – चैत्र के स्वामी ब्रह्मा जी, वैशाख के विष्णु जी, माघ के श्रीहरि, इत्यादि। लेकिन अधिक मास (13वाँ महीना) का कोई स्थायी अधिपति नहीं था ।

इस कारण उसकी सर्वत्र निंदा होने लगी। ब्राह्मण और देवता उसे ‘मलमास’ (गंदा महीना) कहकर पुकारते , शुभ कार्यों के लिए उसका बहिष्कार किया जाता था। लोग उससे दूर भागते थे ।

मलमास की करुण पुकार, भगवान विष्णु की दया

बार-बार अपमानित होकर मलमास अत्यंत दुःखी हुआ। वह सीधे भगवान विष्णु के दिव्य धाम वैकुण्ठ पहुँचा और फूट-फूट कर रोने लगा । उसने भगवान से कहा – “मेरा कोई स्वामी नहीं है, मैं अनाथ हूँ। हर कोई मुझे ‘गंदा’ कहकर अपमानित करता है। मुझे मार डालिए, यह दुःख सहन नहीं होता” । यह कहकर वह भगवान विष्णु के चरणों में बेहोश हो गया ।

भगवान विष्णु (श्रीहरि) ने करुणा दिखाते हुए गरुड़ से पंखा झलवाया । जब मलमास को होश आया, तो भगवान विष्णु ने कहा – “चिंता मत करो। मैं तुम्हें गोलोक धाम ले चलता हूँ, जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण विराजमान हैं” ।

गोलोक में मिला वरदान – बना ‘पुरुषोत्तम मास’

भगवान विष्णु मलमास का हाथ पकड़कर उसे गोलोक धाम ले गए । वहाँ दुःखी मलमास ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में गिरकर करुणा भरी पुकार लगाई ।

श्रीकृष्ण ने पूरी बात सुनकर घोषणा की:

“मैं स्वयं तुम्हारा स्वामी और रक्षक हूँ। मैं ‘पुरुषोत्तम’ (सबसे श्रेष्ठ पुरुष) कहलाता हूँ, इसलिए तुम भी ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से जाने जाओगे ।

श्रीकृष्ण ने आगे कहा – “मैं अपनी सारी दिव्यता, यश, ऐश्वर्य और कृपा तुममें रखता हूँ । तुम अन्य सभी महीनों के स्वामी बनोगे । जो भी इस महीने में भक्ति, दान, व्रत करेगा, उसे अनंत पुण्य की प्राप्ति होगी” ।

तभी से यह अतिरिक्त महीना ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से पूजनीय हो गया और ‘मलमास’ का अपमान समाप्त हो गया ।

कथा 2: हिरण्यकश्यप और नरसिंह अवतार – 13वें मास की उत्पत्ति

पद्म पुराण में इस कथा का दूसरा रोचक संदर्भ भी मिलता है – यह अतिरिक्त मास विशेष रूप से हिरण्यकश्यप के वध के लिए बनाया गया था ।

हिरण्यकश्यप और नरसिंह अवतार – 13वें मास की उत्पत्ति

अमरत्व की चालाकी भरी माँग

दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके अमरत्व का वरदान माँगा – उसने ऐसी शर्तें रखीं जो असंभव लगती थीं :

  • मृत्यु न दिन में, न रात में (तो संध्या का समय बचा)
  • न घर के अंदर, न बाहर (तो दहलीज बची)
  • न मनुष्य से, न पशु से (तो नरसिंह – आधा मनुष्य, आधा पशु – बचा)
  • न किसी अस्त्र-शस्त्र से (तो नाखून बचे)
  • न किसी भी 12 महीने में (तो 13वाँ महीना बचा)
13वाँ मास बना, नरसिंह ने किया वध

भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए उसी चाल का जवाब अपनी चाल से दिया। उन्होंने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया ।

यह घटना अधिक मास में घटी – एक ऐसा महीना जो सामान्य 12 महीनों में गिना ही नहीं जाता था ।

इस कथा के अनुसार, अधिक मास का प्रादुर्भाव स्वयं भगवान विष्णु द्वारा इसलिए किया गया ताकि हिरण्यकश्यप की अमरत्व की शर्त पूरी न हो सके और धर्म की रक्षा हो सके ।

दोनों कथाओं का सार – ‘मल’ से ‘पुरुषोत्तम’ तक

पक्ष ‘मलमास’ (पहले) ‘पुरुषोत्तम मास’ (बाद में)
स्वामी कोई नहीं स्वयं श्रीकृष्ण
प्रतिष्ठा ‘गंदा, अशुभ’ – उपेक्षित सबसे श्रेष्ठ’ – पूजनीय
फल नगण्य अन्य महीनों से 1000 गुना अधिक
कार्य शुभ कार्य वर्जित भक्ति, दान, व्रत – अत्यंत फलदायी
प्रमुख कथा मलमास की व्यथा और वरदान हिरण्यकश्यप वध हेतु निर्माण

4. अधिक मास में क्या करें और क्या न करें – संपूर्ण मार्गदर्शिका

पुरुषोत्तम मास यानी अधिक मास वह अनोखा समय है, जहाँ भौतिक उन्नति के कार्य वर्जित हैं, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के अवसर असीम हैं। यह वह महीना है जब भगवान विष्णु स्वयं इस मास के अधिपति हैं, इसलिए इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। आइए विस्तार से जानते हैं कि क्या करें और क्या न करें –

अधिक मास में क्या करें और क्या न करें – संपूर्ण मार्गदर्शिका

अधिक-मास में त्याज्य कर्म/कार्य – संपूर्ण सारणी

📜 शास्त्रीय आधार (गर्गाचार्य का श्लोक)

अग्न्याधेयं प्रतिष्ठां च यज्ञो दानव्रतानि च।
वेदव्रतवृषोत्सर्ग चूडाकरणमेखला:।।
गमनं देवतीर्थानां विवाहमभिषेचनम्।
यानं च गृहकर्माणि मलमासे विवर्जयेत्।।

🚫 त्याज्य कर्म/कार्य – विस्तृत सारणी
क्रम कार्य/कर्म वर्जित करने का कारण / शास्त्रीय संदर्भ
विवाह शुभ मुहूर्त का अभाव – मांगलिक कार्यों का आरंभ वर्जित। यह सबसे प्रमुख निषेध है।
अग्न्याधेय (अग्नि स्थापना) वैदिक अग्नि की स्थापना – फल की कामना वाला कार्य होने के कारण वर्जित।
देव-प्रतिष्ठा (मंदिर/मूर्ति स्थापना) नए देवालय या मूर्ति की स्थापना – शुभ मुहूर्त के अभाव में वर्जित।
यज्ञ (विशेष काम्य यज्ञ) केवल नित्य नैमित्तिक यज्ञों की छूट है। काम्य (इच्छापूर्ति वाले) यज्ञ वर्जित।
वेदव्रत (वेदाभ्यास का संकल्प) वेद पढ़ने के विशेष व्रत – नए व्रत का आरंभ वर्जित।
वृषोत्सर्ग (बैल छोड़ने का अनुष्ठान) यह एक काम्य कर्म है – फल की इच्छा से किया जाता है, इसलिए वर्जित।
चूड़ाकर्म (मुंडन संस्कार) बालकों का पहला मुंडन – शुभ मुहूर्त न होने के कारण इस मास में न करें।
मेखला (यज्ञोपवीत/जनेऊ संस्कार) उपनयन संस्कार – मांगलिक कार्य होने के कारण वर्जित।
देवतीर्थों का गमन (पहली बार तीर्थ यात्रा) पहले कभी न देखे हुए देवतीर्थों में जाना – विशेष रूप से वर्जित है। नियमित तीर्थ यात्रा कर सकते हैं।
१० अभिषेचन (राज्याभिषेक / विशेष स्नान संस्कार) राज्यारोहण, पदासीन होने जैसे मांगलिक कार्य – वर्जित।
११ यान (नए वाहन का क्रय) नई गाड़ी, साइकिल, वाहन खरीदना – इस मास में न करें।
१२ गृह कर्माणि (गृह प्रवेश / नए मकान में प्रवेश) नवगृह-प्रवेश या नए मकान में किराए पर जाना भी वर्जित।
१३ नववधू प्रवेश नई दुल्हन का पहली बार द्वार पर पैर रखना – वर्जित माना गया है।
१४ नव यज्ञोपवीत धारण नई जनेऊ धारण करना – इस मास में न करें (पुरानी बदल सकते हैं)।
१५ व्रतोद्यापन किसी व्रत की पूर्णता पर किया जाने वाला उद्यापन – वर्जित।
१६ नवीन वस्त्र/आभूषण धारण पहली बार नए कपड़े या गहने पहनना – इस मास में टाल दें।
१७ कुआँ, तालाब, बावली, बाग का खनन नई भूमि खुदाई, निर्माण कार्य का आरंभ – वर्जित।
१८ भूमि, सुवर्ण, गाय आदि का दान केवल काम्य दान (फल की इच्छा से किया गया दान) वर्जित है। फल की आशा के बिना किया गया दान कर सकते हैं।
१९ तुला दान (विशेष महादान) तौलकर किया जाने वाला विशेष दान – काम्य कर्म होने के कारण वर्जित।
२० अष्टका श्राद्ध विशेष प्रकार का श्राद्ध – इस मास में न करें।
२१ द्वितीय वार्षिक श्राद्ध वर्ष में दूसरी बार किया जाने वाला श्राद्ध – वर्जित।
२२ उपाकर्म वेदाभ्यास का औपचारिक आरंभ – इस मास में न करें।
२३ दाम्पत्य संबंध (कुछ मान्यताओं में) गर्भस्थ शिशु पर अशुभ प्रभाव की आशंका – कुछ घरों में इसका पालन किया जाता है।
२४ नवीन अलंकार/गृह सजावट नए घर में सजावट, नए फर्नीचर का प्रवेश – इस मास में टाल दें।

✅ विशेष ध्यान देने योग्य बातें

विषय नियम
नित्य कर्म प्रतिदिन के नियमित कर्म (स्नान, संध्या, अग्निहोत्र, तर्पण, नित्य श्राद्ध) वर्जित नहीं हैं – ये अवश्य करें
नैमित्तिक कर्म बिना फल की इच्छा के किए जाने वाले आवश्यक कर्म कर सकते हैं
काम्य कर्म फल की इच्छा से किए जाने वाले सभी कर्मों का निषेध है
अपवाद यदि कोई आपातकालीन स्थिति हो (जैसे – मृत्यु संस्कार, गंभीर बीमारी), तो आवश्यक कर्म किए जा सकते हैं
प्रार्थना इस मास में केवल निष्काम भाव से भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की सेवा करें – यही सर्वोत्तम है

5. अधिक मास के धार्मिक एवं आध्यात्मिक लाभ – साधना का स्वर्णिम अवसर

पुरुषोत्तम मास यानी अधिक मास को साधना और पुण्यार्जन का सर्वोत्तम समय माना गया है। इस महीने में किए गए जप, तप, दान और पूजा-पाठ का फल सामान्य समय की तुलना में अनेक गुना अधिक होता है। पद्म पुराण में इस बात का विशेष उल्लेख मिलता है। आइए, इसके धार्मिक और आध्यात्मिक लाभों को विस्तार से समझें।

अधिक मास के धार्मिक एवं आध्यात्मिक लाभ – साधना का स्वर्णिम अवसर

पद्म पुराण का प्रमाण – शास्त्रीय आधार

पद्म पुराण (पद्म पुराण) महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित अठारह पुराणों में से द्वितीय है और विष्णु-माहात्म्य का विस्तृत वर्णन करता है। इस पुराण में पुरुषोत्तम मास की महिमा का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस महीने में किया गया स्नान-दान समस्त पापों का नाश करता है।

पापों का नाश – पद्म पुराण का वचन

पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति अधिक मास में गंगा, यमुना, नर्मदा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करता है और दान-पुण्य करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। यह केवल इस जन्म के पापों का ही नाश नहीं है, बल्कि पिछले जन्मों के संचित पाप भी इस पवित्र महीने में भस्म हो जाते हैं।

शास्त्रीय मान्यता प्रभाव
नियमित स्नान शरीर और मन की पवित्रता, रोगों से मुक्ति
गंगा-तीर्थ स्नान पापों का पूर्ण नाश, पितरों का उद्धार
दान-पुण्य नकारात्मक कर्मों का प्रभाव समाप्त

अनंत पुण्य – सामान्य कर्मों का सौ गुना फल

अधिक मास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किए गए शुभ कर्मों का फल सामान्य से सौ गुना अधिक होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मास में तीर्थ स्नान, पूजा-पाठ, व्रत और दान अन्य मासों की अपेक्षा अनेक गुना फलदायी होते हैं।

कार्य सामान्य फल अधिक मास में फल
स्नान सामान्य पुण्य 100 गुना पुण्य
दान सामान्य पुण्य 100 गुना पुण्य
व्रत सामान्य पुण्य 100 गुना पुण्य
पुराण पाठ सामान्य पुण्य 100 गुना पुण्य

कार्तिक मास से भी अधिक लाभ

सामान्यतः कार्तिक मास को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र मासों में गिना जाता है। लेकिन पुरुषोत्तम मास को उससे भी अधिक फलदायी माना गया है। विद्वानों के अनुसार, यह मास कार्तिक मास से 1000 गुना अधिक पुण्य प्रदान करता है।

क्यों? क्योंकि यह मास स्वयं भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण को समर्पित है और उन्होंने इस महीने को अपना नाम देकर सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है। इसलिए इस मास में किया गया साधना का प्रत्येक क्षण अन्य मासों के हजारों दिनों के बराबर फल देता है।

मोक्ष की प्राप्ति – परम पुरुषार्थ का द्वार

हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – में मोक्ष सर्वोच्च स्थान रखता है। पुरुषोत्तम मास में तीर्थ स्नान और विष्णु भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि:

  • इस मास में गंगा स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है

  • पुरुषोत्तम मास का व्रत करने से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है

  • इस महीने में किए गए पुण्य कर्म अक्षय फल देते हैं, जो मोक्ष मार्ग प्रशस्त करते हैं

मोक्ष का अर्थ है – जन्म-मरण के बंधन से सदा के लिए मुक्ति। यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है, और पुरुषोत्तम मास उस लक्ष्य की प्राप्ति का स्वर्णिम अवसर है।

भगवान की निकटता – सबसे प्रिय मास

पुरुषोत्तम मास को भगवान श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय मास माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब मलमास दुखी होकर भगवान के पास गया, तो श्रीकृष्ण ने स्वयं उसे वरदान दिया कि “मैं तुम्हारा स्वामी हूँ”। तभी से यह मास पुरुषोत्तम मास के नाम से पूजनीय हुआ।

इस मास में भगवान विशेष रूप से अपने भक्तों पर कृपा बरसाते हैं:

  • प्रार्थना शीघ्र सुनाई देती है – क्योंकि भगवान स्वयं इस मास के अधिपति हैं
  • भक्ति का हर क्षण सार्थक होता है – यह पूरा मास साधना के लिए समर्पित है
  • निकटता का अनुभव – साधक को भगवान का सान्निध्य प्राप्त होता है

लाभों की सारणी – एक नज़र में

लाभ विवरण शास्त्रीय प्रमाण
पापों का नाश इस मास में स्नान-दान से सारे पाप नष्ट पद्म पुराण
100 गुना पुण्य सामान्य पुण्य का 100 गुना फल धार्मिक मान्यता
1000 गुना लाभ कार्तिक मास से भी अधिक फलदायी पुरुषोत्तम मास माहात्म्य
मोक्ष प्राप्ति तीर्थ स्नान एवं विष्णु भक्ति से मोक्ष पद्म पुराण / स्कन्द पुराण
भगवान की निकटता सबसे प्रिय मास, शीघ्र कृपा श्रीकृष्ण वरदान
संतान सुख बाल गोपाल की पूजा से धार्मिक मान्यता
आर्थिक समृद्धि दान, तुलसी पूजन, लक्ष्मी मंत्र जप से पद्म पुराण
ग्रह दोष निवारण विष्णु सहस्रनाम पाठ एवं पूजन से ज्योतिषीय मान्यता
आध्यात्मिक उन्नति नियमित जप, ध्यान, पुराण पाठ से वैष्णव मान्यता

पुरुषोत्तम मास वास्तव में स्वर्ग के द्वार खोलने वाला महीना है। यह वह समय है जब:

  1. प्रत्येक शुभ कर्म अनेक गुना फलदायी होता है
  2. भगवान की कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम समय होता है
  3. जीवन के परम लक्ष्य – मोक्ष – की प्राप्ति का सुअवसर मिलता है

इसलिए, इस मास में अपने सभी कर्मों को ‘निष्काम भाव’ से करें और भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की आराधना में लीन हो जाएँ। जो भी व्यक्ति इस पवित्र अवधि में सच्चे मन से पूजा-पाठ और दान करता है, उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

“पुरुषोत्तम मास – साधना का स्वर्णिम अवसर, भगवान की कृपा का द्वार और मोक्ष का आधार।”

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

6. पुरुषोत्तम मास व्रत – रोचक बातें और संपूर्ण विधि

पुरुषोत्तम मास का व्रत ‘व्रतों का राजा’ (King of all Vratas) कहलाता है । यह कोई साधारण एकादशी या पूर्णिमा का व्रत नहीं है – यह पूरे एक माह की साधना है, जो साधक को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति और भगवान श्रीकृष्ण के परम धाम गोलोक की प्राप्ति कराता है । आइए, इस अनोखे व्रत की रोचक बातें और विधि विस्तार से समझें।

पुरुषोत्तम मास व्रत – रोचक बातें और संपूर्ण विधि

‘व्रतों का राजा’ क्यों कहलाता है?

पद्म पुराण और स्कन्द पुराण के अनुसार, इस व्रत की महिमा अन्य सभी व्रतों से असंख्य गुना अधिक है। इसकी तुलना में अन्य व्रत छोटे लगते हैं:

  1. सामान्य मास का व्रत: 1 गुना फल

  2. कार्तिक मास का व्रत: 100 गुना फल

  3. पुरुषोत्तम मास का व्रत: 1,000 गुना फल (कार्तिक मास से भी 10 गुना अधिक)

वाल्मीकि मुनि का कथन: “पुरुषोत्तम व्रत करने से 100 अश्वमेध यज्ञों से भी अधिक पुण्य मिलता है” ।

‘निरपेक्ष व्रत’ – पूर्ण समर्पण का महीना

पुरुषोत्तम मास व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘निरपेक्ष’ (बिना किसी सांसारिक इच्छा के) किया जाता है। अन्य मासों में लोग धन, पुत्र, स्वास्थ्य आदि की कामना से व्रत करते हैं, लेकिन इस मास में सभी कामनाओं का त्याग कर देना चाहिए और पूरा महीना केवल राधा-कृष्ण की सेवा में बिताना चाहिए ।

जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं:

“यह मास निष्काम (बिना इच्छा वाला) है। चाहे कोई सकाम हो या निष्काम – यदि वह इस मास की पूजा करता है, तो उसके सभी कर्म-फल नष्ट हो जाते हैं और वह मुझे प्राप्त होता है” .

यही कारण है कि इस मास को ‘पुरुषोत्तम’ (सर्वश्रेष्ठ पुरुष) का नाम दिया गया है, क्योंकि यह सांसारिक इच्छाओं से परे शुद्ध भक्ति का मास है .

व्रत का पालन – 7 मुख्य नियम

निम्नलिखित सारणी में पुरुषोत्तम मास व्रत के मुख्य नियम और रोचक बातें दी गई हैं:

क्रम व्रत का अंग विस्तृत विवाह / रोचक बात
1. ब्रह्ममुहूर्त में जागरण सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले उठें, ‘जय राधे!’ का उच्चारण करें। यह समय सबसे शुभ और दिव्य माना गया है ।
2. हरे कृष्ण महामंत्र का अतिरिक्त जप पूरे माह 24 से 108 अतिरिक्त राउंड जप करें। जितना जप करेंगे, उतना ही अधिक पुण्य ।
3. एक समय भोजन (फलाहार या दूध) सर्वोत्तम है – केवल दूध, या केवल फल, या बिना अन्न का भोजन। कुछ साधक सूर्यास्त के बाद एक बार भोजन करते हैं ।
4. दैनिक दीपदान (33 घी के दीपक) प्रतिदिन शुद्ध घी का दीपक जलाएँ। विशेष रूप से 33 दीपक जलाने का विधान है – यह पुरुषोत्तम मास की पहचान है ।
5. तुलसी अर्चना और परिक्रमा प्रतिदिन तुलसी देवी की पूजा और परिक्रमा करें। तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं ।
6. श्रीमद्भागवत का पाठ प्रतिदिन श्रीमद्भागवत का पाठ करें, विशेषकर दशम स्कंध (राधा-कृष्ण लीला) ।
7. सत्य और अहिंसा का पालन पूरे माह झूठ न बोलें, किसी की निंदा न करें, और शांत रहने का संकल्प लें ।

‘33 घी के लड्डूदान’ – अनोखा विधान

हरि-भक्ति-विलास के अनुसार, इस मास में 33 घी के लड्डू दान करने का विशेष विधान है। यह शायद भगवान ब्रह्मा के 33 कोटि देवताओं का प्रतीक है। आप यह दान कर सकते हैं:

  • प्रतिदिन: 1 दीपक + 1 लड्डू अर्पित करें

  • एक साथ: महीने के किसी एक पवन दिवस (एकादशी, पूर्णिमा, प्रतिपदा) पर 33 दीपक और 33 लड्डू अर्पित करें

दान के बिना व्रत अधूरा माना जाता है। इस मास में विशेष रूप से श्रीमद्भागवत का दान करना सबसे उत्तम बताया गया है – ऐसा करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

एक रोचक तथ्य – यह मास सबके लिए है

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस मास का व्रत सभी वर्गों को करना चाहिए! सामान्यतः व्रत केवल जोशीले भक्त ही करते हैं, लेकिन:

पद्म पुराण के अनुसार, इस महीने का व्रत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र – चारों वर्णों को करना चाहिए। यहाँ तक कि म्लेच्छ और चांडाल को भी इस व्रत की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ।

व्रत विधि – त्वरित सारणी

दैनिक कृत्य सुबह दोपहर शाम रात्रि
करें ✅ ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, गंगा स्नान, हरे कृष्ण जप तुलसी पूजा, श्रीमद्भागवत पाठ दीपदान (33 दीप), पुष्पांजलि कीर्तन, शयन से पूर्व जप
न करें ❌ झूठ बोलना, किसी की निंदा मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन तैल मालिश, बाल-नाखून कटवाना दांपत्य संबंध

“पुरुषोत्तम मास का व्रत केवल त्याग नहीं है – यह राधा-कृष्ण के प्रति आपके प्रेम की परीक्षा है। यह वह महीना है जब भगवान कहते हैं – ‘आओ, बस एक महीना मेरे लिए जियो, फिर मैं तुम्हें अपने धाम गोलोक में सदा के लिए रखूँगा’” ।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

7. निष्कर्ष – पुरुषोत्तम मास: त्याग नहीं, साधना का स्वर्णिम अवसर

मलमास, अधिक मास, पुरुषोत्तम मास – एक ही महीने के ये तीन नाम तीन अलग-अलग दृष्टिकोण प्रकट करते हैं। ‘मलमास’ कहकर हम इसे दूषित ठहराते हैं, ‘अधिक मास’ कहकर हम इसके अतिरिक्त होने का बोध कराते हैं, लेकिन ‘पुरुषोत्तम मास’ कहकर हम स्वीकार करते हैं कि यह महीना स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है और इसलिए सबसे श्रेष्ठ है।

यह महीना हमें त्याग और साधना का अद्भुत संदेश देता है। एक ओर जहाँ विवाह, गृह प्रवेश, नए व्यवसाय का आरंभ, मुंडन संस्कार, नए वाहनों की खरीद आदि शुभ कार्य वर्जित हैं, वहीं दूसरी ओर दान, स्नान, पूजा-पाठ, व्रत, पुराण पाठ, गोसेवा, तुलसी अर्चना, शिवलिंग अभिषेक जैसे पुण्य कार्य अनेक गुना फलदायी हो जाते हैं। यह वह समय है जब हमें बाहरी सुखों की खोज से हटकर अपने अंतर्मन की यात्रा पर निकल जाना चाहिए।

पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति इस मास में सच्चे मन से पुण्य कर्म करता है, उसे उसके कर्मों का तीन गुना अधिक फल प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण की कृपा पाने का यह अद्भुत अवसर है – यह वही महीना है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने नाम से विभूषित किया है और ‘पुरुषोत्तम’ की उपाधि दी है। आइए, इस पुरुषोत्तम मास में दान, स्नान, पूजा-पाठ, व्रत, पुराण पाठ और गोसेवा के माध्यम से अपने जीवन को पवित्र बनाएँ और मोक्ष के द्वार की ओर अग्रसर हों। इस महीने की हर बीतती सांस को ‘राधे-राधे’ और ‘हरे कृष्ण’ में डुबो दें, क्योंकि यही वह समय है जब भगवान सबसे निकट होते हैं। यही पुरुषोत्तम मास है – साधना का स्वर्णिम अवसर!

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏

8. पुरुषोत्तम मास (अधिक मास/मलमास) – सामान्य प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: अधिक मास क्या है और यह कितने वर्ष में आता है?
उत्तर: अधिक मास चंद्र एवं सौर वर्षों के अंतर को समायोजित करने के लिए हर 2-3 वर्ष में आने वाला 13वाँ अतिरिक्त महीना है। यह लगभग 32.5 चंद्र मासों (ढाई वर्ष) में एक बार आता है।

प्रश्न 2: अधिक मास को ‘मलमास’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: ‘मल’ का अर्थ ‘गंदा/अशुद्ध’ और ‘मास’ का अर्थ ‘महीना’ है। चूँकि इस महीने में कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती और शुभ मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, इसलिए इसे ‘मलमास’ (गंदा महीना) कहा गया।

प्रश्न 3: अधिक मास को ‘पुरुषोत्तम मास’ क्यों कहते हैं?
उत्तर: पौराणिक कथा के अनुसार, जब मलमास दुखी होकर भगवान विष्णु के पास गया, तो श्रीकृष्ण ने स्वयं उसे वरदान देते हुए कहा – “मैं तुम्हारा स्वामी हूँ, तुम ‘पुरुषोत्तम मास’ कहलाओगे”। तभी से यह मास सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

प्रश्न 4: 2026 में अधिक मास कब है?
उत्तर: 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। यह ज्येष्ठ मास में पड़ने वाला एक दुर्लभ संयोग है।

प्रश्न 5: अधिक मास में कौन-से कार्य वर्जित हैं?
उत्तर: विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, यज्ञोपवीत, नए व्यवसाय का आरंभ, गाड़ी/मकान खरीदना, भूमि-दान, और फल की इच्छा से किए जाने वाले सभी काम वर्जित हैं।

प्रश्न 6: अधिक मास में कौन-से कार्य करना शुभ है?
उत्तर: भगवान विष्णु/श्रीकृष्ण की पूजा, दान-पुण्य, व्रत-उपवास, पुराण पाठ (विष्णु पुराण, भागवत, रामायण), गंगा स्नान, तुलसी अर्चना, गोसेवा, शिवलिंग अभिषेक – ये सब अत्यंत शुभ एवं फलदायी हैं।

प्रश्न 7: क्या अधिक मास में दान करना चाहिए?
उत्तर: हाँ – निष्काम भाव से (बिना किसी इच्छा के) किया गया दान इस मास में 100 गुना अधिक फल देता है। अन्न, वस्त्र, गौ, तिल, घी, लड्डू, श्रीमद्भागवत का दान विशेष लाभकारी है।

प्रश्न 8: क्या अधिक मास में व्रत करना चाहिए?
उत्तर: हाँ – यह मास ‘व्रतों का राजा’ कहलाता है। पूरे मास व्रत करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं। न कर सकें तो अधिक मास की एकादशी (27 मई) का व्रत अवश्य करें।

प्रश्न 9: क्या अधिक मास में नए वस्त्र पहन सकते हैं?
उत्तर: नहीं – पहली बार नवीन वस्त्र धारण करना इस मास में वर्जित है। हाँ, पुराने वस्त्र पहन सकते हैं।

प्रश्न 10: क्या अधिक मास में दांपत्य संबंध बनाने की मनाही है?
उत्तर: कुछ मान्यताओं में इससे गर्भस्थ शिशु पर अशुभ प्रभाव पड़ने की आशंका होती है, इसलिए इससे बचना चाहिए। यह पूर्णतः निरपेक्ष साधना का मास है।

प्रश्न 11: क्या अधिक मास में तिलक, चन्दन, सिंदूर लगा सकते हैं?
उत्तर: हाँ – तिलक, चन्दन, गोपीचन्दन, कुंकुम लगाने की कोई मनाही नहीं है। यह तो भगवान के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। नया सिंदूर या चन्दन खरीदना वर्जित हो सकता है।

प्रश्न 12: क्या अधिक मास में शादी के वार्षिकोत्सव मना सकते हैं?
उत्तर: भले ही आपकी शादी पिछले वर्ष इसी मास में हुई हो, इस मास में विवाह वार्षिकोत्सव मनाने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। पारिवारिक उत्सव स्वीकार्य है।

प्रश्न 13: क्या अधिक मास में लड़की देखना, सगाई, मंगनी कर सकते हैं?
उत्तर: शुभ मुहूर्त का अभाव होने के कारण, इस प्रकार के विवाह-पूर्व मांगलिक कार्य भी इस मास में वर्जित माने जाते हैं।

प्रश्न 14: क्या अधिक मास में घर का निर्माण कार्य (फर्श, पेंटिंग) शुरू कर सकते हैं?
उत्तर: नहीं – भू-पूजन, शिलान्यास, नव-निर्माण का आरम्भ, नया फर्नीचर, नई पेंटिंग – ये सब काम्य (फल की इच्छा वाले) कर्म हैं, इसलिए वर्जित हैं।

प्रश्न 15: क्या अधिक मास में मृत्यु-संस्कार या श्राद्ध कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ – मृत्यु-संस्कार (दाह संस्कार) और नित्य-तर्पण जैसे आवश्यक कर्म कर सकते हैं। केवल अष्टका श्राद्ध और द्वितीय वार्षिक श्राद्ध वर्जित हैं।

प्रश्न 16: क्या अधिक मास में पुरानी जनेऊ बदल सकते हैं?
उत्तर: नई जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करना वर्जित है। लेकिन यदि पुरानी जनेऊ टूट गई हो या अपवित्र हो गई हो, तो नियमित जनेऊ बदलना नित्य कर्म है, इसमें कोई दोष नहीं है।

प्रश्न 17: क्या अधिक मास में गर्भवती महिलाएँ व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: गर्भवती, स्तनपान कराने वाली माताओं, बुजुर्गों और रोगियों के लिए व्रत आवश्यक नहीं है। यदि शारीरिक रूप से कमजोरी हो तो व्रत न रखें, केवल नाम जप और पूजा करें।

प्रश्न 18: अधिक मास की एकादशी कब है?
उत्तर: 2026 के ज्येष्ठ अधिक मास में दो एकादशी होंगी:

  • प्रथम एकादशी: 27 मई 2026 (बुधवार) – यह अधिक मास की एकादशी
  • द्वितीय एकादशी: 11 जून 2026 (गुरुवार) – यह नियमित ज्येष्ठ मास की एकादशी

प्रश्न 19: क्या अधिक मास में महिलाएँ व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: अवश्य! यह व्रत स्त्री-पुरुष, सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के लिए है। विवाहित महिलाएँ पति की लंबी आयु के लिए, कुंवारी लड़कियाँ सुयोग्य वर के लिए, विधवाएँ मोक्ष के लिए यह व्रत रख सकती हैं।

प्रश्न 20: अधिक मास में क्या मांस-मदिरा खा सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल नहीं! इस मास में तो प्याज, लहसुन तक का त्याग करने का विधान है। पूर्ण सात्विक आहार लेना अनिवार्य माना गया है। यह शुद्धि और साधना का महीना है।

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