सिद्धिदात्री माता की आरती – Siddhidatri Mata ki Aarti

सिद्धिदात्री माता की आरती का सार (भावार्थ)

सिद्धिदात्री माता की आरती माँ दुर्गा के नवम स्वरूप की महिमा को अत्यंत सरल और भावपूर्ण शब्दों में प्रकट करती है। माँ सिद्धिदात्री को सभी सिद्धियों की दात्री, भक्तों की रक्षक और दासों की करुणामयी माता बताया गया है। आरती का मूल भाव यह है कि माँ के नाम-स्मरण मात्र से ही जीवन में सफलता, पवित्रता और पूर्णता प्राप्त होती है।

इस आरती में बताया गया है कि माँ सिद्धिदात्री का नाम लेने से मन शुद्ध होता है और कठिन से कठिन कार्य भी सहज रूप से सिद्ध हो जाते हैं। जब माँ अपने भक्त के सिर पर करुणा भरा हाथ रखती हैं, तब असंभव भी संभव बन जाता है। माँ की पूजा में किसी जटिल विधि-विधान की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे स्वयं सर्व सिद्धि स्वरूपा हैं और सच्चे भाव को ही स्वीकार करती हैं।

आरती में विशेष रूप से यह भाव उभरकर आता है कि जो भक्त रविवार के दिन माँ का स्मरण करता है और उनकी मूर्ति को हृदय में धारण करता है, उसके सभी कार्य माँ पूर्ण करती हैं। ऐसे भक्त के जीवन में कोई भी काम अधूरा नहीं रहता। माँ की कृपा और माया जिसके ऊपर होती है, वह व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित, समर्थ और सौभाग्यशाली अनुभव करता है।

सिद्धिदात्री माता को हिमाचल पर्वत पर विराजमान बताया गया है और उनका निवास महा नन्दा मंदिर में माना गया है, जो उनके दिव्य और पावन स्वरूप का प्रतीक है। आरती के अंतिम भाव में भक्त माँ से पूर्ण शरणागति व्यक्त करता है और यह स्वीकार करता है कि सच्ची भक्ति करने वाले को माँ कभी निराश नहीं करतीं।

कुल मिलाकर, यह आरती हमें यह सिखाती है कि श्रद्धा, विश्वास और निष्काम भक्ति के साथ माँ सिद्धिदात्री का स्मरण करने से जीवन में सभी प्रकार की सिद्धियाँ, सुख-शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह आरती एक आध्यात्मिक धरोहर है, जो भक्त के मन में आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।

सिद्धिदात्री माता की आरती – Siddhidatri Mata ki Aarti

जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता।
तु भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥१॥

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥२॥

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।
जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥३॥

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।
तू जगदम्बें दाती तू सर्व सिद्धि है॥४॥

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥५॥

तू सब काज उसके करती है पूरे।
कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥६॥

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥७॥

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।
जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली॥८॥

हिमाचल है पर्वत जहाँ वास तेरा।
महा नन्दा मन्दिर में है वास तेरा॥९॥

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।
भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥१०॥


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